आत्मसंवाद... ?!!
सही गलत
ये निर्णय ही दुष्कर है...
कि संयत मन हो...
तो राहें खुल जाती हैं...
तो ये कभी भी किसी सूरत में
ऐसे क्षण आयेंगे जब टूटा सा होगा विश्वास
वही गुनगुनायेगी...
मत दुखी हो रे मन, यही संसार है... !!
विचित्र है दुनिया...
कितनी ही विडम्बनाएं करतीं हैं आघात...
यहाँ सहजता को
सहजता से नहीं लिया जाता है...
स्वार्थ, झूठ और पतन की परंपरा ऐसी आम है
कि सच्चाई इस दौर में ख़बर है...
कोई किसी की खोई वस्तु उस तक पहुंचा देता है...
तो ये सुर्खियाँ होती हैं...
जबकि ये सामान्य व्यवहार है...
यही होना चाहिए...
इतना पतन हो चुका है
कि...
कोई भी सीधी सच्ची बात पर
लोग सहसा विश्वास नहीं कर पाते हैं...
नेह स्नेह के पीछे भी तर्क तलाशे जाते हैं...
दुनिया कारोबार है...
मत दुखी हो रे मन, यही संसार है... !!
पतझड़ साक्षी है, फूलों के मौसम लौट आयेंगे... !!
तुम देखना
एक समतल भूमि होगी
कहीं दूर अवश्य...
उबड़-खाबड़ राहों से गुज़र कर
हम जिस तक पहुंचेंगे... !
कहीं होगा
एक बित्ता आसमान...
जो तुम्हारी मेरी छत पर
आधा-आधा होगा...
हमने बांटे होंगे तब तक
अनगिन खुशियाँ और गम...
यूँ जीवन की दुर्गम राहों को
नेह के धागों ने साधा होगा... !
तुम देखना
कविता के आँगन में
काँटों के बीच मुस्कुराती कली मिलेगी...
कहीं होगी वहीँ
घास पर
ओस की धवल बूँदें...
आंसू और ओस की नमी
महसूस करना कविता में
आँखें मूँदे...
ओस और आंसू
घुल कर स्याही में
साथ की एक अनूठी परिभाषा रच जायेंगे...
पतझड़ साक्षी है, फूलों के मौसम लौट आयेंगे... !!
दिया और बाती के अंक में... !!
ये कुछ समय पुरानी तस्वीर है किसी सुबह की... सुबह की भागम भाग में नज़र पड़ी होगी... क्लिक कर लिया होगा इस क्षण को... फिर वो क्षण भी खो गया और तस्वीर भी विस्मृत हो गयी... ! विस्मृति की धूल जाने कैसे आज सिहराती हुई हवा ने उड़ा दिया और यह तस्वीर प्रकट हो गयी मेरे सामने जैसे दे रही हो सुबह का मनोरम सन्देश अपनी धीमी आहटों से...
आहटों के इंतज़ार में
रात ठिठकी खड़ी थी...
आँखों में आशान्वित
आंसुओं की लड़ी थी...
ऐसे में एक सुबह
तस्वीर में मुस्कुरायी...
रात के अंधेरों को जीतती
दिए की लौ जगमगायी...
उस लौ में मेरे मन ने
ईश्वर! तुम्हें देख लिया...
दिया और बाती के अंक में
प्रदीप्त था जीवन का लेख नया...
उसे पढ़ कर, गुन कर, सुन कर
चल दिए अकेले पथ पर...
जाने कितना सफ़र शेष है
जाने किस क्षितिज पर लुप्त दिवाकर... !!
उसकी उपस्थिति ही दिशा का संज्ञान है... !!
एक खिड़की हो...
वहां से झांकता
समूचा आकाश हो...
उस पार
पूरी दुनिया हो
और
इस दुनिया में हों हम
उस दुनिया से
जुड़े हुए...
आकाश की ओर दृष्टि किये
ज़मीं की ओर मुड़े हुए... !!
चाहे वो कमरा हो
या हो मन का वितान...
और कुछ हो न हो वहां
एक खिड़की
अकाट्य रूप से हो विद्यमान...
जहाँ से देखते हुए विस्तार,
भूल जायें हम,
स्वयं अपना भी नाम... !!
कि...
अपने छोटे से
अस्तित्व में,
वो
विराट की ओर खुलती
सम्भावना का नाम है...
कमरा हो या हो मन
खिड़की की उपस्थिति ही दिशा का संज्ञान है... !!
तुम उन्हें शब्द देना... !!
