अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

हैप्पी बर्थडे, अर्णव...!

Dear Arnav,
Well, I heard that you are also called Anu... भैया कहते हैं अर्णव से अर्णु पुकारते पुकारते अनु हो गया तुम्हारा भी नाम... चलो ऐसा ही है जीवन... हम सब अलग अलग होते हुए भी एक ही हैं... अब देखो तुम अर्णव और हम अनुपमा होते हुए भी अनु हैं... ये कितनी सहज सामान्य सी बात है लेकिन तुम्हारी बुआ अभिभूत है इस बात से...! जन्मदिन है आज तुम्हारा... पहली बार तुमसे बात हो रही है... क्या उपहार दें... ये समझ नहीं पा रहे हैं... बस लिखना शुरु कर दिया है... देखें क्या सृजित होता है तुम्हारे लिए...! 
बच्चे, हम लोग बेहद अजीब समय में जी रहे हैं... यहाँ अपने सिवा सबको दूसरे अधम ही लगते हैं... विश्वास और प्रेम निश्छलता खो चुके हैं... जिसमें रत्ती भर भी स्वार्थ नहीं होना चाहिए था... वह प्रेम भी अब स्वार्थ का ही मूर्त रूप बना बैठा है... ऐसे में हम सब को सिखाओ अपनी भोली बातों से कुछ सुन्दर... शाश्वत और नवीन...! हम तुम्हें क्या देंगे... तुम ही दे सकते हो हमें उम्मीद... और दे भी रहे हो अपनी सहज अठखेलियों से...!
तुम दोनों की आवाज़ इतनी दूर इस तरह पहुंची जैसे तरसते हुए मरूस्थल में फुहारें पहुँचती हैं... जन्मदिन तुम्हारा है और उपहार भी तुम ही दे रहे हो... अद्भुत है भाई यह तो...! :)
प्यारी अन्वेषा का हमेशा ख्याल रखना... कितनी स्मार्ट है वो... देखना जब कमज़ोर पड़ोगे तुम वो बनेगी तुम्हारी उर्जा... तुम्हारी शक्ति... खूब मिल जुल कर रहना... उसे बहुत प्यार देना... बदले में तुम्हें दुनिया भर का स्नेह मिलेगा उससे...  अब देखो तुम्हारी अनु बुआ के पास देने को कुछ है नहीं तो खाली बकबक ही तो करेगी न फ़ालतू...
चलो नाना जी के साथ एन्जॉय करो... पापा से बड़ा वाला केक मंगवाओ और मनाओ खुशियाँ दोस्तों के साथ... हम फिर बात करेंगे...!
जब आयेंगे तो लेते आयेंगे ढेर सारे चोकलेट्स और खिलौने और अन्वेषा के लिए सबसे प्यारी वाली गुड़िया...
अब मस्ती करो तुमलोग... खूब खुश रहो...
बहुत बहुत स्नेह...
और एक बार फिर से हैप्पी वाला बर्थडे... !!!

Yours,
Anu...

कतरनें...!


यात्रा में यहाँ वहाँ, रोते हँसते, दौड़ते भागते, भींगते सूखते लिखे गए कुछ चुटके पूर्जों को सहेजते हुए... ::

बादल न आकाश का होता है... न ही ज़मीन का... दोनों के बीच उपस्थित वह केवल भ्रम ही जीता है... हमारी तरह... आसमान के होने का भ्रम... और हवा के न होने का भ्रम... दिखती नहीं पर होती है हवा... दीखता है पर आकाश होता नहीं वास्तव में... वो तो बस अनंत है... नीला रंग अनंत का ही विस्तार है... 

*** *** ***

ज़िन्दगी सफ़र में है और सफ़र के साथ जुड़ी हैं लाखों अनिश्चितताएं... उस पर जीवन, जीवन तो अनिश्चितता का ही पर्याय है... तो यह स्वाभाविक ही है कि सफ़र और ज़िन्दगी दोनों साथ चल रहे हों  तो अनिश्चितताएं तो होंगी ही... भले खीझ हो जितनी भी... कष्ट हो कितना भी... चलना तो होता ही है... और विकल्प क्या है हमारे पास...

*** *** ***

यकीन करना तुम्हारे होने से ही होती है धूप स्नेहिल... वो जरा सी धूप अभी खिली है... जरा सी नर्म धूप जो मुझे हृदय से लगाने को तत्पर है... नाराज़ नहीं हो न...?

*** *** ***

रास्ते सीखाते हैं पाँव की चोट की परवाह किये बगैर चलते जाना... कितनी चोट कितने गड्ढे... कितना ही दंश क्यूँ न झेल रहे हों... रास्ते  चलना कभी नहीं छोड़ते...!

*** *** ***

मुस्कान खिली रहे मुखड़े पर... पार लग जायेगी नाव
कविता के आँगन में ही तो है... अपने सपनों का गाँव 



सब तुम्हारे नाम करते हैं...!!


ऐसा ही है जीवन
हसरतें पूरी नहीं होतीं...


उत्तर की  आस ही  शायद व्यर्थ है
हर बात हर किसी के लिए जरूरी नहीं होती...



कुछ मिलते सार्थक सवाल भी अगर
ज़िन्दगी यूँ अधूरी नहीं होती...


हम प्रश्न हो कर
प्रश्नचिन्ह बन कर ही जीते हैं...


अमृत कहाँ मिलेगा
गरल ही हर क्षण पीते हैं...


ऐसे में जीवन मुस्कुराता है
मौन ही मौन स्नेह जताता है...


भावविभोर फिर नम आँखें बरस जाती हैं
जब क्षितिज पर मिलने को उनकी आत्माएं तरस जाती हैं...


धरा गगन को फिर हम प्रणाम करते हैं
जितना स्नेह है मेरी झोली में सब तुम्हारे नाम करते हैं...!




अनचीन्हे... अनजाने द्वीप...!!

हों जलते हुए दीप,
दिल हों समीप...!
फिर रौशनी ही रौशनी है,
जो
संग सद्भावों के हों
मोती... सीप...!!


मन के आँगन को,
फिर से दिया लीप...!
साफ़ सुथरी हो गयी माटी,
ये जाना--
हम सब हैं
सागर मध्य खोये हुए द्वीप...!!


