स्वप्न से स्मृति तक :: एक पन्ना
रचनाकार जब ज़िन्दगी की ओर मुख़ातिब हो कहता है
हैरान हूँ मैं दर पे नामाबर को पा कर
--ललित कुमार (स्वप्न से स्मृति तक)
*** *** ***जीवन कई राहों से गुजरता है... कई मोड़ आते हैं... कभी हम राहों को चुनते हैं... कभी राहें हमें चुन लेती हैं... ! अब ये एक संयोग ही तो है कि आप सा एक bioinformatician, कविताओं और साहित्य के क्षेत्र में इतना बड़ा काम कर रहा है... कविता कोश और कविता कोश के संस्थापक से तो परिचय बाद में हुआ था... हमने तो सर्वप्रथम परिचय की गाँठ "स्वप्न से स्मृति तक" से ही लगायी थी...
सुप्रभातं! जय भास्कर:! ७
पापा से बातचित :: एक अंश
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सुप्रभातःसर्वेषां कृते! नमस्कारश्च! मंगलकामनासहितमपि। जय भास्करः!
गीता के अठारहवें अध्याय के दसवें श्लोक में कर्म या कर्मफल के त्यागियों में सच्चा त्यागी का स्वरूप बतलाते हुए कहा गया है कि :--
नद्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशलेनानुसज्जते । त्यागी सत्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ।।
अर्थात् जो मनुष्य अकुशल कर्म से द्वेष नही करता (यदि कर्मक्षेत्र में अकुशल (कठिनाई से सिद्ध होने वाला) कर्म आ जाता है तो उससे द्वेष नहीं करता, बल्कि सहज ढंग से उस कर्म का सम्पादन करता है, तथा कुशल कर्म के प्रति आसक्त नहीं होता, अर्थात् मैं केवल सहज सरल रीति से होने वाले कार्य ही करूंगा, इस प्रकार सहज कर्म के प्रति आसक्त नहीं होता वैसे मनुष्य को संशयरहित, बुद्धिमान और सच्चा त्यागी (यानी कर्मनिष्ठ) समझना चाहिए ।पुनः कर्मसिद्धि के पांच कारकों के होने की अनिवार्यता बतलाते हुए चौदहवें श्लोक (अ/18) मे कहा गया है :--
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्। विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्।।
अर्थात् कर्मो की सिद्धि (सफलता) में पांच कारकों के सहयोग की अनिवार्यता होती है :--अधिष्ठान, कर्ता (कार्य सम्पादक), भिन्न भिन्न प्रकार के करण (कर्म करने के साधन, तत्सम्बद्ध इन्द्रिय) एवं विधेय कर्म के लिए विविध चेष्टायें और अन्ततः पांचवें स्थान पर दैव (भाग्य) होता है, मनुष्य के द्वारा पूर्व कृत शुभाशुभ कर्मो के संस्कार (फल, भाग्य) को ही यहां दैव कहा गया है। तात्पर्य यह है कि किसी भी कार्य के सम्पादन में उपर्युक्त पांच कारक हैं, जिसे समझने और तदनुसार चलने का संकल्प हमे भी लेना चाहिए।
*** *** ***
स्वंयसेवा एवं सामाजिक कार्य के संदर्भ में :: एक दृष्टिकोण
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समाज को अगर कोई सचमुच सशक्त और कल्याणकारी बनाना चाहता हो तो, उसे देवाधिदेव महादेव की तरह (जैसे उन्होंने अनन्त कोटि ब्रह्मांड की रक्षा के लिए विषपान कर लिया था) समाज कल्याण के लिए, कटु वचनरूप विष को पीते हुए पारिवारिक विषम स्थिति (विशेष कर विरोधी स्वभाव वाले पारिवारिक सवारी को ही लें :: शिव की सवारी वृषभ, शिवानी की शेर, पुत्र गणेश की सवारी मूषक, कार्तिकेय का मयूर ) को सम करते हुए (जैसे गज मुख पर षडानन् छःमुख वाले कार्तिकेय परिवार को नियंत्रित करने मे सफल हैं), वैसा अभ्यास हम सब को गम्भीरता से अपनाना होगा।
--डॉ सत्यनारायण पाण्डेय
सिक्के के दो पहलू...
साधु और शैतान
महज सिक्के के दो पहलू हैं,
पलक झपकते ही बदल जाता है दृश्य
भरम पाले हम
अपनी राह निकल जाते हैं।
अपेक्षित है :
हर एक दोष दंश से ऊपर उठ कर
हमें अपनाया जाए...
कि इंसान हैं हम
माटी के पुतलों की क्या बिसात !
जो साधु होने का गुमान पाले
या कि शैतान होने की लज्जा.
बहती हुई धार रहें बस
गिर जाएं तो कह सकें कि गिर पड़े थे
हाथ थाम कर उठा ले जो कोई लम्हा
कृतज्ञ रहें सदा उस लम्हे का
कभी न भूलें उस पुल को
जिसे पार कर आगे बढ़ आए हों.
