अँधेरे में

हर वो शक्ति
जिसे बाती होने का गौरव हासिल है
उसे प्रणाम है


जलना ही होगा
कि चहुँ ओर अँधेरा बहुत है
आख़िर जलना बातियों के ही नाम है







बारिश होगी

पेड़ों का होना हरेपन के नये अर्थ गढ़ेगा
पहाड़-सी उलझनें धुल जाएँगी



बारिश होगी।



सौंधी मिट्टी की ख़ुशबू में जीवन ढ़लेगा
बंजर भूमि की सकल दरिद्रताएँ भुल जाएँगी


बारिश होगी।



गगन मही के ललाट की लकीरें पढ़ेगा 
दुःख की बदरी सुख की किरणों में घुल जाएँगी  


बारिश होगी।

सागर की बाहों में असंख्य लहरें हैं

सागर की बाहों में
असंख्य लहरें हैं
ऊपर से है शांत भले
भीतर घाव गहरे हैं


वो लहरों का बार-बार
किनारों से टकराना
उनका हुनर है
वे भी जानती हैं
कि उनकी गति पर
असंख्य पहरे हैं 


अपनी सीमा में ही रहकर
छू लेंगी आसमान
निखर जाएँगी
ये यूँ ही नहीं है
कि उनकी विह्वल आँखों में
कितने ही आँसू ठहरे हैं 


सागर की बाहों में
असंख्य लहरें हैं
ऊपर से है शांत भले
भीतर घाव गहरे हैं


दुःख का अंधकार ठहरा ही रहेगा!

टिमटिमाती रौशनी
गुजरता हुआ सुख है


फैला अंधकार
ठहरा हुआ दुःख है


इस अंधकार में
दीप जलाने को
माचिस की तीली टटोलता मन
आस-विश्वास की ओर उन्मुख है


ठहरे हुए पानी में
कंकड़ फेंक
जैसे हलचल कर जाते हैं अनजाने ही 

अबोध बच्चे 


वैसे ही ठहरे हुए दुःख में
खलल-सा पैदा करने को मचल जाता है 

दीप जलाने को उद्धत 

अबोध मन 


नहीं जानता मन  


कि
हर हलचल
हर खलल के बाद 


फिर वही ठहराव होगा पानी की सतह पर
वैसे ही जैसे दुःख ठहर जाएगा फिर फिर 


बातियाँ जलेंगी
होते-होते मलीन होगी रोशनी
दीप बुझ बुझ जाएँगे 


दुःख का अंधकार ठहरा ही रहेगा!




एक जीवन यात्रा और उसमें कितनी यात्राएँ

अटक जाती है साँस कभी
कभी जीवन भी अटक जाता है


अटकी हुई बात कोई
घुटन हो  


कंठ में ही नहीं 

रोम-रोम जब रुदन हो  


ऐसे में
बस बेवजह कहीं भटक पाने की
सहूलियत दे ज़िन्दगी 


और इस बेवजह में
कोई वजह निकल आए
यात्रारत चेतना की आँखें सजल हो जाए 


फिर
और क्या चाहिए ही ज़िन्दगी से!


सफ़र हो
लौट आने को डगर हो 


यूँ हो जीवन
यूँ ही जीवन हो!

रिश्तों के बियाबान में लहुलूहान चेतना

अभी शोक में हूँ।


हर रिश्ते की एक उम्र होती है
उसके बाद उसका मरना तय है
मैंने ऐसे कई मरे हुए रिश्तों का श्राद्ध किया है 


अभी शोक में हूँ।


---


शोक कैसा?!


हर रिश्ता
एक रोज मर ही जाता है
भले कितना ही अनन्य
क्यों न रहा हो


आख़िरी गति
अन्तिम परिणति यही है
अवश्यंभावी का शोक कैसा?!


यह
असमय मर गये रिश्तों का
मातम है।


---


यह जीवन है 


जीवन के बाद भी कुछ रिश्ते साँस लेते हैं
ये आभास हो
तो जीवन रहते टूटे रिश्तों का शोक न होगा
कि जो टूट गए वो रिश्ते कभी अपने थे ही नहीं 



एक रोज़ हम ही नहीं होने हैं इस संसार में
रिश्ते निभाने को
या रिश्तों से किनारा करने को 


फिर कैसी कड़वाहट?!


जो जब तक चला ठीक था
अब जो खो चुका तो यह भी ठीक है


निश्चित रूप से एक दिन खो जाने वाले जीवन में
किसी भी टूटन-बिखरन के लिए
संताप की कहीं कोई जगह होने की गुंजाइश ही नहीं है


नहीं होनी चाहिए!




आत्मालाप

ज़िन्दगी ने
नग्न सत्य दो टूक शब्दों में
कह दिया
मन-वचन-कर्म से
हमें और भी विपन्न
कर दिया 


हम
वास्तविकता देख-सुन 
बिफर गए
मन-प्राण ठगे से थे
जाने सारे मूल्य
किधर गए 


ऐसे में
हमें टूटता देख
ज़िन्दगी ने ही सम्भाला
हमें
हमारी आंतरिक शक्तियों का
दिया हवाला--


ठोस धरातल पर किए गए संकल्प
तुम्हारी जर्जर जीवन नैया
अवश्य खे पाएँगे
समय एक सा नहीं रहता
ये दोष-दंश
कल कहीं नहीं रह जाएँगे 


जो है
जैसा है
निबाहती चलो
इस भवसागर में सुख-शांति कहीं नहीं है
जो दे रही है नियति
उसे सहर्ष स्वीकारती चलो !

उचटे हुए समय में
















सुबह की उजास
कुछ मौन प्रार्थनाएँ 



प्रतिबिंब में परिलक्षित स्पंदन


तट पर बैठे जीवन की
घोर यातनाएँ 


सब
चलते कदम
थाह रहे हैं


उचटे हुए समय में भी
जो विशुद्ध प्रवाह रहे हैं !


इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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