हम
आकाश धरा की
अनगिन छवियाँ सहेजेंगे...
ईश्वर!
तुम उन्हें
स्पंदित शब्द देना...
वो कोना
लुप्त है
जो संबल हुआ करता था...
उचित यही
खुद ही
वो कोना हो लेना...
हमें
हँसना है
कविता में...
भला है
कविता में ही
रो लेना...
वो अक्षर है
सकल प्रश्नों का
निर्द्वंद उत्तर है...
मन!
अपनी जमीं पर उसे
श्रद्धा के साथ बो लेना...
उसका हो लेना... ...... ... !!
इस सागर के पार... !!
रास्ता, रहस्य, नीला विस्तार...
एक सागर और लहराता है इस सागर के पार...
उस सागर में लहर उठती है
सवेरा होता है...
खिल आती है लाली
तब जब अँधेरा सघन घनेरा होता है...
इस सागर से उस सागर तक
अपने आप में स्वयं सागर समोयी दृष्टि
जब जाती है...
जान लेती है: प्यास थी
और अंतिम छोर पर भी
ज़िन्दगी प्यासी ही रह जाती है...
कि
मीठे जल का सोता
कहीं खो गया है...
जाने
नीली उदासी को पसरे
कितना वक़्त हो गया है...
विस्मित देखते हैं विस्तार
एक सागर और लहराता है इस सागर के पार... !!
मुट्ठी भर धरती और ज़रा सा आकाश... !!
डे लाइट सेविंग टाइम ने घड़ी को एक घंटे पीछे कर दिया... अब यहाँ और भारत के समय में साढ़े चार घंटे का अंतर हो गया... और ऐसा ही रहना है मार्च तक... जब फिर घड़ी की सूईयाँ एक घंटे आगे हो जायेंगी और अंतर घट कर पुनः साढ़े तीन घंटे हो जायेगा... ! ये घंटे भर की उलट फेर भी क्या खूब बात है... कुछ घटा बढ़ा नहीं समग्रता में... बस माप की दृष्टि में भेद है... !! हमारे लिए समय भारत के रिलेटिव ही चलता है... रात दिन भी वहीँ के हिसाब से होते हैं अब भी चेतना में... घड़ी भी वहीँ के हिसाब से चलती है मन के भीतर... हम घर से दूर भी अपना घर मन में बसाये चलते हैं... शायद तभी ज़िन्दगी चलती है... चल पाती है... !!
आसमान का टुकड़ा यहाँ भले अलग हो पर वो सूरज चाँद तारे सब वही हैं जो वहां के आकाश में उगते हैं... ये कॉमन फैक्टर धरा के हर अंश को बांधे हुए है... बांधे रखेगा... हमेशा हमेशा... भले ही हम कितने ही हिस्सों में बंट जाएँ... या बाँट ले धरा को... आसमान नहीं बँटता कभी... वो हमारी परिधि से बाहर होकर भी सदैव हमारे साथ है... और कुछ एक विम्बों से यूँ जुड़ा है कि हम कहीं भी चले जायें... कुछ और हो न हो अपने हिस्से का ज़रा सा आकाश हमेशा हमारे साथ होता है और अपने पल पल बदलते स्वरूपों के साथ... मुट्ठी भर धरती को अपना बनाने के हमारे संघर्ष का मौन साक्षी होता है... !!
समय कितना कुछ तोड़ता है... कितना कुछ जोड़ता है... कितनी राहों से हम मुड़ते हैं... कहाँ इतना अवकाश कि इंसान सोचे समझे कुछ भी... देखते देखते दृश्य बदल जाता है... ये अच्छा है कि स्मृतियों में रह जाती हैं टिक कर कितनी ही घड़ियाँ... जिन्हें हम जब तब जी लेते हैं... !! इस आकाश से परे भी है न एक आकाश... मन के भीतर... जहाँ हमारी इच्छा शक्ति से होता है सूर्योदय... अँधेरे समय में यहीं मन के धरातल से दिखने वाला सूर्य प्रकाशित करता है जीवन... किसी भी तरह ले ही आता है सुबह... सुबह के साथ संघर्ष भी... और संघर्ष हेतु आवश्यक संचित ऊर्जा भी कहीं दूर खिली मुस्कानों से...