नियति
ले आती है समीप...!
लहरें एक से दूसरे का दर्द जोड़े हैं,
तभी तो जुड़ जाते हैं न
कभी प्रत्यक्ष न मिल पाने वाले
अनचीन्हे द्वीप... अनजाने द्वीप...!!



*** *** ***

बाल्टिक सागर के मध्य द्वीपों को देखते हुए... स्मरण करते हुए एक यात्रा को...


 

कबीरा खड़ा बजार में...!

काश!
हमारे पास घर होता,
तो फूंक डालते...


फूंक डालने के लिए
घर होना ज़रूरी है
और वो भी अपना...;


व्यथित है मन आज
क्यूंकि,
जो मन चाहे वो नहीं कर सकते,


अभाव कुछ नहीं है...
कहीं नहीं है;
लेकिन,
हमारे पास कुछ अपना भी तो नहीं है
फूंक डालने के लिए...
ये क्या कम अभाव है!


घर क्या... पड़ाव क्या
अपना तो यहाँ जीवन भी नहीं
हर सांस की कीमत चुकाते हैं हम
तब जाकर कहीं जी पाते हैं हम


आकाश हमारा अभी जाने कहाँ खोया है
अभी बंधे हुए हैं हाथ हमारे
विश्वास है, ऐसा हमेशा नहीं रहेगा...
फिर चल देंगे साथ तुम्हारे!

*** *** ***

२०० से ऊपर अधूरे ड्राफ्ट्स के बीच ये एक मिला... अधूरा पूरा सा... जाने कब किस मनः स्थिति में लिखा था... पर है तो ये सच्ची ही बात... सामान्य इंसान बेबस ही तो होता है... कबीर होने के लिए... और कबीर के साथ चल देने के लिए जिस अदम्य साहस की आवश्यकता है... वो है क्या इस कलयुगी चेतना के पास कहीं ?

"वो खिड़की, खुली रखना..."



...आंसुओं से ऐसा कुछ रिश्ता बन गया है... कि इसके सिवा कुछ सूझता ही नहीं आजकल... कितना कुछ है करने को... पढने को कितनी किताबें झोला भर कर ले आये हैं लाइब्रेरी से... लिखने को कितना कुछ है... कितनी यात्राएं अनलिखी पड़ी हैं... कब करेंगे ये सब अगर ये रोने धोने में ही लगे रहेंगे...! लिखा जाना इस लिए जरूरी है क्यूंकि लिखा जायेगा तभी मेरी यात्रा पूरी होगी... सुशील जी कहते हैं... कि हम तो होकर भी वहां नहीं होते जहाँ फिजिकली प्रेजेंट होते हैं... इस यात्रा में भी ऐसा ही था... हम लोग घूमने निकलते थे बेहद थक हार जाने के बाद किसी ट्राम पर... कि बैठे बैठे शहर देख लेंगे... तब हम या तो कागज़ कलम में व्यस्त होते या कोई किताब होती हाथ में... या फिर जाने क्यूँ आँख भरी होती और हम दुपट्टे से अपना मुंह ढक कर बस सो/रो रहे होते... ऐसे में बस यही फंडा है हमारा... "आप देख लीजिये... तस्वीरें ले लीजिये... हम इसपर बाद में बात कर लेंगे... आपके थ्रू ये सब बाद में हम घूम लेंगे कि अभी कहीं और है मन... क्या देखे नज़ारे... मन में जब सागर उमड़ा हुआ हो...!" तो तस्वीरों और उनके विवरण को भी तो लिखना है न... तभी तो पूरी होगी यात्रा कि जितने भी शहर घूमे हम... सब आधा अधूरा ही देखा... आधे समय उलझे जो रहे... और सुशील जी ने सारे प्रूफ रखे हैं मेरी बदमाशियों के... मेरी रोती हुई कितनी ही तस्वीरें... अभी जब क्लिक की गयी करीब आठ हज़ार तस्वीरों से टुकड़ों टुकड़ों में इन पांच छः दिनों में गुज़रे हैं... तो यही पाया... आधी तस्वीरें शहरों की हैं... और आधी मेरी विभिन्न बदमाशियों की... एक तस्वीर हम दोनों की संग है... जो हमने प्राग के हिमालय रेस्टोरेंट में उस लड़की से क्लिक करवाई थी... 

उस रेस्टोरेंट में हम दो बार गए थे अपने दो दिनों के स्टे में... और दोनों दिन उस विशाल करीने से सजे रेस्टोरेंट में हम दोनों ही अकेले विजिटर थे... खूब तस्वीरें ली... आराम किया... मुस्कुराते हुए बुद्ध की प्रतिमा को प्रणाम किया... कुछ बेहद सुन्दर पल बिताये वहाँ... याद रहेगा हिमालय... वहां बैठे हुए हमने कागज़ की नाव जो बनायी थी...!



बस यूँ ही शुरू कर दिये लिखना... ये सोचें कि सब ठीक हो जायेगा फिर आराम से लिखेंगे तब तो हो गया इसलिए अब यूँ सोच लेते हैं कि लिखेंगे तो सब ठीक हो जायेगा धीरे धीरे... कि जो छूट गया हमसे वो सुशील जी की ली गयी तस्वीरों में है... और जो उनसे छूट गया उन दृश्यों की तस्वीरें हमने ले रखी हैं...! ऐसी ही एक तस्वीर है यह... बुडापेस्ट की सुबह की... डेन्यूब ने शहर को जैसे प्रतिविम्ब होने की सहूलियत दे कर कितने ही दर्द को पनाह दिया हो... कि पानी में सब झिलमिल सुन्दर था...



पोलैंड के तीन शहर... वहां से प्राग... फिर बुडापेस्ट... इतने सारे शहरों... देशों की कथा लिखनी हो तो पहले ही यात्रा वाली थकान हो जाती है... अभी तो थकान मिटी भी नहीं है... टूटे फूटे लौटे हैं... पहले ठीक तो हों... 
लिखते हैं सब विस्तार से...

