प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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31 जुलाई 2019
हर वो शक्ति
जिसे बाती होने का गौरव हासिल है
उसे प्रणाम है
जलना ही होगा
कि चहुँ ओर अँधेरा बहुत है
आख़िर जलना बातियों के ही नाम है
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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28 जुलाई 2019
पेड़ों का होना हरेपन के नये अर्थ गढ़ेगा
पहाड़-सी उलझनें धुल जाएँगी
बारिश होगी।
सौंधी मिट्टी की ख़ुशबू में जीवन ढ़लेगा
बंजर भूमि की सकल दरिद्रताएँ भुल जाएँगी
बारिश होगी।
गगन मही के ललाट की लकीरें पढ़ेगा
दुःख की बदरी सुख की किरणों में घुल जाएँगी
बारिश होगी।
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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25 जुलाई 2019
सागर की बाहों में
असंख्य लहरें हैं
ऊपर से है शांत भले
भीतर घाव गहरे हैं
वो लहरों का बार-बार
किनारों से टकराना
उनका हुनर है
वे भी जानती हैं
कि उनकी गति पर
असंख्य पहरे हैं
अपनी सीमा में ही रहकर
छू लेंगी आसमान
निखर जाएँगी
ये यूँ ही नहीं है
कि उनकी विह्वल आँखों में
कितने ही आँसू ठहरे हैं
सागर की बाहों में
असंख्य लहरें हैं
ऊपर से है शांत भले
भीतर घाव गहरे हैं
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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18 जुलाई 2019
टिमटिमाती रौशनी
गुजरता हुआ सुख है
फैला अंधकार
ठहरा हुआ दुःख है
इस अंधकार में
दीप जलाने को
माचिस की तीली टटोलता मन
आस-विश्वास की ओर उन्मुख है
ठहरे हुए पानी में
कंकड़ फेंक
जैसे हलचल कर जाते हैं अनजाने ही
अबोध बच्चे
वैसे ही ठहरे हुए दुःख में
खलल-सा पैदा करने को मचल जाता है
दीप जलाने को उद्धत
अबोध मन
नहीं जानता मन
कि
हर हलचल
हर खलल के बाद
फिर वही ठहराव होगा पानी की सतह पर
वैसे ही जैसे दुःख ठहर जाएगा फिर फिर
बातियाँ जलेंगी
होते-होते मलीन होगी रोशनी
दीप बुझ बुझ जाएँगे
दुःख का अंधकार ठहरा ही रहेगा!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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17 जुलाई 2019
अटक जाती है साँस कभी
कभी जीवन भी अटक जाता है
अटकी हुई बात कोई
घुटन हो
कंठ में ही नहीं
रोम-रोम जब रुदन हो
ऐसे में
बस बेवजह कहीं भटक पाने की
सहूलियत दे ज़िन्दगी
और इस बेवजह में
कोई वजह निकल आए
यात्रारत चेतना की आँखें सजल हो जाए
फिर
और क्या चाहिए ही ज़िन्दगी से!
सफ़र हो
लौट आने को डगर हो
यूँ हो जीवन
यूँ ही जीवन हो!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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12 जुलाई 2019
अभी शोक में हूँ।
हर रिश्ते की एक उम्र होती है
उसके बाद उसका मरना तय है
मैंने ऐसे कई मरे हुए रिश्तों का श्राद्ध किया है
अभी शोक में हूँ।
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शोक कैसा?!
हर रिश्ता
एक रोज मर ही जाता है
भले कितना ही अनन्य
क्यों न रहा हो
आख़िरी गति
अन्तिम परिणति यही है
अवश्यंभावी का शोक कैसा?!
यह
असमय मर गये रिश्तों का
मातम है।
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यह जीवन है
जीवन के बाद भी कुछ रिश्ते साँस लेते हैं
ये आभास हो
तो जीवन रहते टूटे रिश्तों का शोक न होगा
कि जो टूट गए वो रिश्ते कभी अपने थे ही नहीं
एक रोज़ हम ही नहीं होने हैं इस संसार में
रिश्ते निभाने को
या रिश्तों से किनारा करने को
फिर कैसी कड़वाहट?!
जो जब तक चला ठीक था
अब जो खो चुका तो यह भी ठीक है
निश्चित रूप से एक दिन खो जाने वाले जीवन में
किसी भी टूटन-बिखरन के लिए
संताप की कहीं कोई जगह होने की गुंजाइश ही नहीं है
नहीं होनी चाहिए!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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9 जुलाई 2019
ज़िन्दगी ने
नग्न सत्य दो टूक शब्दों में
कह दिया
मन-वचन-कर्म से
हमें और भी विपन्न
कर दिया
हम
वास्तविकता देख-सुन
बिफर गए
मन-प्राण ठगे से थे
जाने सारे मूल्य
किधर गए
ऐसे में
हमें टूटता देख
ज़िन्दगी ने ही सम्भाला
हमें
हमारी आंतरिक शक्तियों का
दिया हवाला--
ठोस धरातल पर किए गए संकल्प
तुम्हारी जर्जर जीवन नैया
अवश्य खे पाएँगे
समय एक सा नहीं रहता
ये दोष-दंश
कल कहीं नहीं रह जाएँगे
जो है
जैसा है
निबाहती चलो
इस भवसागर में सुख-शांति कहीं नहीं है
जो दे रही है नियति
उसे सहर्ष स्वीकारती चलो !
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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8 जुलाई 2019
सुबह की उजास
कुछ मौन प्रार्थनाएँ
प्रतिबिंब में परिलक्षित स्पंदन
तट पर बैठे जीवन की
घोर यातनाएँ
सब
चलते कदम
थाह रहे हैं
उचटे हुए समय में भी
जो विशुद्ध प्रवाह रहे हैं !