आसमान का टुकड़ा यहाँ भले अलग हो पर वो सूरज चाँद तारे सब वही हैं जो वहां के आकाश में उगते हैं... ये कॉमन फैक्टर धरा के हर अंश को बांधे हुए है... बांधे रखेगा... हमेशा हमेशा... भले ही हम कितने ही हिस्सों में बंट जाएँ... या बाँट ले धरा को... आसमान नहीं बँटता कभी... वो हमारी परिधि से बाहर होकर भी सदैव हमारे साथ है... और कुछ एक विम्बों से यूँ जुड़ा है कि हम कहीं भी चले जायें... कुछ और हो न हो अपने हिस्से का ज़रा सा आकाश हमेशा हमारे साथ होता है और अपने पल पल बदलते स्वरूपों के साथ... मुट्ठी भर धरती को अपना बनाने के हमारे संघर्ष का मौन साक्षी होता है... !!
घूमती हुई घड़ी की सुईयों में
समय के चलायमान होने का आभास था...
हमारी चेतना में लेकिन
एक ठहरा हुआ पल पास था...
और उसी एक पल के इर्द गिर्द
बुनी एक समूची दुनिया...
कभी कभी सिमट आता है समय एक ईकाई में...
हिसाब करती है ज़िन्दगी पाई-पाई में... !!
सूर्योदय कभी नहीं टलता... !!
ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी !
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते!!
जयंती से ढंका कलश आज अपनी जगह से हट जाता था माँ की विदाई पर और जयंती आशीर्वाद स्वरुप रह जाती थी... याद आता है, क़िताबों में रखते थे आशीर्वाद को... ! बचपन के साथ ये सब अब बीत गयी यादें ही बन कर रह गए... कलश आज भी रखा जाता है... आज भी वैसे ही होती है पूजा पर हम नहीं हैं वहां अब... और यहाँ भी नहीं हैं शायद कि मन के आकाश का "काश" हमेशा वाचाल होता है... और दोहराता रहता है वही सब बातें जिनका मूर्त रूप लेना इस पल तो संभव नहीं लगता... ! पर एक शाश्वत जिद है इस "काश" में... आकाश को उदास नहीं होने देता और धरा मुस्कुरा उठती है... !!
*** *** ***
बारिश हुई है... भींगा हुआ है धरा का आँचल... आसमान अब भी बादलों से अच्छादित है और उदास सा प्रतीत होता है... आज सूरज उगते हुए नहीं दीखेंगे... उदित तो वैसे ही हुए होंगे वो... पर बादलों की उपस्थिति उन्हें प्रकट नहीं होने देगी, ये स्पष्ट है... पर जानती है हमारी चेतना कि सूर्योदय हो चुका है... सूर्योदय कभी नहीं टलता... तो आश्वस्त भी हैं हम कि बादल छटेंगे और किरणें दिखेंगी!
*** *** ***
ज़िन्दगी, तेरे आँचल में जो भी है, सब है स्वीकार्य...
तुम्हारी सारी सीमाएं, सभी अनुकम्पायें, शिरोधार्य... !!
धूप की प्रतीक्षा है... !!
आसमान बादलों से ढंका हुआ है... पंछी उड़ते हुए झुण्ड में... कह रहे हों जैसे-- हो सके तो यूँ उन्मुक्त हो कर देखो... भौतिक रूप से तो नहीं संभव तो कम से कम आत्मिक रूप से ही उड़ने का फैसला तो करो... भाव भाषा विचार के स्तर पर तो व्यापकता लाओ... क्या यूँ ही सिमटे हुए विदा हो जाओगे धरा से... जहाँ से जुड़े थे उससे कहीं गहरे रसातल में पहुंचा कर सृष्टि को...
क्या जाने ये बातें कब सुनेंगे... कब समझेंगे हम... ?!!
खिड़की से दिखता आकाश है... बादल हैं... पंछियों का आता जाता झुण्ड है... और अनगिन पेड़ तठस्थ खड़े हैं... पीली पत्तियों को गिरता देख रहे हैं... लालिमा लिए हुए वृक्ष धरती को भी जैसे लाल पीले पत्तों की चादर से ढँक देना चाहते हैं, कि जैसे धरा के लिए अपना समस्त वैभव लुटा देना उनका एकमात्र ध्येय एवं कर्त्तव्य हो... ! ये पुण्य भाव ही पतझड़ को इतना सुन्दर बनाता होगा न... मुरझाना और अपनी जगह से दूर हो जाना भी ऐसा मनोरम होता है, यह प्रकृति के ही वश की बात है... !!
प्रतीकात्मक कितने ही सन्देश बिखरे हुए हैं... कितना उदार चरित है प्रकृति का कण कण... ईश्वरीय प्रकाश से दीप्त... !!! इस सान्निध्य का आदर हो मन में तो सुविचारों का स्फुरण स्वतः होगा... सत्संगति से बड़ा कोई तप नहीं... इससे बड़ी कोई पूजा नहीं... !! कैसे दूर हो गया फिर सहज स्वभाव हमारा...