बस यूं ही चलता रहे सफर !!
साधु और शैतान हम सबके अंदर है
दोनों का संघर्ष सनातन है
यही प्रार्थना:
संघर्षरत साधु
शैतान से सदैव जीते...
नित चलता रहे सफ़र
तार-तार सपने सीते-सीते... !!
शब्द कम रहें... न रहें...
जीवन...
बहुत बड़ा बवंडर है...
एक सिरा हाथ आये
दूसरा छूट जाता है...
इस भीड़ में कहीं कोई नहीं
भीड़, भीड़ ही है बस
इसका
न कोई चेहरा
न कोई पहचान...
न ही कोई उद्देश्य ही होता है...
भीड़, भीड़ ही होती है बस... !
ऐसे में
कोई जो भीड़ से अलग हो...
दुनियादारी से दूर, तुम्हें, सिर्फ तुम्हारे लिए, पहचानता हो
तो हो सके तो उसे "चिन्ह" लेना...
अपनी संवेदनाओं का भी
अपने हाव भाव आचरण से
कोई तो "चिन्ह" देना...
वरना लम्हा गुज़र जाएगा...
भीड़ भीड़ ही रहेगी...
और संवेदना का पूरा काफिला
किसी एक गुम होते शक्श के साथ
तुम्हारे अनुभूतियों के धरातल से फिसल जायेगा
ये संयोग दुर्लभ है
कभी कभी बड़ी किस्मत से घटता है...
वैसे तो हर दीवार में एक अदद झरोखा हमेशा ही रहता है...
ये और बात है कि वह झरोखा अनदेखा ही रह जाए
और उससे दिखने वाला सागर
अनजीया... !!
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ये बस एक प्रवाह में जाने क्या लिख गया
अर्थहीन सा...
वरना
सच तो यही है कि
शब्द कम रहें, न रहें...
मौन में कविता हो...
वही जीवन के लिए
या कि कविता के लिए भी
एक आदर्श स्थिति हो सकती है !!
राहें बुलाती हैं...
राहें बुलाती हैं...
सड़कें आवाज़ देती हैं...
कि...
सफ़र है
तो ही हैं कवितायेँ...
कच्ची-पक्की,
वीरान-अनजान सड़कों पर चले बिना
शब्द यात्रा संभव भी कहाँ है... !
बिना टूटे, बिना बिखरे, बिना चोट खाए
कैसे पता चलेगा ज़िन्दगी का स्वाद...
जो न होंगे आंसू तो कैसे होगा फिर दर्द का अनुवाद... !!
इस लिए यात्राएं आवश्यक हैं...
कई तरह की
कई कई तरह से
सड़क पर खाली पांव विचरते हुए
किनारों पर उग आई घास की नमी महसूसने की यात्रा...
ओस से झांकते इन्द्रधनुषी रंगों को
मन में बसा लेने की यात्रा...
सरपट दौड़ती राहों में
अपने क़दमों के नीचे की ज़मीं को
तलाशने/तराशने की यात्रा...
अपने ही अन्दर चल कर
अपने आप तक पहुँचने की यात्रा...
कि यात्राएं आवश्यक हैं
कई तरह की
कई कई तरह से !!
धूप में उदासी !
धूप से भी चोट लगती है...
कि आँखों में समा जाये तो
अँधेरा सा छा जाता है!
धूप,
छाँव की
याद दिलाती है...
धूप जो इतनी तेज़ हो
तो हम छाँव के आदी लोगों को
ज़रा ज्यादा ही रुलाती हैं.
आँखों पर
हथेलियाँ रख लीं
धूप से चौंधियाई आँखें
सुकून क्या पाती ?!
यूँ ठोकरों ने रुलाया
कि आँखों में दर्द उतर आया...
जीवन नियति ऐसी ही है--
सुख
न धूप में है
न ही छाँव में
जीना हो तो,
जी लें,
अभी इसी क्षण...
कि सुकून कभी नहीं होना है,
डगमग करती नाव में... !!
सुप्रभातं! जय भास्कर:! ६
पापा से बातचीत :: एक अंश
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सुप्रभातम्! मंगलकामनासहितम् सर्वेषां कृते!नमस्कारशच!
मनुष्य चाहे तो अभ्यासपूर्वक भगवत्ता (भगवान की तरह सत्ता ) का अधिकारी हो सकता है। भग=ऐश्वर्य, समग्र धर्म,अक्षय यश, श्री=लक्ष्मी 'शोभा ',सौन्दर्य, ज्ञान, वैराग्य यही छः "भग "शब्द से गणित हुए हैं!