तब तक इसके साथ विराम लेते हैं जो वार म्यूजियम से लौटते हुए क्राकोव स्टेशन पर बैठ कर लिखे थे... बहुत उदास था मन... जिन मंज़रों को देख कर लौटा था मन उसके बाद सामान्य स्थिति में लौट आना बेहद कठिन था... खूब रोने की इच्छा थी... पर नहीं रो सकते थे... सेंट्रल स्टेशन पर सीन थोड़े न क्रिएट करना था... सो कागज़ कलम लेकर शब्दों में ही उलझाना था खुद को... शब्द वो दर्द नहीं व्यक्त कर सकते... लेकिन विडम्बना है शब्दों के अलावा कोई विकल्प भी नहीं... और व्यक्त होना भी जरूरी है... कि दुःख रिसता है... उसे यूँ बंद करके नहीं रखा जा सकता... संग्रहालय तो बना दिया इतिहास में हुई क्रूरता का पर वो केवल संग्रहालय नहीं है... वो दुखद स्मृति है हमारे वहशीपने की जो रिसती रहेगी पोर पोर से दर्द बन कर आने वाली शताब्दियों तक... लौटने वाली हर आँख नम थी जिसने भी वो मंज़र देखा... हम तो सिर्फ संग्रहित यादें देख कर लौट रहे थे... पर उस दर्द की परिकल्पना से सिहरे हुए भी थे...


आज भी गूंजता है सन्नाटा वहाँ पर...
मौत को यूँ देख कर ज़िन्दगी की भाग दौड़ में बस शामिल हो जाना इतना सहज नहीं... पर यात्रा है न... चलना तो था... अब प्राग बुला रहा था हमें...

हम बिन पानी के मीन हैं...!

खिली रहे
मुस्कान...
धारा संग निश्चित
नाव का प्रस्थान...


हम सब
अपने अपने "तुम" तक की यात्रा में
तल्लीन हैं...
स्वाभाविक है बेचैनियाँ...
कि हम
बिन पानी के मीन हैं...!!


ये "तुम"
स्व की ही पहचान है...
अनन्य-अभिन्न,
वो अपना ही दूसरा नाम है...


उस तक पहुंचना तो
उद्देश्य  है  ही पर उस तक की यात्रा
अधिक अनमोल है...!
यात्रा सिखाती है कुछ जरूरी पाठ जीवन के
सुख दुःख से परे जिए जाते हैं जो लम्हे
उनका ही असल मोल है... !!




कभी तो हमें अपना कहोगे...!

कभी तो किनारे मिलेंगे
मुरझाये चेहरे कभी तो खिलेंगे
कभी तो नाव किनारे लगेगी
ज़िन्दगी कभी तो ज़िन्दगी की तरह मिलेगी
कभी तो हमें अपना कहोगे
कब तक यूँ सपना रहोगे...


कभी तो जरा सा अवकाश होगा
साथ दो घड़ी का सुकून हमारे पास होगा
कभी तो ख़ुशी आँखों से छलकेगी
नेह की भाषा बात बात में झलकेगी
कभी तो हमें अपना कहोगे
कब तक यूँ सपना रहोगे...


कभी तो विरोधाभास घुटने टेकेंगे
हम सारे अगर मगर दूर फेंकेंगे
कभी तो मौन मुखर होगा
कितने दुखों को हमने संग है भोगा
कभी तो हमें अपना कहोगे
कब तक यूँ सपना रहोगे...



वो केवल निमित्त थी...!

नियति ने
सब तय कर रखा होता है...
लीलाधर की लीला है
सब परमेश्वर की माया है...


निमित्त मात्र बना कर लक्ष्य वो साधता है
ईश्वर स्वयं पर कभी कोई इलज़ाम नहीं लेता है
यूँ रचे जाते हैं घटनाक्रम बड़े उद्देश्य की पूर्ती हेतु
जिसे आयाम देने को बनता है कोई जीव ही सेतु 


कैकेयी भी केवल निमित्त थी...
माँ थी वो... वो सहज सौम्य चित्त थी...


ये समय की मांग थी
जिसे कैकेयी ने स्वीकारा था...
राम के वन गमन की पृष्ठभूमि तैयार करनी थी न
सो कैकेयी ने यूँ अपना ममत्व वारा था... 



सारा कलंक अपने ऊपर ले कर
माँ ने अद्भुत त्याग किया...
राम "राम" हो सकें इस हेतु
कैकेयी ने वर में पुत्र को वनवास दिया...


कौन समझेगा इस ममता को... ?
ऐसे अद्भुत त्याग को...!
वीरांगना थी कैकेयी...
दुर्लभ है समझना उस आग को...!!!


*** *** ***

इसीलिए तो
अपने आस पास हम
"सुमित्रा" और "कौसल्या" तो सुन लेते हैं
पर "कैकेयी" किसी का नाम नहीं होता! 


क्यूंकि...
कैकेयी होना किसी के वश की बात नहीं...
अपनी कीर्ति-अपकीर्ति की परवाह किये बिना जो समर्पित हो
ऐसी भक्ति दुर्लभ है... अब ऐसी दिवा रात नहीं... 


उच्च उदेश्य की खातिर मिट जाना
जीवन का एकमात्र उद्देश्य यही... है यही शाश्वत एक तराना 


कैकेयी का पात्र ऐसी ही अविरल प्रेरणा है...
राम जानते थे अपनी माता की विशालता को...
उसे समझने की खातिर...
जग को अभी बहुत कुछ बुझना देखना है... ...!!!

जरा गुनगुना कर देखो...!

अँखियों में
एक ख़्वाब नया
सजा कर देखो...
मंज़िल भी मिल जाएगी
ज़रा कदम तो बढ़ा कर देखो!


भूलना हो गर...
अपने हिय का दर्द
दूसरों के गम को अपना कर देखो!


अनुभूति में है बसती
इसकी आत्मा...
ज़िन्दगी को कभी
किताबी परिभाषाओं से परे हटा कर देखो!


रास्ते हैं, सफ़र है, मंजिलें हैं
जरा गुनगुना कर देखो...
वो भी आ जायेगा पास
पहल तुम ही कर लो
कदम तो बढ़ा कर देखो! 


ज़िन्दगी को कभी
किताबी परिभाषाओं से परे हटा कर देखो...!!!


... ... ... ??

