कभी यहाँ कभी वहाँ
जीवन चलता ही रहा
छोटे छोटे अनुपातों में
संकट बढ़ता ही रहा!
कहीं अभावों का समुद्र
कहीं समृद्धि के पर्वत
प्रकृति रहस्यमयी है
अपनी ही धुन में रत
सृष्टि के आरम्भ से
चक्र चलता ही रहा
छोटे छोटे अनुपातों में
संकट बढ़ता ही रहा!
युगों का अनुभव लिए
बढ़ रहें हैं हम सतत
विकास की गति ने
न छोड़ा कुछ भी पूर्ववत
इंसानियत का पाठ
क्षीण होता ही रहा
छोटे छोटे अनुपातों में
संकट बढ़ता ही रहा!
सुविधाएं सब हासिल
पर आत्मा क्षत विक्षत
जीने की राह में
जीवन ही मर्माहत
ये उल्टा खेल निरंतर
कैसे चलता ही रहा
हा! हम देखते रहे, और
संकट बढ़ता ही रहा!
संकट बढ़ता ही रहा!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
17 दिसंबर 2010

36 टिप्पणियाँ:
सुविधाएं सब हासिल
पर आत्मा क्षत विक्षत
जीने की राह में
जीवन ही मर्माहत
ये उल्टा खेल निरंतर
कैसे चलता ही रहा
हा! हम देखते रहे, और
संकट बढ़ता ही रहा!
जीवन की वास्तविकता से परिचय कराती एक श्रेष्ठ रचना।...शुभकामनाएं।
sankat badhta hi raha
fir bhi jeevan chalta hi raha..........
jeevan chalne ka naam hai mam..........:)
bahut khub........
सुविधाएं सब हासिल
पर आत्मा क्षत विक्षत
जीने की राह में
जीवन ही मर्माहत
ये उल्टा खेल निरंतर
कैसे चलता ही रहा
हा! हम देखते रहे, और
संकट बढ़ता ही रहा!.........वाह ,वाह, वाह ,....गज़ब की आप की कविता की अभिव्यक्ति जी आज के मानव जीवन की .....हम कहाँ जा रहें है ...कहाँ से आये है ...क्या पाया क्या खोया इस जीवन में ...सब कुछ समेट दिया आप ने इस कविता में ..खास कर ये पक्तियां गज़ब की लगी मुझे तो ..बहुत ही सुन्दर अनु जी ...बधाई और शुभकामनाएं आप को !!!!!!!!!!!!
यथार्थ को खोल कर रख दिया है..अनु जी!
".....हा! हम देखते रहे, और
संकट बढ़ता ही रहा! ...."
एक एक पंक्ति लाजवाब है.
theek kaha anu, jivan isi trah chalta rahata hai . chhot-chhote anupatom mein sankaton ka hona ; ksheen hoti insaaniyat mein anubhavon ka satat prvaah ;aanusheelan mein bahati jivan ki dhaara aur kuchh vipreet pravaah - bas inhin ke madhy jivan chal raha hai .
sundar kavita anu..
अनुपमा बहन जी! संकट के इस अनुपात को अपनी आवश्यकता को कम कर दूसरों की आवश्यकता के लिए कुछ सोंच और करके संकट तथा अंतर को कम किया जा सकता है.
काफी मार्मिक एवं दर्द लिए हुए सुन्दर कविता.
सुन्दर भाव, यदि इंसान सुखों के पीछे ना भागता तो शायद ये अनुपात भी कम ही होता...साधुवाद.
सुविधाएं सब हासिल
पर आत्मा क्षत विक्षत
जीने की राह में
जीवन ही मर्माहत
हम जीवन को सुखमय और विलासपूर्ण बनाने की आपाधापी में आत्मा की आवाज को भूल जाते हैं और परिणाम स्वरुप जीना ही भूल जाते हैं. बहुत ही सशक्त अभिव्यक्ति..
बहुत खूब...
कहीं अभावों का समुद्र
कहीं समृद्धि के पर्वत
प्रकृति रहस्यमयी है
अपनी ही धुन में रत
सच में अजीब है..
इंसानियत का पाठ
क्षीण होता ही रहा
छोटे छोटे अनुपातों में
संकट बढ़ता ही रहा!
यथार्थ से जुडी रचना ,,, बहुत खूब ,, इंसान इंसान ही बना रहे तो संकट कभी बढे ही ना ,, पर ,,,,,
रचना जीवन की अभिव्यक्ति है। काफी संतुष्टि प्रदान कर गई यह कविता।
सुविधाएं सब हासिल
पर आत्मा क्षत विक्षत
जीने की राह में
जीवन ही मर्माहत
बहुत सही बात कही है आपने
सुंदर अभिव्यक्ति!