शायद यूँ हुआ कि प्राकृतिक सभी मूल्यों को हमने जंगल समझ कर काट दिया... कंक्रीट में दब कर रह गयीं संवेदनाएं... ! बस शरीर से मनुष्य रहे हम... मन तो पाश्विकता की सीमा तक लांघ चुका... ऐसे में क्या हो दिशा... क्या पेड़ अपना सन्देश प्रेषित कर पायेंगे... क्या बादल धरती के लिए बरस जायेंगे... क्या ये उदास वातावरण सुनहरी धूप से आच्छादित होगा... ? !!
हताश निराश मन... अभी अभी खिली धूप में भी जैसे उदास कोई रागिनी सुन रहा है... आंसुओं से आद्र दामन लिए... जीवन धीरे धीरे संयत हो जैसे अपनी गति गुन रहा है...
ओस के कण हरी घास पर बर्फ़ की चादर में परिवर्तित हो बड़ा ग़मगीन सा माहौल बनाये हुए हैं... धूप की प्रतीक्षा है... आएगी क्या वह उजली चादर को पिघला कर... हरी घास को फिर से हरा करने... ?
तो देर हो जाएगी... !!
तब
जब धरती
कितने ही कुचक्रों में फंसी
इंसानी फितरतों को
झेल रही है...
कुवृत्तियां सहज मानवीय प्रकृति से
खेल रही है...
दिशाहीन संवेदनाओं का
काफ़िला
दूर निकल गया है...
चट्टानों पर जमा
सदियों पुराना बर्फ़ भी
पिघल गया है...
तब
चारों दिशाओं को
चीख कर प्रतिकार करना होगा...
अनगिन सिरफिरी मानसिकताओं से
मुट्ठी भर विवेक को
एकजुट हो लड़ना स्वीकार करना होगा...
ऐसा होने में जो देर हुई
तो देर हो जाएगी...
सवेरा कहते हैं जिसे वो रौशनी
बस आँखों का सपना हो कर रह जाएगी... !!
...सर्वं देवीमयं जगत् !!
माँ की सुन्दर प्रतिमा...
करुणामयी आँखें...
विराट स्वरुप...
सप्तसती पाठ...
पूजा अर्चना...
आरती दीप धूप...
जिस
भक्ति भाव से
प्राणप्रतिष्ठा...
उसी भाव से विसर्जन...
आगमन और प्रस्थान की परंपरा
दिव्य अकाट्य अचूक... !!
*** *** ***
अपना शहर याद आता है... जमशेदपुर की पूजा... पूजा छुट्टी के ठीक बाद स्कूल के इम्तहान होते थे... तो ऐसे ही बीतती थी पूजा... अस्त व्यस्त त्रस्त... इम्तहानों से तो अभी भी पीछा नहीं ही छूटा है... हाँ, अपना शहर ज़रूर छूट गया... पर, यादों में... वो एक गुब्बारा... आज भी वैसा ही है... जो लिए लौट रहे थे और फूट गया था घर पहुँचने से पहले ही... !!
कैसी कैसी यादें हैं... विस्मृत न होने वाले कितने ही कोण मन के अनदेखे कोनों में सदैव उपस्थित होते हैं... रीत कर भी नहीं रीतता बीता कल... बीत कर भी नहीं बीतते जिए गए पल... !!
भक्ति भाव का दीप जले... माँ की आराधना मन प्राण पावन करे... !!
सर्वरूपमयी देवी सर्वं देवीमयं जगत् !
अतोऽहं विश्वरूपां त्वां नमामि परमेश्वरीम् !!
एक टुकड़ा आसमान... !!
कह तो दें
दोस्त! तुम्हारी बहुत याद आती है...
लिख भेजें पत्र
कितनी ही पुरानी विस्मृतियों की स्याही से...
पर, कहो तो, गर
तुम्हारे हिस्से की चरम व्यस्तता ने
अनदेखा कर दिया इन्हें...
और इन्होंने
इस बड़ी ही सामान्य सी बात को
दिल पर ले लिया तो...
क्या होगा... ?!!
जो एक आस है, उसकी आँखों में भी, आंसू ही होगा... !!
इसलिए,
नहीं कहते हैं...
यादों का ताना बाना
भले बुनते रहते हैं...
सभी लिखे-अनलिखे पत्र
हम एक रोज़ वाचेंगे...