१९९८ में कभी लिखी गयी यह लम्बी प्रश्नमाला... पहले कभी एक टुकड़ा याद के आधार पर लिखा था अनुशील पर इधर... आज डायरी के पन्ने कुछ और ढूंढते हुए मिल गए तो सोचा सहेज लें... प्रश्नों की माला तो सजा दी है... शायद उत्तर होने का क्रम भी यहीं से सीख पाए हम और प्रभु की प्रेरणा से उत्तरों की श्रृंखला भी लिख पाएं कभी...!!!



पूछेंगे तुमसे हम
एक रोज़ भगवन
कि कहाँ है तुम्हारा निवास
कहाँ है प्रकाश
क्यूँ भेजा हमें यहाँ
सबकुछ है बिखरा जहाँ
दीनू को मरता देख दिनेश आद्र क्यूँ नहीं होता
मंगू क्यूँ अक्सर भूखे ही है सोता
क्यूँ दीप झोपड़ी का बुझा बुझा सा होता है
जबकि महलों में दिवाली का सा माहौल बना होता है
रौशनी भी क्यूँ छलती है
क्यूँ दीन हीन साधनविहीन जनता न्याय के लिए हाथ मलती है
क्यूँ बिकती है दुकानों में
रखी हुई आस्था बीच सामानों के
समय का रुख क्यूँ बेरहमी से करवटें बदलता है
क्यूँ खोजने पर भी आयाम नहीं मिलता है
क्यूँ हर पल कमी खलती है
क्यूँ समय के आगे हमारी एक नहीं चलती है
क्यूँ लूटने का सिलसिला रुकता नहीं
फूलों की डाली सम क्यूँ इंसान झुकता नहीं
दर दर भटकने के बाद भी क्यूँ अमृत तत्व नहीं मिलता
आखिर क्यूँ बेबस एक भी पत्ता नहीं हिलता
अखबार खून से लथपथ क्यूँ होता है
खोखला करने वाले काँटों को कौन और आखिर क्यूँ बोता है
क्यूँ बुढ़िया रो रही है
क्यूँ दुनिया सो रही है
क्यूँ तुम्हारा विम्ब नहीं मिलता
मेरे आसपास फूल क्यूँ नहीं खिलता
पूछेंगे तुमसे हम
एक रोज़ भगवन 


क्यूँ भक्ति का प्रसाद नहीं बंटता है
बादलों का काला समूह हृदय से क्यूँ नहीं छंटता है
इंसान को इतना कमज़ोर बना कर क्यूँ भेजा
क्यूँ पग पग पर बस मरीचिका ही सहेजा
शरीरधारी क्यूँ बन जाते हैं अधम अभिमानी
सुना था निश्चल बहता है तेरी करुणा का पानी
रामराज्य की नींव क्यूँ हिल जाती है
क्यूँ धरा को रक्तरंजित अन्धकार की किरणें लील जाती हैं
हमारा अहम् क्यूँ नहीं मरता
क्यूँ हमें हरिनाम नहीं मिलता
क्यूँ जनमानस की सुधि कोई नहीं लेता
क्यूँ नाविक उस वेग से नैया नहीं खेता
क्यूँ स्थितियां डांवाडोल हैं
क्यूँ धोखाधड़ी मक्कारी की नहीं खुलती पोल है
सब एक ही बार में समाप्त क्यूँ नहीं हो जाता
विनाश का तांडव क्यूँ हर रोज़ है रुलाता
पूछेंगे तुमसे हम
एक रोज़ भगवन 


कुशाषण की लपटों में क्यूँ भुनती है जनता
दो पाटों के बीच क्यूँ कुछ भी साबुत नहीं बचता
बस यूँ ही कोई क्यूँ किसी को है छलता
हर आँख में क्यूँ रेगिस्तान ही है ढ़लता
हाथ में खंजर लिए क्यूँ इंसान चल पड़ा है
खुदाई को रौंदने का मिथ्या मद क्यूँ बढ़ा है
क्यूँ ऐसा लगता है जैसे कोई पल पल चूसते जाता हो प्राण
और पल पल हो रही हो जैसे आस्था अंतर्ध्यान
संजीवनी लिए खड़े पवनसुत हमें प्राण क्यूँ नहीं देते
एक गदे के प्रहार से क्यूँ कुबुद्धि नहीं हर लेते
सीमा आग से क्यूँ धधक रही है
बंटी हुई धरती अबतक फफ़क रही है
इस भंवर जाल में क्यूँ नहीं दीखता कोई मसीहा
क्यूँ नहीं हो जाती आत्मा स्वार्थ के कारागार से रिहा
हम क्यूँ हर पल झूठे सपने हैं संजोते
और क्यूँ मोह मद में पड़कर सबकुछ हैं खोते
काहे दिया उदास लगता है
गोविन्द के देश में हर कोई हरि को ठगता है
राजमहल में सिहांसन पर क्यूँ वैभव ही बस दूना है
कांटो भरे ताज से अनुप्राणित कर्मपथ क्यूँ सूना है
क्यूँ एक बार ही जडें नहीं उखड़ जातीं
क्यूँ अज्ञान निर्लिप्त बुद्धि नहीं सुधर जाती
शाषण क्यूँ दुशाषण का दास है
किसने सौंपी नर भाग्य  की कुंजी उसके पास है
पूछेंगे तुमसे हम
एक रोज़ भगवन 


