संकट बढ़ता ही रहा!

कभी यहाँ कभी वहाँ
जीवन चलता ही रहा
छोटे छोटे अनुपातों में
संकट बढ़ता ही रहा!

कहीं अभावों का समुद्र
कहीं समृद्धि के पर्वत
प्रकृति रहस्यमयी है
अपनी ही धुन में रत

सृष्टि के आरम्भ से
चक्र चलता ही रहा
छोटे छोटे अनुपातों में
संकट बढ़ता ही रहा!

युगों का अनुभव लिए
बढ़ रहें हैं हम सतत
विकास की गति ने
न छोड़ा कुछ भी पूर्ववत

इंसानियत का पाठ
क्षीण होता ही रहा
छोटे छोटे अनुपातों में
संकट बढ़ता ही रहा!

सुविधाएं सब हासिल
पर आत्मा क्षत विक्षत
जीने की राह में
जीवन ही मर्माहत

ये उल्टा खेल निरंतर
कैसे चलता ही रहा
हा! हम देखते रहे, और
संकट बढ़ता ही रहा!

36 टिप्पणियाँ:

महेन्‍द्र वर्मा 17 दिसंबर 2010 को 12:42 pm बजे  

सुविधाएं सब हासिल
पर आत्मा क्षत विक्षत
जीने की राह में
जीवन ही मर्माहत

ये उल्टा खेल निरंतर
कैसे चलता ही रहा
हा! हम देखते रहे, और
संकट बढ़ता ही रहा!

जीवन की वास्तविकता से परिचय कराती एक श्रेष्ठ रचना।...शुभकामनाएं।

मुकेश कुमार सिन्हा 17 दिसंबर 2010 को 12:54 pm बजे  

sankat badhta hi raha
fir bhi jeevan chalta hi raha..........
jeevan chalne ka naam hai mam..........:)
bahut khub........

Travel Trade Service 17 दिसंबर 2010 को 12:58 pm बजे  

सुविधाएं सब हासिल
पर आत्मा क्षत विक्षत
जीने की राह में
जीवन ही मर्माहत
ये उल्टा खेल निरंतर
कैसे चलता ही रहा
हा! हम देखते रहे, और
संकट बढ़ता ही रहा!.........वाह ,वाह, वाह ,....गज़ब की आप की कविता की अभिव्यक्ति जी आज के मानव जीवन की .....हम कहाँ जा रहें है ...कहाँ से आये है ...क्या पाया क्या खोया इस जीवन में ...सब कुछ समेट दिया आप ने इस कविता में ..खास कर ये पक्तियां गज़ब की लगी मुझे तो ..बहुत ही सुन्दर अनु जी ...बधाई और शुभकामनाएं आप को !!!!!!!!!!!!

Yashwant R. B. Mathur 17 दिसंबर 2010 को 12:59 pm बजे  

यथार्थ को खोल कर रख दिया है..अनु जी!
".....हा! हम देखते रहे, और
संकट बढ़ता ही रहा! ...."

एक एक पंक्ति लाजवाब है.

अपर्णा 17 दिसंबर 2010 को 1:19 pm बजे  

theek kaha anu, jivan isi trah chalta rahata hai . chhot-chhote anupatom mein sankaton ka hona ; ksheen hoti insaaniyat mein anubhavon ka satat prvaah ;aanusheelan mein bahati jivan ki dhaara aur kuchh vipreet pravaah - bas inhin ke madhy jivan chal raha hai .
sundar kavita anu..

Ghulam Kundanam 17 दिसंबर 2010 को 1:32 pm बजे  

अनुपमा बहन जी! संकट के इस अनुपात को अपनी आवश्यकता को कम कर दूसरों की आवश्यकता के लिए कुछ सोंच और करके संकट तथा अंतर को कम किया जा सकता है.
काफी मार्मिक एवं दर्द लिए हुए सुन्दर कविता.

Arvind Jangid 17 दिसंबर 2010 को 1:46 pm बजे  

सुन्दर भाव, यदि इंसान सुखों के पीछे ना भागता तो शायद ये अनुपात भी कम ही होता...साधुवाद.

