अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

लेखनी है रमी... आज लिख डालो!

आँखों की सकल
नमी... आज लिख डालो!
आसमानी सपने छोड़
दूब जिसको है समर्पित
चरणों के नीचे वो ठोस
जमीं... आज लिख डालो!

कितने ही
प्रवाह में हो सरिता
चुन सारे कीचड़ कंकड़, अपनी
कमी... आज लिख डालो!

अपनी व्यथा
सागर की कथा
शब्दों के उलट-फेर में है
थमी... आज लिख डालो!

अपनी छोटी सी धरती
की कई गहन समस्यायों के
कारण कहीं न कहीं, खुद हैं
हमीं... आज लिख डालो!

जाने कल क्या हो
शायद आज ही कोई जगे-
अपनी बात सुन, लेखनी है
रमी... आज लिख डालो!

संवेदनशीलता पर बर्फ है
जमी... आज लिख डालो!
हवा का अट्टहास
और धरती की पीड़ा,
अश्रुधार से भीगे हृदय की
नमी... आज लिख डालो!

19 टिप्पणियाँ:

संगीता स्वरुप ( गीत ) 26 सितंबर 2010 को 6:33 pm  

संवेदनशीलता पर बर्फ है
जमी... आज लिख डालो!
हवा का अट्टहास
और धरती की पीड़ा,
अश्रुधार से भीगे हृदय की
नमी... आज लिख डालो!

बहुत सटीक बात कही है ..अपनी ही कमी होती है जो समस्याएं आती हैं ...

Travel Trade Service 26 सितंबर 2010 को 6:34 pm  

!अनुपमा जी ...अच्छी कविता आप की ...पर मुझे आप जिस बात के लिये जानि जाती है उसमें थोड़ी कमी लगी है ...वो जोश इसमें मुझे कम लगा फिर बीच में आप की ये पंक्तिया सुन्दर लगी ..!!!
अपनी व्यथा
सागर की कथा
शब्दों के उलट-फेर में है
थमी... आज लिख डालो!!!!..........इस में आप की थोड़ी जोश वाली वो बात लगी ....पर फिर भी आप का प्रयास अच्छा है आप इस को जारी रखें !!!!

हमारीवाणी.कॉम 26 सितंबर 2010 को 6:37 pm  

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संजय भास्कर 26 सितंबर 2010 को 7:01 pm  

Beautiful as always.
It is pleasure reading your poems.

अनामिका की सदायें ...... 26 सितंबर 2010 को 7:57 pm  

सुंदर कविता.

डॉ. नूतन - नीति 26 सितंबर 2010 को 8:29 pm  

बहुत सुन्दर कविता है अनुपमा जी ! धन्यवाद जो आपने लिख डाला और हमें पड़ने के लिए उपलब्ध हुवी ये सुन्दर रचना |

boletobindas 26 सितंबर 2010 को 9:14 pm  

आसमानी सपने छोड़
दूब जिसको है समर्पित
चरणों के नीचे वो ठोस
जमीं... आज लिख डालो!

बेहत सुंदर कविता....

M VERMA 27 सितंबर 2010 को 1:13 am  

अपनी व्यथा
सागर की कथा

व्यथा वृथा न हो, आज लिख डालो
बेहतरीन रचना ...

Udan Tashtari 27 सितंबर 2010 को 5:45 am  

बहुत उम्दा!

शारदा अरोरा 27 सितंबर 2010 को 11:22 am  

ek pravaah ke sath ..bahut sundar , sahaj abhivyakti ...aaj likh daali hai aapne .

संगीता स्वरुप ( गीत ) 27 सितंबर 2010 को 11:38 am  

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 28 - 9 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

http://charchamanch.blogspot.com/

अनुपमा पाठक 27 सितंबर 2010 को 12:41 pm  

shabdashish hetu sabhi ka aabhar!

वन्दना 27 सितंबर 2010 को 12:44 pm  

बेहतरीन सशक्त रचना सोचने को मजबूर करती है।

अनुपमा पाठक 27 सितंबर 2010 को 12:46 pm  

dhanyavad vandana ji!

mahendra verma 27 सितंबर 2010 को 5:04 pm  

कविता में शब्दों और भावों की करीगिरी स्पष्ट झलक रही है ...आपकी सुकोमल लेखनी को नमन।

वाणी गीत 28 सितंबर 2010 को 4:10 am  

सब ही लिख डालो ...
अच्छी कविता ...!

निर्झर'नीर 28 सितंबर 2010 को 6:54 am  

जाने कल क्या हो
शायद आज ही कोई जगे-
अपनी बात सुन, लेखनी है
रमी... आज लिख डालो!

संवेदनशीलता पर बर्फ है
जमी... आज लिख डालो!
हवा का अट्टहास
और धरती की पीड़ा,
अश्रुधार से भीगे हृदय की
नमी... आज लिख डालो!


बहुत खूब ..चर्चा मंच से आपको पढ़ने का मौका मिला आपका और चर्चा मंच का आभार .

रचना दीक्षित 28 सितंबर 2010 को 8:55 am  

बहुत सटीक बात कही है मंच से आपको पढ़ने का मौका मिला

sunshine 28 सितंबर 2010 को 9:47 am  

कितने ही
प्रवाह में हो सरिता
चुन सारे कीचड़ कंकड़, अपनी
कमी... आज लिख डालो!

beautiful lines.....

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