देखना, ज़िन्दगी देगी, वो भी अवसर
हम एक साथ, एक टुकड़े आसमान की ओर, ताकेंगे... !!
चुटकी भर रौशनी ने... !!
हो दीप...
या हो टिमटिमाता सितारा...
उपस्थित वहीँ हैं
है जहाँ अँधियारा... !!
विम्ब...
प्रतिविम्ब...
रूपक रौशनी के
इनसे ही है उजियारा... !!
टिमटिमाती नन्ही सी लौ
क्षीण से हौसले
और विराट अन्धकार
फिर भी जीवन कभी नहीं हारा... !!
समेटी अँजुरी में चुटकी भर रौशनी
और बिखेर दिया जीवन के सुनसान में
महक उठा समूचा अरण्य
चुटकी भर रौशनी ने जीत लिया अँधियारा... !!
बात बस जरा सी... !!
कोहरा, कुंहासा, उदासी
बात बस जरा सी... !!
मन के मौसम सी
दूर छाई घटा भी रुआंसी... !!
कैसा सुखद विरोधाभास है-
इन्द्रधनुषी आभा उसकी
बस नाम से वो उदासी... !!
कोहरे के पीछे से एक किरण झाँकेगी
बदल जायेगा परिदृश्य
आकाश की सुषमा भी, होगी फिर धरा सी... !!
कोई बड़ा सन्दर्भ नहीं, ये बात बस जरा सी... !!!
क्या होगा तब... ?
एक फूल के मुरझाने से
न ही वीरान होता है गमला
न ही हम उदास होते हैं...
ये एक सहज प्रक्रिया जो है... !
मगर
क्या होगा... ?
गर असमय ही
फूलों संग
पूरा गमला मुरझा जाए तो...
लूट गयी खुशबू
फिर लौट न पाए तो...
बीच से उठकर कहीं लुप्त हो गया जीवन
जो फिर कभी न खिलखिलाए तो...
हम बेतहाशा भागते हुए
एक दिन अपनी सहज चाल ही भूल जायें तो...
क्या होगा तब...
सोचें तो अब...
एक क्षण का विराम ले कविता में ही होवें सब... !!!
टूटे स्वार्थ की कारा... !!
चाँद सूरज नहीं थे
तो जगमग था एक तारा...
हे उषा! तुम्हारे आँचल में
हो जड़ित सदा उजियारा... !!
आसमान के अंक में
है जो भी अद्भुत न्यारा...
वो हर शय बड़ी उदारता से
है नभ ने धरा पर वारा... !!
हो पर्वतों का तेज़ अचल
या हो कलकल बहती धारा...
जीवन का सन्देश लिए
सृजित प्राकृतिक हर नज़ारा... !!
सृजन और प्रलय की
महीन रेखा पर चलते जीवन की आस्था से
है हार रहा अँधियारा...
हर क्षण संघर्ष है दृश्यमान
संघर्षरत हर अणु सृष्टि का
अब तो टूटे स्वार्थ की कारा... !!
एक छोटी सी चिड़िया थी... !!
एक
छोटी सी चिड़िया थी
दूर जाती हुई और छोटी हुई जाती थी
इतनी छोटी कि फिर
विलीन हो गयी आकाश के विस्तार में
जैसे हो ही नहीं वो संसार में... !
सुख हो
या हो दुःख
उस छोटी सी चिड़ियाँ सा ही तो है
पास होता है तो अपनी चहचहाहट से
अपनी उपस्थिति यूँ भर देता है हमारे भीतर
कि उसके प्रभाव में होता है हमारा सम्पूर्ण वज़ूद
पर है तो पाखी वाला स्वाभाव न
न सुख टिकने हैं न दुःख ही टिकने वाला है
चुग कुछ दाने हमारे धैर्य का इन्हें पंछी सा उड़ जाना है
उड़ते हुए विलीन ये आकाश के विस्तार में
जैसे कभी रहे ही न हों हमारे संसार में... !!
हो एक ऐसा मन का कोना... !!
एक क्षितिज सी
कोई परिकल्पना है...
मन के अनछुए कोने पर
इन्द्रधनुषी कोई अल्पना है...
ये कल्पनायें...
ये अल्पनायें...
मृतप्राय से जीवन में
संजीवनी सी
उपस्थित हैं...
सपने देखने की ललक जो जीवित है
तो तमाम उथल पुथल के बावज़ूद
ज़िन्दगी व्यवस्थित है... !
बस छोटा सा सपना है-
कि सपने कभी उदासीन न हों
होने न होने की जद्दोजहद के बीच
कायम रहे क्षितिज का होना...