Kailash Sharma 17 दिसंबर 2010 को 3:09 pm बजे  

सुविधाएं सब हासिल
पर आत्मा क्षत विक्षत
जीने की राह में
जीवन ही मर्माहत

हम जीवन को सुखमय और विलासपूर्ण बनाने की आपाधापी में आत्मा की आवाज को भूल जाते हैं और परिणाम स्वरुप जीना ही भूल जाते हैं. बहुत ही सशक्त अभिव्यक्ति..

Shekhar Suman 17 दिसंबर 2010 को 3:09 pm बजे  

बहुत खूब...

कहीं अभावों का समुद्र
कहीं समृद्धि के पर्वत
प्रकृति रहस्यमयी है
अपनी ही धुन में रत

सच में अजीब है..

सुनीता 17 दिसंबर 2010 को 3:11 pm बजे  

इंसानियत का पाठ
क्षीण होता ही रहा
छोटे छोटे अनुपातों में
संकट बढ़ता ही रहा!

यथार्थ से जुडी रचना ,,, बहुत खूब ,, इंसान इंसान ही बना रहे तो संकट कभी बढे ही ना ,, पर ,,,,,

मनोज कुमार 17 दिसंबर 2010 को 3:34 pm बजे  

रचना जीवन की अभिव्यक्ति है। काफी संतुष्टि प्रदान कर गई यह कविता।

Kunwar Kusumesh 17 दिसंबर 2010 को 3:57 pm बजे  

सुविधाएं सब हासिल
पर आत्मा क्षत विक्षत
जीने की राह में
जीवन ही मर्माहत

बहुत सही बात कही है आपने

Anita 17 दिसंबर 2010 को 4:21 pm बजे  

सुंदर अभिव्यक्ति!

बेनामी 17 दिसंबर 2010 को 4:24 pm बजे  

सुविधाएं सब हासिल
पर आत्मा क्षत विक्षत
जीने की राह में
जीवन ही मर्माहत

ये उल्टा खेल निरंतर
कैसे चलता ही रहा
हा! हम देखते रहे, और
संकट बढ़ता ही रहा!
--
इसी का नाम दुनिया है!
जो किसी पर रहम नहीं करती!

Sunil Kumar 17 दिसंबर 2010 को 4:33 pm बजे  

सुविधाएं सब हासिल
पर आत्मा क्षत विक्षत
जीने की राह में
जीवन ही मर्माहत
सुंदर अभिव्यक्ति!

संगीता स्वरुप ( गीत ) 17 दिसंबर 2010 को 4:34 pm बजे  

आपकी पोस्ट की चर्चा कल (18-12-2010 ) शनिवार के चर्चा मंच पर भी है ...अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव दे कर मार्गदर्शन करें ...आभार .

http://charchamanch.uchcharan.com/

अनुपमा पाठक 17 दिसंबर 2010 को 5:28 pm बजे  

आप सबों का आभार!
@संगीता जी!
चर्चामंच पर स्थान देने के लिए धन्यवाद!

Manas Khatri 17 दिसंबर 2010 को 5:39 pm बजे  

शानदार रचना अनुपमा दीदी|
"इंसानियत का पाठ
क्षीण होता ही रहा
छोटे छोटे अनुपातों में
संकट बढ़ता ही रहा!" बहुत ही सच्ची बात कही है,
आदमी-आदमी की जान लेने पर ही तुला हुआ है| मैंने अपनी रचना 'सावधान! कलियुग आ रहा है' में कहा था-
"[..]यह तो कुछ भी नहीं, एक ऐसा भी दिन आएगा,
पैसों के लिए इंसान, इंसानों को बेंच खाएगा.
बदले में २०० ग्राम आलू, १०० ग्राम चावल,
५० ग्राम दाल, ५ बूँद देशी घी लाएगा,
इन सबको मिलाकर छोटी-छोटी गोलियाँ बनाकर,
सुबह-शाम खाएगा.
परिणामस्वरूप कलियुग का आतंक छा जायेगा||"-मानस खत्री

रश्मि प्रभा... 17 दिसंबर 2010 को 5:47 pm बजे  

सृष्टि के आरम्भ से
चक्र चलता ही रहा
छोटे छोटे अनुपातों में
संकट बढ़ता ही रहा!
bahut hi gahre bhaw

Swarajya karun 17 दिसंबर 2010 को 5:58 pm बजे  

जीवन के यथार्थ पर आधारित सुंदर कविता. आभार .

mridula pradhan 17 दिसंबर 2010 को 6:07 pm बजे  

har line kabile-tareef hai.