सुना है तुम्हारी लीला स्थली में अब भी तुम्हारा निवास है
क्यूँ तब भी अचेतन सा बादलों का उच्छ्वास है
मंदिर में पूजा का रूप हमें वीभत्स क्यूँ दीखता है
तुम्हारे दरबार में हर कोई अपना नियम लिखता है
क्यूँ आडम्बर का बोलबाला है
और भक्त भक्ति सहित कृशकाय काला है
काहे इतनी घी की बातियाँ यहाँ जलती हैं
और इधर सैकड़ों दीन हीन सांसें अंधकार की लौ में पलती हैं
प्रकाशपूंज होकर ऐसी पूजा क्यूँ ग्रहण करते हो
करुणानिधान हो कर मंदिर की ऊंची दीवारों के बीच रहते हो
यहाँ क्यूँ अभाव पलभर के लिए भी नहीं फटकता है
और एक सिपाही के घर में चूल्हा सुलगने को ललकता है
तुम्हारी मूर्ती के सत्कार में हर भक्त लगा रहता है
और कहीं बेचारा मूर्तिकार भूखे ही सब सहता है
तुम्हारी करुणा सबको देती है दिशा
फिर क्यूँ तेरे दरबार में शीश नवाने वालों की नहीं हर ली जाती है निशा
मंदिर की सीढ़ियों पर दीन का बसेरा क्यूँ है
तुम्हारा दरबार यूँ भिखारियों से घिरा क्यूँ है
वो कैसे सारी व्यवस्था पर तमाचा जड़ता हुआ चला जाता है
इंसा तो इंसा ईश्वर तक इस दौर में छला जाता है
रामनाम की चादर ओढ़ क्यूँ वह अन्याय का पक्ष लेने को आमादा है
तेरे दरबार के आडम्बरियों ने अभी कहाँ तुझे साधा है
जब छल छद्म ने तेरे दरबार को भ्रष्ट किया
तब नियति ने क्यूँ अपना विरोध नहीं स्पष्ट किया
पूछेंगे तुमसे हम
एक रोज़ भगवन 


विकारों का क्यूँ सघन होता जाता है आकार
तर्क वितर्क के चक्कर में प्रज्ञा को क्यूँ विचलित करता है व्यभिचार
काहे द्वन्द चला करता है
नर समाज में पामर क्यूँ भला रहता है
आत्मा पर क्यूँ एक व्यूह सा रचा है
और रंगमंच पर केवल चाम का तांडव ही मचा है
चेतना संसार में रहने की जहमत क्यूँ उठाती है
अरे! यहाँ तो खुलेआम अस्मत लूटी जाती है
काहे तेरा संसार माटी का दीवाना है
भोग से भाग इसे तो मीलों दूर जाना है
क्यूँ पंछी उड़ा करते हैं
क्यूँ हमारी आस्था से हर पल दीमक जुड़ा करते हैं
गतिहीनता विराट रूप में क्यूँ डसती है
विपदा क्यूँ ऐसी क्रूरता से हंसती है
प्राण विहीन अशक्त समुदाय का संगीत कहाँ खोया है
रणबांकुरे का अदद उत्साह कहाँ सोया है
क्यूँ रामबाण से प्राण नहीं फूंके जाते
क्यूँ अभागे नर मूढ़ता का गुणगान किये नहीं अघाते
सबको साथ लेकर मंजिल तक पहुँचने की बात भूल सी गयी है
इर्ष्या द्वेष के पुलिंदों में ध्येय की पोटली खुल सी गयी है
हर पल मोह निशा का अन्धकार छलने में पारंगत है
फिर भी हमारा हिय क्यूँ निर्मोही जीवन का शरणागत है
पूछेंगे तुमसे हम
एक रोज़ भगवन 

शीर्षकविहीन...!

समय बदल जाता है...
हम बड़े हो जाते हैं...
हमारी जगह बदल जाती है...
नए लोग हमारे अपने हो जाते हैं... 


हमारे "आज" का आसमान
हमें बुलाता है...
हमारे "कल" की धरती
हा! अकेली हो जाती है...! 


आँखों की नमी
जब सब धुंधला कर देती है...
ज़िन्दगी अपने नाम को सार्थक करती हुई
विडम्बनाओं से घेर लेती है... 


तो...
पिता प्रवेश करते हैं कविता में...
नम आँखों को दृढ़ता का पाठ पढ़ाते हैं...!
"जीवन ममत्व ही नहीं
कठोर अनुशाषण भी है" --
ये सत्य जताते हैं...! 


उनसे बेहतर
और कोई नहीं महसूस कर सकता
जीवन की इस प्रवृति को...
के ममत्व से भरा हृदय लिए हुए
वो जीवन पर्यंत कठोरता की प्रतिमूर्ति बने रह जाते हैं! 


बस इसलिए
कि वे वो संतुलन हैं...
जो जीवन को जीवन बनाता है...
ऐसा करते हुए
कई बार पिता बच्चों का
आसमान हो जाता है...  


वह आसमान
जिसका होना
एक अदद छत का होना है! 


भले ही
इसके लिए उस आसमान को
कितना ही क्षत विक्षत क्यों न होना हो
वह होता है सहर्ष
वर्ष दर वर्ष
कि
हम अपना आदर्श वहीँ से गढ़ सकें...
कर्मपथ पर वहीँ से ले प्रेरणा बढ़ सकें... 


वो हमारे विश्वास की रीढ़ है
हमारे संस्कारों की तरह अचल दृढ़ है


हमारी डूबती नैया की पतवार बन जाते हैं
समय आने पर पिता ममत्व का अवतार बन जाते हैं 


अब आज ही की बात है...


मेरे आसपास
बड़ा उचाट सा दिन है बड़ी उदास सी रात है
कविता भी दूर हो गयी... कहने लगी नीरस तुम्हारा साथ है 


तब पिता मुस्कुराये
कविता पर... कविता में 


और कहा...


"चलती चलो
जीवन है... परिस्थितियों संग ढ़लती चलो
अन्तःस्थिति को संवारो
परिस्थितियां स्वतः घुटने टेक देंगी
विश्वास रखो स्वयं पर नौकाएं तूफानों की रफ़्तारें देख लेंगी" 


ये सब लिखते हुए 

हम भीतर ही भीतर 

रुंधे हुए गले से जाने क्या गा रहे हैं...
पिता याद आ रहे हैं... !!
*** *** ***
यूँ ही जाने क्या सोचते समझते किस प्रेरणा ने यह सब लिखवाया... क्या शीर्षक दें... शीर्षकविहीन ही रहें ये भाव... शब्दों के अभाव को भावों की उर्वरता का शीर्षक मिले... दूरियों को संवेदनाएं पाट दें... मुस्कुराता रहे जीवन... मुस्कुराता रहे परिवार... मुस्कुराते रहें दुनिया के हर पिता...!!!

बूँदें हैं, नमी है...!!

बादल हैं, बारिश है, 

बूँदें हैं, 

नमी है...
सफ़र में 

साथ साथ चल रहे
आसमां और ज़मीं हैं...


यहाँ 

सब कुछ
बिखरा बिखरा है...
हो सके 

तो आ जाओ
दोस्त! तुम्हारी ही कमी है...