तमाम अँधेरे रौशन कर दे
हो एक ऐसा मन का कोना... !!
सफ़र पर... !!
बहुत सारी बेचैनियों को समेट कर
गठरी बाँध
जब हम चलते हैं सफ़र पर...
तो ये अतिरिक्त भार
हमें पहले ही थका देता है...
सफ़र की थकान
हृदय के बोझ
ये जीवन के उतार चढ़ाव में
साथ लेकर नहीं चले जा सकते... !
कहीं राह में एक बहता दरिया होता है...
जहाँ प्रवाहित कर देने होते हैं
पहाड़ से कष्ट...
सौंप देनी होती है बहती धारा को
बेचैनियों की गठरी...
कि...
बढ़ा जा सके आगे
चढ़ी जा सके
जीवन की दुर्गम चढ़ाई...
और आगे तय हो सके सफ़र... !!
एक बार फिर... !!
एक बार फिर चमक उठी
रौनक खो चुकी थी,
जो मोती...
कैसे कैसे चमत्कारों की
प्रत्यक्ष-द्रष्टा,
जीवन जैसे अखंड एक ज्योति...
मत बैठ जाना हार कर
कि वो सहज बिछौना है उसका,
पीड़ा आत्मा की सेज़ पर है सोती...
सुख-दुःख की आवाजाही से परे
मन-वीणा संकीर्तन के संभाव्य पलों को,
है बड़ी श्रद्धा से पिरोती...
उग आएँगी फिर से वे लकीरें
जो हथेलियों से फिसल गयीं,
किस्मत का ताना बाना होती होती...
चलते जाना पथ पर
अचिन्त्य दुखों की परवाह किये बिना,
सुख की छवियाँ ऐसी ही हैं होती...
उनमें उज्जवल एक
इन्द्रधनुषी प्रकाश है,
आँखें यूँ ही नहीं हैं रोती...
एक बार फिर चमक उठी
रौनक खो चुकी थी,
जो मोती... !!
स्याही से स्वर तक... !!
स्याही से स्वर तक...
मौन से असर तक...
बिखरी हैं
संभावनाएं...
धरती की गोद से
बादलों के घर तक...
प्रेरणा
किसी एक पल की...
ढ़ल जाती है कविता में
सहर तक...
रौशनी की आस में
कई बार जागती हैं
निर्निमेष आँखें...
रात्रि के अंतिम पहर तक...
एक सफ़र से
दूसरे सफ़र तक...
ज़िन्दगी अन्यान्य मोड़ों से गुजरती है
टूटते कहर तक...
संघर्ष का होता रहता है आगाज़
घटित होते रहते हैं अंजाम...
कर दरकिनार
कितने ही अगर मगर का फ़लक...
स्याही से स्वर तक...
मौन से असर तक...
शब्द भाव
विचरते हैं
अपने अंदाज़ में...
संकरी गलियों से विस्तृत डगर तक...
रथ पर सवार
बाल अरुण...
अपने समस्त वैभव के साथ
उपस्थित है दूर फ़लक...
ये सिलसिला
चल रहा है
सदियों से...
ये चलता रहेगा सदियों तक... !!
...तो पा जाते "विवेक" !!
इस छोटी सी धरा की
बड़ी से बड़ी समस्या
हल हो जाती...
काश, जो सुसुप्त विचारों में
चिरप्रतीक्षित
हलचल हो पाती...
विचार ही
परिणत होते हैं
कर्म में...
नीयत परिलक्षित होती है
बातों के
मर्म में...
दिल से लिखी
दिल की लिखी
दिमाग तक जो पहुँचती पाती...
इस छोटी सी धरा की
बड़ी से बड़ी समस्या
हल हो जाती...
प्रश्न ढ़ल जाते
उत्तर के
वर्ण में...
जीवन इतना बेबस नहीं होता
रोज़ रोज़ के
घटनाक्रम में...
थोड़ा अपने भीतर हम जा पाते
तो पा जाते "विवेक"
जो है बिसरा दिया गया साथी...
निश्चित ही फिर--
इस छोटी सी धरा की
बड़ी से बड़ी समस्या
हल हो जाती... ... !!
सूरज की किरणों के साथ, ज़िन्दगी भी मुस्काती... !!!
धमनियों में रक्त की तरह... !!
धमनियों में
रक्त की तरह...
तुम प्रवाहित हो मुझमें
चलायमान वक़्त की तरह...