ѕнαιя ∂я. ѕαηנαу ∂αηι 17 दिसंबर 2010 को 6:35 pm बजे  

कभी अभा्वों का समुद्र कभी सम्र्रिधि के पर्वत ,
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति , बधाई।

वन्दना महतो ! (Bandana Mahto) 17 दिसंबर 2010 को 10:17 pm बजे  

बहुत गजब का लिखा है आपने.

अरुणेश मिश्र 18 दिसंबर 2010 को 6:14 am बजे  

प्रशंसनीय रचना ।
गति उत्थान- पतन की अभिव्यक्ति है ; यही आनन्द और संकट है ।

अरुणेश मिश्र 18 दिसंबर 2010 को 6:16 am बजे  

प्रशंसनीय ।

Er. सत्यम शिवम 18 दिसंबर 2010 को 6:23 am बजे  

bhut hi sundar rachna....aapki lekhni laajwaab hai....badhai ho

ashish 18 दिसंबर 2010 को 6:40 am बजे  

सुन्दर एवं अर्थपूर्ण रचना , जीवन की आपाधापी में इन्सान कहा जा रहा है आपने भावो को सुन्दर शब्द दिये है . आभार .

DR.ASHOK KUMAR 18 दिसंबर 2010 को 7:06 am बजे  

बहुत ही गहरे भावोँ को सँजोया है आपने अपनी कविता मेँ..........अद्भुत । बहुत बहुत आभार दी।

ManPreet Kaur 18 दिसंबर 2010 को 8:24 am बजे  

bahut hi acha laga pad kar... very nice..


mere blog par bhi sawagat hai..
Lyrics Mantra
thankyou

www.navincchaturvedi.blogspot.com 18 दिसंबर 2010 को 8:54 am बजे  

हम देखते रहे और संकट बढ़ता ही रहा

बहुत खूब अनुपमा जी|

कडुवासच 18 दिसंबर 2010 को 11:35 am बजे  

हा! हम देखते रहे, और
संकट बढ़ता ही रहा!
... kyaa baat hai ... behatreen rachanaa !!!

Dr. Zakir Ali Rajnish 18 दिसंबर 2010 को 11:35 am बजे  

महेन्‍द्र जी, कविता और संदेश दोनों बहुत प्‍या
रे हैं।
---------
छुई-मुई सी नाज़ुक...
कुँवर बच्‍चों के बचपन को बचालो।

M VERMA 18 दिसंबर 2010 को 4:37 pm बजे  

कहीं अभावों का समुद्र
कहीं समृद्धि के पर्वत
प्रकृति रहस्यमयी है
अपनी ही धुन में रत

प्रकृति ने तो असमान वितरण नहीं किया पर हमने ही प्रकृति का असमान वितरण कर दिया

निवेदिता श्रीवास्तव 18 दिसंबर 2010 को 7:09 pm बजे  

सुन्दर अभिव्यक्ति ।

Patali-The-Village 19 दिसंबर 2010 को 11:11 am बजे  

जीवन की वास्तविकता से परिचय कराती एक श्रेष्ठ रचना।...शुभकामनाएं।

ज्ञानचंद मर्मज्ञ 20 दिसंबर 2010 को 12:15 pm बजे  

अनुपमा जी,
"वाक्य में विराम सा
विस्मृत किसी नाम सा
गढ़ता नयी कहानी कोई
समय चलायमान रहा! "
नए प्रतिमानों और प्रयोगों के साथ आपकी कविता पढकर लगा की अभिव्यक्ति की कोई सीमा नहीं !
समय को लेकर आपने जितने भी विम्ब गढ़ें हैं सब एक से बढ़ कर एक हैं !
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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