हमारे छंदों में
चन्द लम्हों की साँसे हैं
सशक्त सी
कुछ मूक आवाजें हैं!
चमन की वादियों में
आंसू के मोती झरते हैं,
"वन्दे मातरम" से...
"वनडे मातरम" तक के
बारे में सोच
वे रोया करते हैं;
एक सूत्र में आबद्ध कर देते थे,
कहाँ गए वो धागे हैं!
हमारे छंदों में
चन्द लम्हों की साँसे हैं
सशक्त सी
कुछ मूक आवाजें हैं!
भोग-विलास हेतु
लगी हुई कतारें हैं,
बाज़ार और
घर के बीच की-
हा! कहाँ गयी
वो दीवारें हैं;
भाई की कलाई से विलुप्त
आज राखी के धागे हैं!
हमारे छंदों में
चन्द लम्हों की साँसे हैं
सशक्त सी
कुछ मूक आवाजें हैं!
अनाम बलिदानियों को
श्रद्धा पुष्प चढाने हैं,
आसपास
उन स्मृतियों के
मुस्कुराते फूल
खिलाने हैं;
उस दौर को इस दौर से जोड़ रहे
अदृस्य से धागे हैं!
हमारे छंदों में
चन्द लम्हों की साँसे हैं
सशक्त सी
कुछ मूक आवाजें हैं!
चन्द लम्हों की साँसे...कुछ मूक आवाजें!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
10 अक्टूबर 2010

8 टिप्पणियाँ:
बहुत सुंदर !
कविता को एक नए अंदाज़ में परिभाषित किया है आप ने !
सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।
हमारे छंदों में
चन्द लम्हों की साँसे हैं
सशक्त सी
कुछ मूक आवाजें हैं!
--
यही तो जीवन का फलसफा है!
आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (11/10/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com
तुम्हारी शव्दों की अभिव्यक्ति तुम्हारी सृजन की क्षमता का खुद ही देता सन्देश है
सरल ही सही जुड़ने को कई अदृश्य धागे है सबकुछ शाश्वत है फिर भी मूक आवाजे कुछ कहने को आबध है
बहुत प्यारी रचना .बधाई ..ब्लॉग से बदलाव ने नए अनुशील को काफी आकर्षक बना दिया है .......
beautiful poem anu
चंद लफ्जो में सदीयो का फेरा है
वो सारे शीक्वे शीकाय्ते , उमीदें, सपने
जीसने भी हमको घेरा है.
मूक है जो वो व्यक्त हुए
कमजोर थे जो वो शसक्त हुए
उलझे थे वो श्प्ष्ट हुए.
मीले हुए खो गए
अपने पराये हो गए
सपने थे सपनों में खो गए
पर बूंदों में अभी भी साज है
कुछ कर गुजरने का अंदाज है
उम्मीद की गहरी आवाज है
अहसास में परवाज है
तेरा मेरा खाव है
होसले का सैलाव है
आओ समेटे सपनों को
पराये हुए अपनों को
दहकती हुए लपटों को
दम तोड़ते ज्ज्वो को
वटी हो सरहदे, तारे तो सबके सांझे है
उजड़े हो कुछ बाग, बादल तो सबके सांझे है
टूटी हो उम्मीदे , होसले तो सबके सांझे है
खोये हो कुछ अबसर, सम्भावनाये तो सबकी सांझी है
एक कदम तुम्हारा
एक कदम हमारा
एक फीसलन तुम्हारी
एक हाथ हमारा
एक दुःख तुम्हारा एक हीम्मत हमारी
एक तिनका तुम्हारा एक तिनका हमारा
सब आशीयाने इसी से सजे है
उजड़े हो लाख गुलशने
फीर भी कीतने बाग हरे है
लाख बहा हो लहू फीर भी त्यौहार खिलते है
जीवन का सैलाव
हमको देता है आवाज
आओ कुछ रंग हम भी भर ले
आधुरे है जो खाव उनको पूरा करले
अनाम बलिदानियों को
श्रद्धा पुष्प चढाने हैं,
आसपास
उन स्मृतियों के
मुस्कुराते फूल
खिलाने हैं;
बहुत खूबसूरत बात ..जो लोंग अक्सर भूल जाते हैं ..
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