तुम्हारे सान्निध्य में
जब भी होती हूँ
होती हूँ आद्यान्त
भक्त की तरह...
दर्द में
दवा होती हो
जब कराहती हूँ मैं
अशक्त की तरह...
कविते! कभी बांटना
अपने भी हृदय की पीर
हरदम औरों का दर्द गुनती हो
तठस्थ विरक्त की तरह...
मौन ओढ़े यूँ न रहना
दरख़्त की तरह...
धमनियों में यूँ ही
होते रहना प्रवाहित रक्त की तरह... !!
जाने कितने ठौर... !!
ठोकर
इतना नहीं खलती
गर दर्द न रह जाता...
घावों के निशान न रह जाते...
शायद
ये रास्ते के ठोकर
ज़रूरी हैं...
कि चलने का सलीका
चलते-चलते ही तो आता है...
लड़खड़ाते हुए
आगे बढ़ने में...
दर्द
धीरे-धीरे
बिसर जाता है...
कि...
विकल्प नहीं कुछ और
दर्द के जाने कितने ठौर... !!
सागर किनारे... !!
बहता पानी...
अपने साथ सारे दोष दंश बहा ले जाता है...
जब उमड़ घुमड़ रहीं हों
मन के प्राचीरों में दुविधाएं...
लहरों का आना जाना उद्वेलित कर रहा हो
घेरे हुए हो अनेकानेक बाधाएं...
तो किसी ताल तलैया नदी पोखर या सागर किनारे
कुछ पल विश्राम करना चाहिए...
समस्त विध्वंसक प्रवृतियों के बीच
कुछ क्षण सृजन का अभिराम होना चाहिए...
कैसे किरण जल पर नाचती हुई
नीले विस्तार की कथा कहतीं है...
कैसे तट से टकराते पानी के शोर में
कतरा कतरा ज़िन्दगी की व्यथा बहती है...
नित घटित हो रही संभावनाओं का
सुकंठ गान होना चाहिए...
समस्यायों के सागर में
विसंगतियों की भीड़ में
प्रश्नों के इस जंगल में...
तुम सा समाधान होना चाहिए...
कुछ क्षण सृजन का अभिराम होना चाहिए... !!
बारिश, फिर आना... !!
बूंदों की छम छम
एक छतरी और एक हम
जीवन की सरगम
धरा पर बूंदों का आगमन
जीने के लिए ज़रूरी हैं कुछ भरम
हर सुख दुःख में होती रहे आँखें नम
बस हरदम ये बात रहे...
बारिश हो न हो... छतरी हो न हो...
जीवन रहते... जीवन का सदा साथ रहे... !!
*** *** ***
यहाँ इतनी बारिश कभी नहीं हुआ करती थी... इस बार खूब हुई... और हम निकले भी भींगने... छतरी के साथ... और छतरी के बिना भी...
बारिश, फिर आना... इस बार बर्फ़ के फ़ाहों का रूप धर कर जल्द ही...
कोहरे में गुम होती आकृतियों में... !!
कई बार
समझ नहीं आता...
क्या सही है
क्या गलत...
कई बार
वस्तुस्थिति यूँ हो जाती है जैसे...
आगे की राह पर
कभी न हटने वाली धुंध जमी हो...
कई बार यूँ भी हुआ है
कि कोहरा भयंकर होता हुआ
लील गया है समूचा विश्वास...
कई कई बार टूटे हैं सपने
कितनी ही बार रूठे हैं अपने
राह में
कितनी बार ठोकर लगी है
ये हिसाब रखना छूट गया है... !
चलते चलते हमने जाना
साथ चलता हुआ अपना ही विम्ब
हमसे जाने कब रूठ गया है... !!
युगों युगों के साथ का
वो निर्विवाद पक्षधर...
कभी मौन
तो कभी मुखर...
विश्वास के धागे सुरक्षित हैं
उन्हीं धागों से बुन कर
संवादों का एक अदृश्य पुल...
हम रूठे हुए विम्ब को मना लेंगे...
कोहरे में गुम होती आकृतियों में
हम स्वयं को पा ही लेंगे... !!
पल थे चार... !!
चार पल थे...
उनमें ही जीना था...
हम वो नहीं रहे जो कल थे...
कटु अनुभवों की घुट्टी को ज़रूरी जो पीना था...
अनुभूतियाँ
मन के धरातल पर
कुछ बीज नए बोतीं हैं...
ज़िन्दगी
हर क्षण बदल रही है
बिखर रही है, संवर रही है...
वो, वो नहीं है इस क्षण
जो बीते क्षण होती है... ...
