अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

नहीं लिखना चाहते हम ...

नहीं लिखना चाहते हम ...
पर अनायास बन जाती है कविता
नहीं बहना चाहते हम ...
पर हर बार बन जाते है हम निर्बाध बहती सरिता
नहीं बदलना चाहते परिवेश हम ...
पर हर पल छिड़ी रहती है अंतस में लड़ाई
अन्दर कुछ है
जो करने लगता है मटियाने वाली प्रवृति पर चढ़ाई
चहुँ ओर फैली अराजकता ...और -
इंसानी बेबसी को महसूस आद्र हुए जाते हैं
समस्यायों को देख ..
हम अंधेपन का स्वांग नहीं भर पाते हैं
इसलिए
अब इस राह की यंत्रणाओं को तहे दिल से स्वीकार लिया है ..
मन मंदिर में एक नन्हा दीप जला लिया है ..
जब जीना ही चाहती है कविता ..
मानस की उत्प्रीड़क यात्राओं से उत्पन्न दुहिता ...
तो क्यूँ न सृजन की राह पे नन्हे कदम बढ़ाये जाएँ ..
कुछ संवेदनशील ... कुछ ओस की बूंदों से निर्मल गीत गाये जाएँ ..
अनिश्चितता की स्तिथि से -
दूर आ चुके हैं ..
अब रुकना नहीं है ..; चौराहे पे खड़े खड़े -
हम पहले ही कई कीमती पल गवां चुके हैं
आज आप भले ही इन विम्बों से हो सहमत नहीं .....
पर इतना तो स्वीकारो ....... कि यह प्रयास गलत नहीं .....
कौन जाने -
आपकी ज़रा सी सार्थक पहल हमे दृढ कर जाये !
संभावनाओ का आकाश बहुत ऊंचा होता है -
संभव है कल को ये भाव ही ....,रेगिस्तान में भटकती कृशकाय आत्माओं की रीढ़ बन जाये !!

10 टिप्पणियाँ:

माधव 16 अगस्त 2010 को 9:29 am  

well said

anupama 16 अगस्त 2010 को 9:43 am  

dhanyavad!

वन्दना 16 अगस्त 2010 को 10:40 am  

सुन्दर भाव्।

संगीता स्वरुप ( गीत ) 16 अगस्त 2010 को 10:50 am  

संभावनाओ का आकाश बहुत ऊंचा होता है -
संभव है कल को ये भाव ही ....,
रेगिस्तान में भटकती
कृशकाय आत्माओं की रीढ़ बन जाये !!

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ..आशा का संचार करती हुई

संगीता स्वरुप ( गीत ) 16 अगस्त 2010 को 11:40 am  

मंगलवार 17 अगस्त को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है .कृपया वहाँ आ कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ....आपका इंतज़ार रहेगा ..आपकी अभिव्यक्ति ही हमारी प्रेरणा है ... आभार

http://charchamanch.blogspot.com/

संगीता स्वरुप ( गीत ) 16 अगस्त 2010 को 11:41 am  

ऐसा हो .....कविता को लिया है ....बाकी मैं बाद में पढूंगी ..:)

अनामिका की सदायें ...... 16 अगस्त 2010 को 7:59 pm  

सुंदर अभिव्यक्ति.

वाणी गीत 17 अगस्त 2010 को 12:31 am  

नहीं चाहते हुए भी
बन जाया करती हैं
अनायास ही कवितायेँ ...
सच्चे एहसास ...!

'अदा' 17 अगस्त 2010 को 2:11 am  

ऐसा ही होता है शायद...
मन के उदगार..कभी भी, कहीं भी , कैसे भी अभिव्यक्त हो जाते हैं.....और सृजन हो जाता है एक कविता का...
सुन्दर अभिव्यक्ति ...

anupama 18 अगस्त 2010 को 6:12 am  

dhanyavad aap sabhi ka...
shabdashish paakar dhanya hui!

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