अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

नाता

यह रचना एक दशक पूर्व कभी लिखी गयी थी ... आज भी कई भाव जुड़े हैं इस कविता से!


" नाता "

रिश्तों के बियाबान जंगल में ..
एक नाता ऐसा भी है .. जो समयसीमा में कैद नहीं
सदियों का कालचक्र जिसमे स्वयं निहित है
जुड़ जाने पे यह रिश्ता मोक्ष तक ले जाता है .. ऐसा सर्वविदित है
फिर भी यह नाता क्यूँ विस्मृत है ?
शब्दों में नहीं समा सकता आत्मा-परमात्मा का चिर सम्बन्ध !!!!!
ये वो दुर्लभ अनुभव है .. नहीं प्राप्त कर सकते जिसे लोग मदान्ध!!!!!

3 टिप्पणियाँ:

कौशल तिवारी 'मयूख' 2 सितंबर 2010 को 8:11 am  

अजीब सुलगती हुई ल्कढ़ियाँ है ये रिश्तेदार ,
पास रंहें तो तपन दे दूर रंहें तो धुंवा दें

ana 2 सितंबर 2010 को 8:55 am  

ati sudar..........

राकेश पाठक 2 सितंबर 2010 को 11:02 am  

इस नाता की सत्यता मुझे से ज्यादा शायद ही कोई समझ पाए ......
सचमुच इसमें सदियों का कालचक्र निहित है
तभी तो यह अभी तक स्मृत है ......
अनु इसे वापस "स्मृति" से जोड़ने की लिए कोटिश धन्यवाद .......

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"
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