चुन कर
अवशेष...
हम बढ़ जाते हैं...
कितना कुछ
खोया हुआ हम
याद-शहर में पाते हैं...
पल थे चार...
और उन्हीं पलों में निहित जीवन और जीवन का साक्षात्कार...
क्या करता राही
चलता रहा...
रात दिन बारी बारी से पारी सँभालते रहे
सूरज रोज़ उगता, रोज़ ढ़लता रहा...
यहीं से निकली भोर...
उन्मुख जीवन की ओर... !!
वो चल रही थी... वो चलती रही... !!
वो चल रही थी
अपनी धुरी पर...
वो चलती रही...
युगों युगों से है जल रही
हमें शीतलता देने को
वो ख़ुशी ख़ुशी जलती रही...
उसका संतुलन
उसकी गति
उसका धैर्य
ये चूक न जायें
इसलिए ज़रूरी है हम थोड़ा झुक जायें
है यही जीवन की गति
हर क्षण लगी हुई है कोई न कोई क्षति
सब सहती हुई धरा करती है प्रयाण
धरती माँ! तुम्हारे धैर्य को कोटि कोटि प्रणाम !!
किरणें राह दिखातीं हैं... !!
जाने क्यूँ
ऐसा है... ??
मेरी नज़र
जहाँ जहाँ जाती है...
हर जगह चीज़ें उलझी हुईं हैं...
कहीं
बातों का कोई सिरा
छूट गया है...
कहीं
जीवन का आस से
रिश्ता टूट गया है...
दीपमालिकायें
जाने क्यूँ
बुझी हुईं हैं...
हर जगह
चीज़ें
बेतरह उलझी हुईं हैं...
दामन से बाँध कर सहेजा
आस्था का पुष्प
खो गया है...
नम आँखें उदास हैं
जाने मन के मौसम को
क्या हो गया है...
सारी विषमताएं मिल कर
नन्हें विश्वास को डिगाने पर
तूली हुईं हैं...
हर जगह
चीज़ें
बेतरह उलझी हुईं हैं...
ऐसे में
कुछ रंग बिखेरती हूँ कागज़ पर
सूरज की किरणें बनाती हूँ...
उन किरणों के प्रकाश में
कितनी ही
प्रिय कवितायेँ दोहराती हूँ...
फिर
कुछ तो
सहज होता है...
भले
कुछ पलों के लिए ही ये
महज़ होता है...
लेकिन चलो इतना तो हो जाता है
हताश मंज़र खो जाता है
किरणें राह दिखातीं हैं...
मन मंदिर में फिर से दीप जलातीं हैं... !!
वह तो हरदम से है कहती आयी... !!
देखा था तुम्हें
एक रोज़
एक झलक भर...
देखेंगे तुम्हें
एक रोज़
जी भर कर...
मिलोगी न... ??
कहो ज़िन्दगी... !!
ज़िन्दगी
इस प्रश्न पर
मुस्कुरायी...
वह तो
हरदम से है
कहती आयी--
साथ ही हूँ
साथ ही होती हूँ
तुम भूल जाते हो...
अपने साए को ही
ढूंढ़ते हो, शून्य में
आवाज़ लगाते हो...
शून्य से टकरा कर
जो लौट रहा है स्वर
उसे सुनो...
इन दृश्यमान बाधाओं से परे
शुभ संकल्पों का
पावन संसार गुनो...
जीवन भी
वहीँ मिलेगा,
ज़िन्दगी
सार्थक नाम लगेगी...
जो उजड़ी उदास
लगती है,
वही धरा
फिर पावन धाम लगेगी... !!
जाने कब आ जाये अगला मोड़... !!
अगर रुकते तुम तो
कुछ पल स्पंदित हो लेता
ये निर्जन उदास मोड़...
रास्ते मुड़ जाते हैं यहाँ से
मन का कोई अनाम
गहरा नाता जोड़...
मोड़ यह
निर्विकार खड़ा रहता है
इसे नहीं कहीं पहुँचने की होड़...
राही बढ़ जाते हैं
अपनी धुन में मस्त
नेह मोह के सब धागे तोड़...
मोड़ की तठस्थता
मोड़ का मौन
जो अपनाये ये अलंकरण
हममें से वो होगा कौन... ??
हो सके तो
इसी क्षण
उस-सा होने का
प्रयास रहे जी तोड़...
ज़िन्दगी की रफ़्तार तेज़ है
विदा का सन्देश लिए
जाने कब आ जाये
अगला मोड़... !!
स्मृतियों के नाम... !!



