अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

सफ़र

सफ़र में होंगी
रूकावटे...
राह में होंगी
तमाम मुश्किलें!
सच है!कांटो की
उपस्थिति भी महसूस होगी
जरूरी तो नहीं
हर पल
फूल ही फूल खिलें!!

विरोधाभास भी होंगे
मतभेद भी होगा...
चांदनी
हर निशा को
शायद ही मिले!
टहनियां टूटती हो
तो टूटें...
पत्ते भी पीले हों...
पर जडें कभी न हिलें!!

साथ होने के लिए
साथ हंसने
साथ रोने के लिए
बिंदु-दर-बिंदु समानता
कहाँ जरूरी है!
सागर की कलकल...
पवन की हलचल-
दोनों दो बातें हैं
पर उनमे कहाँ कोई दूरी है!!

आपके ही आसपास से
प्रेरणा हवा में तैरती
हम तक आती है
ऐसे में लिख जाते हैं शब्द:
आपकी प्रेरणा के बिना-
हर कविता मेरी अधूरी है!
जब तक प्रेरक एक भी सांस बाकी है...
तब तक सृजन की
संभावनाएं पूरी हैं!!

हे!मित्रों!
ऐसे ही
हमारा
साथ-साथ
चलना हो!
आपकी
स्नेह भरी छाँव में
हमारा...
गिरना और सम्हलना हो!!

5 टिप्पणियाँ:

शारदा अरोरा 4 सितंबर 2010 को 1:10 pm  

सहज बहती हुई , कहती हुई कविता जैसे अपनी ही कहानी ।

दीपक 'मशाल' 4 सितंबर 2010 को 1:28 pm  

अनुपमा जी, आप लगातार अच्छा लिखती आ रही हैं.. इस बार तो आपके ब्लॉग पर नज़र नहीं पड़ पायी थी आगे के लिए ध्यान में रखूंगा..

Gourav Agrawal 4 सितंबर 2010 को 1:33 pm  

पहली बार आया हूँ आपके ब्लॉग पर
अच्छी रचना पढने को मिली
धन्यवाद

Udan Tashtari 4 सितंबर 2010 को 1:38 pm  

उत्तम अभिव्यक्ति!

anupama 4 सितंबर 2010 को 1:44 pm  

shabdasheesh hetu aap sabon ka dhanyavad!

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कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
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