कितनी दूरी है, 

है कितना सामीप्य
कहो! क्या कभी माप पाएंगे हम...
बस ये जानो 

आँखों से ओझल हुए हो
तब से ही सांसें जैसे थमी हैं...


बादल हैं, बारिश है, 

बूँदें हैं, 

नमी है...
सफ़र में 

साथ साथ चल रहे
आसमां और ज़मीं हैं...


इक मेरा मन उदास है 

अपनी ख़ामियां 

गिन गिन कर...
कोई क्यूँ रहे भी पास
कि मुझमें 

लाखों कमी है...


ज़िन्दगी की राह में
जीवन से मिलने का अवसर 

आता है कभी कभी
घटित हुआ था वह एक दुर्लभ संयोग सा
तब से ही उसी मोड़ पर उसकी राह तकती 

निगाहें मेरी थमी हैं...


बादल हैं, बारिश है, 

बूँदें हैं, 

नमी है...
सफ़र में 

साथ साथ चल रहे
आसमां और ज़मीं हैं...!

क्षणिक जीवन का शाश्वत खेल...!

दूरियों  के मानक
नम करते रहे मन प्राण अंतर...
जीवन चलता रहा समानांतर... 


वैसे ही 

जैसे चलती हैं 

रेल की पटरियां...

एक निश्चित दूरी बनाये हुए


कि... 

पहुँच सके गंतव्य तक रेल

पटरियों की यात्रा अनंत तक है
शायद वहां वे मिलें
चलता ही रहना है क्षणिक जीवन का शाश्वत ये खेल...!! 


साथ हँसते हैं साथ रोते हैं

मिलते कभी नहीं
पर साथ होते हैं… 


वैसे ही 

जैसे होती हैं 

रेल की पटरियाँ...


जो दौड़ती तो साथ  हैं
पर एक दूसरे तक
कभी पहुँच नहीं पाती हैं

जीवन के जाने कैसे हैं रास्ते
भ्रम और सत्य की आँख मिचौनी में
ज़िंदगी ही ठगी सी रह जाती है...!! 


भींगा भींगा शहर है...!

खूब सारे रंग हैं
बारिश है…
भींगा भींगा शहर है…! 


खुशियाँ 

अनचीन्हीं अजानी हैं…
बादलों के पीछे से
झाँकती
जरा सी धूप है…  

अजाने ग़मों का कहर है…! 


हर क्षण
बीत रही है…
ज़िन्दगी
ढ़लता हुआ पहर है…!!

अन्तर्द्वन्द...!

ठिठका  सा है
वातावरण
मेरे शब्द मौन हैं…
चुप चुप से सोच रहे हैं
व्यक्त हो पाये जो शब्दों में
ऐसे भाव गौण हैं…!



तो लिखना क्या…
जो हैं नहीं वो दिखना क्या… 


बस
नम आँखों से अभी
आते जाते पलों को
महसूस रहे हैं…
भ्रम चहुँ ओर फैला हो
चीखता हुआ जब झूठ हो
ऐसे में सच के हौसले
खामोश रहे हैं…  


समय सत्य को प्रतिस्थापित करेगा ही
सो सत्य निश्चिंत है…
झूठ अपने पैतरे में लिप्त
लगता घड़ी भर को ही जीवंत है… 


ये हमारे भीतर
जाने कितना कितना 

कौन है...?
व्यक्त हो पाये 

जो शब्दों में
ऐसे भाव गौण हैं… … ???

बार्सिलोना यात्रा संस्मरण: कुछ चित्र कुछ अनुभूतियाँ...

जीवन ही यात्रा है... जाने अगले पल क्या घटित होना है किसे पता... हर क्षण अपने भीतर कोई न कोई आश्चर्य लिए ही प्रकट होता है... बस कभी हम महसूस कर पाते हैं उस आश्चर्य को... उस चमत्कार को... तो कभी वह लम्हा... अनदेखा अनजीया ही बीत जाता है... इस क्षण हम जिंदा हैं... यही क्या कम आश्चर्य है...! मृत्यु कभी भी कहीं भी किसी भी तरह हो सकती है... ऐसी अनिश्चितताओं के बीच सांसें चल रही हैं इस क्षण तो ये भी तो किसी आश्चर्य से कम नहीं... इस क्षण को धन्यवाद तो कहना ही चाहिए... इस क्षण का यह उपकार हमें कभी नहीं भूलना चाहिए और फिर इसी तरह हर आने वाला पल हमारी कृतज्ञता का साक्षी बने... जीवन निश्चित सुन्दर है... उसके होने का उत्सव होना ही चाहिए... उसका धन्यवाद किया ही जाना चाहिए...!

कई दिनों से स्थगित होता रहा  है लिखना... यात्रा संस्मरण प्रारंभ तो कर दिया था... एक पोस्ट लिखी भी लेकिन फिर यूँ उलझे कि सुलझे ही नहीं... उलझनें तो अब भी हैं पर जीवन एक और यात्रा की ओर ले जा रहा  है तो मन को किसी तरह बाँध कर लिखने बैठे हैं कि अगली यात्रा को निकलने से पूर्व पिछली यात्रा को तो लिख जायें... कि दर्ज़ हो जायें हमेशा के लिए कुछ अनुभव... टिक जाये चित्रों में कुछ लम्हे जो सदा स्मृतियों में जगमगाते रहेंगे...! समय है न... निर्दयी है बड़ा... बहुत डर लगता है... जाने कब क्या मिटा दे... तो बस बालसुलभ प्रयास ही है भोला सा हमारा कि हम बचा लेंगे खुशियाँ... हम बचा लेंगे स्मृतियाँ... और ये भी कि बचा लेंगे हम रेत पर अपने बनाये महल... ये जानते हुए भी लोज़िकली ये संभव ही नहीं... न खुशियाँ टिकती हैं... न स्मृतियाँ ही... और रेत के महल कब टिके हैं भला! खैर, कुछ भ्रम बने रहे तो ही जीवन चलता है... तो कुछ भ्रम गढ़ते हुए... अपना ही मन पढ़ते हुए चलते हैं कुछ देर यहाँ... क्या पता यात्रा संस्मरण भी कुछ आकार ले ले...!
शुरू करते हैं चित्रों से और वहीँ से कोई सिरा पकड़ कर कुछ अनुभूतियाँ... कुछ तथ्य और कुछ मुस्कानें आंसुओं की जमीं पर से चुरा कर साथ सहेजने का प्रयास करते हैं...