सुविधाएं सब हासिल
पर आत्मा क्षत विक्षत
जीने की राह में
जीवन ही मर्माहत
ये उल्टा खेल निरंतर
कैसे चलता ही रहा
हा! हम देखते रहे, और
संकट बढ़ता ही रहा!
--
इसी का नाम दुनिया है!
जो किसी पर रहम नहीं करती!
सुविधाएं सब हासिल
पर आत्मा क्षत विक्षत
जीने की राह में
जीवन ही मर्माहत
सुंदर अभिव्यक्ति!
आपकी पोस्ट की चर्चा कल (18-12-2010 ) शनिवार के चर्चा मंच पर भी है ...अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव दे कर मार्गदर्शन करें ...आभार .
http://charchamanch.uchcharan.com/
आप सबों का आभार!
@संगीता जी!
चर्चामंच पर स्थान देने के लिए धन्यवाद!
शानदार रचना अनुपमा दीदी|
"इंसानियत का पाठ
क्षीण होता ही रहा
छोटे छोटे अनुपातों में
संकट बढ़ता ही रहा!" बहुत ही सच्ची बात कही है,
आदमी-आदमी की जान लेने पर ही तुला हुआ है| मैंने अपनी रचना 'सावधान! कलियुग आ रहा है' में कहा था-
"[..]यह तो कुछ भी नहीं, एक ऐसा भी दिन आएगा,
पैसों के लिए इंसान, इंसानों को बेंच खाएगा.
बदले में २०० ग्राम आलू, १०० ग्राम चावल,
५० ग्राम दाल, ५ बूँद देशी घी लाएगा,
इन सबको मिलाकर छोटी-छोटी गोलियाँ बनाकर,
सुबह-शाम खाएगा.
परिणामस्वरूप कलियुग का आतंक छा जायेगा||"-मानस खत्री
सृष्टि के आरम्भ से
चक्र चलता ही रहा
छोटे छोटे अनुपातों में
संकट बढ़ता ही रहा!
bahut hi gahre bhaw
जीवन के यथार्थ पर आधारित सुंदर कविता. आभार .
har line kabile-tareef hai.
कभी अभा्वों का समुद्र कभी सम्र्रिधि के पर्वत ,
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति , बधाई।
बहुत गजब का लिखा है आपने.
प्रशंसनीय रचना ।
गति उत्थान- पतन की अभिव्यक्ति है ; यही आनन्द और संकट है ।
प्रशंसनीय ।
bhut hi sundar rachna....aapki lekhni laajwaab hai....badhai ho
सुन्दर एवं अर्थपूर्ण रचना , जीवन की आपाधापी में इन्सान कहा जा रहा है आपने भावो को सुन्दर शब्द दिये है . आभार .
बहुत ही गहरे भावोँ को सँजोया है आपने अपनी कविता मेँ..........अद्भुत । बहुत बहुत आभार दी।
bahut hi acha laga pad kar... very nice..
mere blog par bhi sawagat hai..
Lyrics Mantra
thankyou
हम देखते रहे और संकट बढ़ता ही रहा
बहुत खूब अनुपमा जी|
हा! हम देखते रहे, और
संकट बढ़ता ही रहा!
... kyaa baat hai ... behatreen rachanaa !!!
महेन्द्र जी, कविता और संदेश दोनों बहुत प्या
रे हैं।
---------
छुई-मुई सी नाज़ुक...
कुँवर बच्चों के बचपन को बचालो।
कहीं अभावों का समुद्र
कहीं समृद्धि के पर्वत
प्रकृति रहस्यमयी है
अपनी ही धुन में रत
प्रकृति ने तो असमान वितरण नहीं किया पर हमने ही प्रकृति का असमान वितरण कर दिया
सुन्दर अभिव्यक्ति ।
जीवन की वास्तविकता से परिचय कराती एक श्रेष्ठ रचना।...शुभकामनाएं।
अनुपमा जी,
"वाक्य में विराम सा
विस्मृत किसी नाम सा
गढ़ता नयी कहानी कोई
समय चलायमान रहा! "
नए प्रतिमानों और प्रयोगों के साथ आपकी कविता पढकर लगा की अभिव्यक्ति की कोई सीमा नहीं !
समय को लेकर आपने जितने भी विम्ब गढ़ें हैं सब एक से बढ़ कर एक हैं !
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ
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