एक देशभक्त से हमने पूछा
बताओ तुम्हारा सपना क्या है... क्या सोचा करते हो
आँखें नम है, नूर चमकता है, जान पर खेला करते हो
उसके रुंधे हुए गले से निकला चिरपरिचित स्वर
शरीर का मोह नहीं आत्मा है अमर
जहां हूँ वहाँ से दो कदम ही सही, आगे को बढ़ता हूँ
आँखें नम है, नूर चमकता है, जान पर खेला करता हूँ
दीवारों को गिरा कर दूरियां मिटानी है
मुझे नए समाज की कहानी बनानी है
इसलिए आशा का दीप जलाये, अहर्निश चलता हूँ
आँखें नम है, नूर चमकता है, जान पर खेला करता हूँ
भेद भाव की तलवारें जब मानवता को करती है लहुलूहान
एक दूसरे के सुख दुःख से जब पाता हूँ सबको अनजान
तब शून्य को निहारता, नीलगगन के तारे गिनता हूँ
आँखें नम है, नूर चमकता है, जान पर खेला करता हूँ
व्यवस्था की ईटें भ्रष्ट आचरणों की नींव पर खड़ी है
स्वप्न और वास्तविकता के बीच की खाई बहुत बड़ी है
इसे पाटने हेतु, निरंतर शक्ति से बढ़कर प्रयत्न करता हूँ
आँखें नम है, नूर चमकता है, जान पर खेला करता हूँ
उसकी बातें सुन हमारा मन क्रंदन कर उठा
आखिर हम भी तो इसी व्यवस्था के शिकार हैं
उस वीर की तरह अनीति देखने को लाचार हैं
फिर भी उसमें और हममें बहुत अंतर है
वह अपना सबकुछ कर देता है न्योछावर
और हम करते हैं स्वार्थ का व्यापार
हमारी भी आँखें नम हैं, पर नूर नहीं चमकता
क्यूँकि-
हम जान पर खेलने का जोख़िम नहीं उठाते!!!
जीवंत सत्य!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
17 नवंबर 2010

11 टिप्पणियाँ:
मार्मिक ,, पर कटु सत्य
बिलकुल सही कहा है आपने .....हम में हिम्मत ही नहीं है वारों को झेलने की,और जो झेलते हैं उनका दर्द ,उनकी सोच और विचारों को हम महसूस नहीं करते.
ये पंक्तियाँ बहुत प्रभावित करती हैं -
".....उसमें और हममें बहुत अंतर है
वह अपना सबकुछ कर देता है न्योछावर
और हम करते हैं स्वार्थ का व्यापार...."
दिल को छू लेने वाली और ज्वलंत प्रश्न उठाती कविता.
हम करते हैं स्वार्थ का व्यापार
हमारी भी आँखें नम हैं, पर नूर नहीं चमकता
क्यूँकि-
हम जान पर खेलने का जोख़िम नहीं उठाते!
--
हकीकत से रूबरू कराती हुई सुन्दर रचना!
सुंदर रचना।
भेद भाव की तलवारें जब मानवता को करती है लहुलूहान
एक दूसरे के सुख दुःख से जब पाता हूँ सबको अनजान
तब शून्य को निहारता, नीलगगन के तारे गिनता हूँ
आँखें नम है, नूर चमकता है, जान पर खेला करता हूँ
ये पंक्तियाँ बहुत प्रभावित करती हैं
सुंदर रचना।
aapki kavita padhkar ye panktiyaan yaad aa gayin...
naman hai unhein jo is desh ke liye apni jaan par khel jaate hain..
मुझे तोड लेना वनमाली, उस पथ पर देना तुम फेंक, मातृभूमि पर शीश चढाने, जिस पथ पर जाएँ वीर अनेक।
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meri nayi kavita anhubhuti...
फिर भी उसमें और हममें बहुत अंतर है...
हम जान पर खेलने का जोख़िम नहीं उठाते...
व्यवस्था से पीड़ित हर संवेदनशील व्यक्ति अपनी कायरता पर यूँ ही खीझता है ...!
अनुपमा जी, बहुत खूब! बड़े ही सलीके से विवेचित किया है आपने देशभक्त और सामान्य नागरिक के जीवन के बीच का अंतर| बधाई|
बहोत ही मार्मिक रचना.........
bahut bhavbhari rachna.shukamnaye
चले
जा रहे हम
अनवरत..
रेत पर,
केवल
मिट जाने वाली
ही
निशानियाँ
छोड़!
जिन्दगी का फलसफा यही है ...और वास्तविकता भी यही ...बहुत गंभीर भाव ..शुभकामनायें
चलते -चलते पर आपका स्वागत है
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