सग्रादा फैमिलिया एक रोमन कैथोलिक गिरजाघर है... यह अनतोनी गौदी द्वारा निर्मित है और अभी तक निर्माण कार्य अग्रसर ही है...! इस स्थान पर बहुत समय बिताया हमने पर अन्दर प्रवेश नहीं  ही कर सके समयाभाव के कारण क्यूंकि इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य तो मामा मामी से मिलना ही था... अगली बार के लिए छोड़ दिया हमने इस ईमारत के भीतर जाने की इच्छा को... कुछ अधूरा रहे तभी तो लौट आने की आस बंधती है... फिर जायेंगे इस दिव्य ईमारत के अवलोकनार्थ... शायद इसी छुट्टी में...! कलाकार की गहरी अंतर्दृष्टि ने कैसे कीर्तिमान रचे हैं उसका अनूठा उदहारण है यह पावन  स्थल!
*** *** ***
ये बार्सिलोना की एक सुन्दर सुनहरी शाम थी... अपने देश से इतनी दूर परिवार का साथ... ये अनोखे खुशियों के क्षण थे... पहली बार मिलना पहली बार मिलने की तरह नहीं था... ऐसा लगा जैसे कितनी ही बार मिल चुके हों पहले से... बड़े मस्ती में बीते पल... लिखने लगे तो कितने ही पन्ने कम पड़ जायेंगे... खूब सारी मस्तियाँ... खूब सारी बातें समेटते हैं फिर कभी... कि लिख जाना है... कुछ एहसासों को जिनके लिए मन सदैव तरसता है...!
*** *** ***



ऊँचाई से यूँ नज़र आता है शहर... जल थल नभ सब साथ ही दृश्यमान... सब साथ ही उपस्थित... जीवन की रागिनी गाते हुए... संग संग गुनगुनाते हुए...! बादलों की चिर परिचित उपस्थिति ने जल थल नभ जैसे सबको जोड़े रखा था... मनोरम था सबकुछ...!
*** *** ***



बार्सिलोना ऑलंपिक पार्क और ग्राउंड भव्य थे... खूब अच्छा समय बिताया हमने यहाँ तसवीरें क्लिक करते हुए...! आसमान पर कई गलत सही के निशान उकेर रखे थे बादलों ने... जो था सब बढ़िया था... विस्तार अगली पोस्ट में... क्यूंकि अब विराम लेना आवश्यक है कि अगली यात्रा पर निकलने का वक़्त हो गया है...!
*** *** ***

ये हम हैं... रेत पर खेलते हुए... समुद्र में भींगते हुए... एक अनकहे से अकेलेपन से जूझते हुए... पत्थर चुनते हुए... लहरों का संगीत सुनते हुए... धुंधले धुंधले से हम...! तत्वतः हम सब अकेले ही तो हैं... अकेले ही तो होते हैं... भीड़ में... साथ में... और हाथों में हाथ लिए हुए भी... के हमारी अनुभूतियों का फ़लक हमेशा जुदा होता है... हम हमेशा साथ होते हुए भी अकेले ही होते हैं जीवन के अरण्य में...! भावों के विस्तृत सागर में कभी ये दर्द दिव्य अनुभूति लिए होता है... और कभी होता है दर्द की कहानी भी...!
*** *** ***
बहुत कुछ शेष है सहेजा जाना... लिखा जाना... वो फिर कभी... अब उठें खुद को समेटें अगली यात्रा के लिए... पाँव में चोट है... हाथ भी जला है... और भी कई तरह की टूट फूट है भीतर बाहर... सब समेट कर निकलना है भटकने... शायद चलते रहना ही हर टूटन का उपचार हो... यात्रा ही सिखाएगी जीवन के नए अर्थ... और जोड़ेगी पुनः उस से... उन लम्हों से जो पीछे छूट गए... पोलैंड, प्राग, बुडापेस्ट... और भी कुछ एक पड़ाव... ढेर सारी तस्वीरों और कहानियों के साथ मिलते हैं कुछ अंतराल के बाद...!

तुम अप्रतिम गीत हो...!

हे मीत! हे सखे!
तुम सांध्यगीत हो...
हारती रही हूँ सदा से मैं
तुम मेरी जीत हो...!


जीवन
बहुत कठिन है बंधू...
तुम इस नीरवता में
मेरे लिए जीवन गीत हो...! 


मत चले जाओ
यूँ बिसार कर...
नहीं बचेगा कुछ भी शेष
कि तुम मन से मन की प्रीत हो...!


भाव भाषा का
अद्भुत अविरल नाता है
कल्पना से परे हैं तुम्हारे सद्गुण
तुम कल्पनातीत हो...!


हे ईश्वर! हे सखे!
हे मीत...!
तुम सदा सदा से... सदियों से...
सुन्दर अप्रतिम गीत हो...!


हारती रही हूँ सदा से मैं...
हाँ तुम मेरा अभिमान... तुम मेरी जीत हो...!


शीर्षकविहीन...!

भींगे मौसम में
याद आती है...
"स्नेहिल" धूप 


स्मरण हो आता है
कितनी ही...
कविताओं का स्वरुप 


रो पड़ता है मन...!


जीवन झेल रहा होता है मृत्युतुल्य कष्ट...
तभी कोई संजीवनी शक्ति कह उठती है भीतर से--


रूठ जाना भी है नेह का ही एक अनूठा रुप...


मत विचलित हो इस भींगे मौसम से
खिल आएगी फिर से...
कब तक भला ( ? ) रूठी रहेगी
वो जो है...
स्नेहिल धूप...!!!

ज़िन्दगी, तुम्हारे लिए!

कितनी ही
उलझनों से
घिरी हुई हो तुम...
कितनी ही उलझनें
मुझको भी घेरे है...


फिर भी
एक दूसरे के लिए
हम बिलकुल अपने है...
ये आने जाने का किस्सा है
जन्मों के ये फेरे हैं...


तुम्हारे लिये
तुम्हारी खातिर...
सब सह लेने का ज़ज्बा है
सब झेल जाने का हौसला है... 


