चन्द लम्हों की साँसे...कुछ मूक आवाजें!

हमारे छंदों में
चन्द लम्हों की साँसे हैं
सशक्त सी
कुछ मूक आवाजें हैं!

चमन की वादियों में
आंसू के मोती झरते हैं,
"वन्दे मातरम" से...
"वनडे मातरम" तक के
बारे में सोच
वे रोया करते हैं;
एक सूत्र में आबद्ध कर देते थे,
कहाँ गए वो धागे हैं!

हमारे छंदों में
चन्द लम्हों की साँसे हैं
सशक्त सी
कुछ मूक आवाजें हैं!

भोग-विलास हेतु
लगी हुई कतारें हैं,
बाज़ार और
घर के बीच की-
हा! कहाँ गयी
वो दीवारें हैं;
भाई की कलाई से विलुप्त
आज राखी के धागे हैं!

हमारे छंदों में
चन्द लम्हों की साँसे हैं
सशक्त सी
कुछ मूक आवाजें हैं!

अनाम बलिदानियों को
श्रद्धा पुष्प चढाने हैं,
आसपास
उन स्मृतियों के
मुस्कुराते फूल
खिलाने हैं;
उस दौर को इस दौर से जोड़ रहे
अदृस्य से धागे हैं!

हमारे छंदों में
चन्द लम्हों की साँसे हैं
सशक्त सी
कुछ मूक आवाजें हैं!

8 टिप्पणियाँ:

संजय भास्‍कर 10 अक्टूबर 2010 को 10:35 am बजे  

बहुत सुंदर !
कविता को एक नए अंदाज़ में परिभाषित किया है आप ने !

संजय भास्‍कर 10 अक्टूबर 2010 को 10:37 am बजे  

सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 10 अक्टूबर 2010 को 12:58 pm बजे  

हमारे छंदों में
चन्द लम्हों की साँसे हैं
सशक्त सी
कुछ मूक आवाजें हैं!
--
यही तो जीवन का फलसफा है!

vandana gupta 10 अक्टूबर 2010 को 1:07 pm बजे  

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (11/10/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com

Unknown 10 अक्टूबर 2010 को 2:28 pm बजे  

तुम्हारी शव्दों की अभिव्यक्ति तुम्हारी सृजन की क्षमता का खुद ही देता सन्देश है
सरल ही सही जुड़ने को कई अदृश्य धागे है सबकुछ शाश्वत है फिर भी मूक आवाजे कुछ कहने को आबध है
बहुत प्यारी रचना .बधाई ..ब्लॉग से बदलाव ने नए अनुशील को काफी आकर्षक बना दिया है .......

www.navincchaturvedi.blogspot.com 10 अक्टूबर 2010 को 2:57 pm बजे  

beautiful poem anu

sajjiv 10 अक्टूबर 2010 को 4:11 pm बजे  

चंद लफ्जो में सदीयो का फेरा है
वो सारे शीक्वे शीकाय्ते , उमीदें, सपने
जीसने भी हमको घेरा है.

मूक है जो वो व्यक्त हुए
कमजोर थे जो वो शसक्त हुए
उलझे थे वो श्प्ष्ट हुए.

मीले हुए खो गए
अपने पराये हो गए
सपने थे सपनों में खो गए

पर बूंदों में अभी भी साज है
कुछ कर गुजरने का अंदाज है
उम्मीद की गहरी आवाज है

अहसास में परवाज है
तेरा मेरा खाव है
होसले का सैलाव है

आओ समेटे सपनों को
पराये हुए अपनों को
दहकती हुए लपटों को
दम तोड़ते ज्ज्वो को

वटी हो सरहदे, तारे तो सबके सांझे है
उजड़े हो कुछ बाग, बादल तो सबके सांझे है
टूटी हो उम्मीदे , होसले तो सबके सांझे है
खोये हो कुछ अबसर, सम्भावनाये तो सबकी सांझी है

एक कदम तुम्हारा
एक कदम हमारा
एक फीसलन तुम्हारी
एक हाथ हमारा
एक दुःख तुम्हारा एक हीम्मत हमारी
एक तिनका तुम्हारा एक तिनका हमारा

सब आशीयाने इसी से सजे है
उजड़े हो लाख गुलशने
फीर भी कीतने बाग हरे है
लाख बहा हो लहू फीर भी त्यौहार खिलते है

जीवन का सैलाव
हमको देता है आवाज
आओ कुछ रंग हम भी भर ले
आधुरे है जो खाव उनको पूरा करले

संगीता स्वरुप ( गीत ) 11 अक्टूबर 2010 को 6:44 am बजे  

अनाम बलिदानियों को
श्रद्धा पुष्प चढाने हैं,
आसपास
उन स्मृतियों के
मुस्कुराते फूल
खिलाने हैं;

बहुत खूबसूरत बात ..जो लोंग अक्सर भूल जाते हैं ..

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