जिजीविषा 

ज़िन्दगी की खातिर...

सदैव लड़ती है विषमताओं से, 

कौन झुठला पायेगा उसे...? 

जो नियति का अटल फैसला है...!! 

बस कुछ नमी हो...!

झिलमिल आँखों की नमी
नम करती रही मन प्राण अंतर


जीवन चलता रहा समानांतर...!


दुःख की रागिनी गाती रही
सुख के स्वप्न दिखाती रही


"एक ही सिक्के के दो पहलू हैं"-


सुख दुःख की आवाजाही
बस मन को यूँ बहलाती रही...!


सुख हो या कि दुःख 

दोनों में से कोई भी टिकता नहीं है...

दोनों में...
तत्वतः कहाँ कोई अंतर...


हर हाल में
चलता रहा है...
चलता रहता है...
चलता ही रहेगा जीवन समानांतर...


बस कुछ नमी हो...
जो नम करती रहे मन प्राण अंतर...!!!



अवलंब...!

आँखों में आया
आकर रुक गया...
आंसू तुम जैसा था क्या ?
ढलकते ढलकते चूक गया...!


अब भी अटका है
पलकों पर...
और
मुस्कुरा रहा है...


उदास सी है
कोई रागिनी...
वही वो कतरा
गा रहा है...


सुन सुन कर
विभोर हूँ...
मैं रात्रि का अन्धकार हूँ
मैं ही खिली हुई भोर हूँ...


ये समय ही है
जो हमें तराशता है...
हम कुछ नहीं हैं
बुलबुलों का कहाँ आयुष्य से लम्बा वास्ता है... 



आज हैं
कल नहीं रहेंगे...
तब भी तुम्हें हम
अपना कहेंगे...

अवलंब के अभाव में
नहीं टिक सकती ज़िन्दगी की छत...
क्षमा हो,सौहार्द हो... प्रेम यथावत रहे
भले कितना भी हो जायें क्षत विक्षत...


नत हैं हमेशा से
तेरे आगे श्रद्धा से सर झुक गया...
रूठ गए जो तुम तो देखो
"जीवन" जीवन होते होते रूक गया...!

लौट आओ...
बन कर सूरज... भोर... हवा... बारिश
मेरे आकाश का "काश..."
अपनी सार्थकता जाहिर करते करते जाने क्यूँ चूक गया...

खोया सा जान पड़ा अवलंब
हाँ! "जीवन" जीवन होते होते रूक गया... ... ... !!


स्नेह की छाँव...!


ये एक उदास सी सुबह है... आसमान में खूब सारे काले बादल हैं... तीन बजे का आकाश कुछ कुछ रौशनी बिखेर रहा है... जरा बुझा बुझा सा... कि शायद रात भर रोया है अम्बर... अब रुदन कहें या बारिश ये तो हमारे मन के मौसम की बात है... उदासी इस बारिश को रूदन कह देती है... वहीँ धुली धुली सी धरती को देख मन रुदन नहीं कह पाता बारिश को... वह इसे धरती के प्रति आसमान का नेह कह उठता है... आसमान धरा की खातिर ही तो बरसता है न... जो भी लिया उसने वह वापस लौटा देता है... बादल पुनः पुनः अपना स्वरुप त्याग धरा के हो जाते हैं... फिर से आसमान में बादल बनकर लौट जाने के लिए... ये तो क्रम है... चलता है चलता ही रहेगा...!

*** *** ***

काश! होते घर पर... अभी भारत में कुछ सात बजने को होंगे... मम्मी पापा से बात हुई... आज एनिवर्सरी है उनकी... ३६वीं सालगिरह... वहां होते तो साथ मंदिर जाते... फूल सजा कर देते उन्हें... पूरा जीवन तो मात पिता बच्चों के जीवन को फूल की तरह खिलाने में ही गुजार देते हैं... ईश्वर ने माता पिता का हृदय ही ऐसा बनाया है कि त्याग तपस्या वहां स्थान पाकर स्वयं को धन्य समझते हैं... 

*** *** ***

अभी अभी बीती है माँ पिताजी की भी एनिवर्सरी... २७ मई... जाने कहाँ खोये थे हम... ये दिन विस्मृत हो गया था... २८ को विश किया... उनकी ४३ वीं सालगिरह थी... वहां  होते तो अपनी तरह से सेलिब्रेट करते यह दिन... दोनों की तस्वीरें लेते... कुछ फूल और शब्द भाव का कोई तोहफा देते... पर बहुत दूर हैं हम... और उगते सूरज... खिलते चाँद को देख ये तसल्ली कर लेते हैं कि ये वही चाँद और सूरज हैं... जो वहां भी उगते डूबते हैं... गगन एक ही है... इसलिए दूरी हो कर भी कोई दूरी नहीं...! मन है  न... खुद को बहलाने के कई उपाय सोच लेता है...!!!

*** *** ***



तस्वीरों के खजाने खंगालते हुए मिली यह तस्वीर... हमारे विवाह के समय की... करीब छह वर्ष पूर्व की तस्वीर... [मम्मी, पापा, सुशीलजी, हम, पापाजी एवं मम्मी जी]... 

Happy anniversary Mummy & Papa and belated anniversary wishes to Mummy ji and papaji. May we always be together...!!!

*** *** ***

धीरे धीरे जरा सी लाली नज़र आ रही है अम्बर पर... सुबह हो रही है... मन के आकाश पर भी बाल अरुण अपने किरण पथ पर चल कर आते हुए दस्तक दें... इसी प्रार्थना के साथ... विराम देते हैं... लेखनी को... और नम आँखों से धन्यवाद करते हैं ईश्वर का इस जीवन के लिए... जीवन में प्राप्त अन्यान्य नेमतों के लिए...!


बनी रहे सदा सर्वदा
स्नेह की छाँव...
खिला खिला रहे
मन का गाँव... 


धरती की ओर
झुका रहे
विस्तार लिए अम्बर...
प्रीत की रीत सुहानी हो
वैसी ही दिव्यता लिए
जिस तरह कृष्ण को प्रिय है पीताम्बर...


खेता रहे वक़्त
जीवन की नाव...
दिगदिगंत तक बनी रहे
स्नेह की छाँव...!

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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