श्लोकं यथा :-- ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशशः श्रियः। ज्ञानवैराग्योश्चैव षण्णां भगइतीरणा।।
अन्यत्र भी कहा है :----वैराग्य, ज्ञान, ऐश्वर्य, धर्मधारण, आत्मशुद्धि, सद्बुद्धि, श्री (शोभा, लक्ष्मी )और यशस्वी होना, भगवान बनने या कहलाने के कारक होते हैं।
श्लोकं यथा :---"वैराग्यं ज्ञानमैश्वर्यं धर्मश्चेत्यात्मबुद्धयः (आत्मशुद्धयः वा)। बुद्ध्यः श्रीयश्च एते षड् वै भगवतो भगाः।
भगवान कहलाने के समर्थन मे एक श्लोक यह भी है :--
''उत्पत्तिं प्रलयं चैव भूतानामगतिं गतिम्। वेत्ति विद्याम् अविद्याञ्च स वाच्यः भगवान् इति।।
अर्थात् जो उत्पत्ति (सृष्टि ),प्रलय (सृष्टि का अन्त )भूतानां (भूत = प्राणी मात्र )=प्राणियों की गति एवं अगति तथा विद्या एवं अविद्या (अध्यात्मविद्या =श्रेय की प्राप्ति के लिए विद्या, सांसारिक विद्या =प्रेय =अविद्या ) को भलि प्रकार जान ले तो, उस को भगवान कहते हैं। गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है भी है :--"अध्यात्मविद्या विद्यानाम" अर्थात् प्रसिद्ध चतुर्दशविद्याओं में मैं "अध्यात्म विद्या" हूं ।
यह सब उद्धृत करने का मेरा उद्देश्य यह है कि जैसे लक्षरूपये वाले को "लखपति ", कोटि (करोड़पति )रूपये वाले को करोड़पति कहा जाता है, ठीक वैसे ही मनुष्यमात्र चाहे तो उपर्युक्त षड् ऐश्वर्य से युक्त हो "भगवान "भी बन सकता है।
शुभकामनाओं सहित प्रेषित।जयतु भास्करः!
--सत्यनारायण:
सुप्रभातम्! जय भास्करः। ५
पापा से प्रातःकालीन बातचीत :: एक अंश
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सुप्रभातम् सर्वेषाम्! मंगलकामनासहितम्! जयतु भास्करः!
आज की बहुत सारी समस्याएं समस्या न होकर भी घोर संकट का कारण बनी हुई हैं, नहीं समझ पाने के कारण या हम समझना नही चाहते इसके कारण :-- वह है धर्म, हम ने धर्म की गलत अवधारणा कर ली है, मानव धर्म तो एक ही है, प्रकृति उसका शुद्ध रूप निर्वहन करती चली आ रही है और हम धर्म को अपनी स्वार्थलिप्सा की पूर्ति का साधन समझ बैठे हैं, यही तो विडंबना है।
जरा इस श्लोक का अर्थ सहित देखें :--
"श्रूयतां धर्मं सर्वस्वं, श्रुत्वा चाप्यवधार्यताम् ।आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ।।"
अर्थात्:----धर्म के सर्वस्व रूप को सुनें,(समझें) साथही उसे उसी सुनिश्चित रूप में धारण भी करें । (अगर यही धर्म की परिभाषा दी जाय) "जो कृत्य आपको अपने विरूद्ध खुद महसूस करते हैं, उसका प्रयोग दूसरे के लिए भी न करें" आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्" यही धर्म है तो कौन किसके लिए मुसीबत बन सकता है? पर हम अपनी स्वार्थपरता को जोड़ भोले भाले लोगों को अपनी इच्छा पूर्ति के लिए हथियार बनाने मे लगे हैं।
इस दूसरे श्लोक को भी देखें इसमें किस धर्मावलंबी के लिए यह कम या ज्यादा आवश्यक है ::--
"धृति क्षमा दमः अस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।धीर्विद्या सत्यम् अक्रोधः दशकं धर्म लक्षणम् ।।"
धैर्य धारण करना, क्षमाशील होना, दम यानी मनको वश मे रखना, अस्त्येय =चोरी न करना, शौचम्=पवित्रता, इन्द्रियनिग्रह=अपनी ज्ञानेन्द्रियों को एवं कर्मेन्द्रियों को नियंत्रित करना, धी =बुद्धि, विद्या =श्रेय को सिद्ध करने वाली बुद्धि, सत्य=सच्चाई, अक्रोधः=क्रोधरहित होना, ये दश धर्म के लक्षण कहे गए हैं।
अब हमें बताया जाय यह किस धर्म या सम्प्रदाय के लिए विरोधी भाव दर्शाता है, या किसके लिए धारण करने योग्य नहीं है, जो स्वयं का, परिवार का, देश का या सम्पूर्ण विश्व का कल्याण चाहते हैं। धर्म धारण करने के लिए होता है, केवल शब्दोच्चारण के लिए नहीं। हम हजारों वर्षों से चिल्लाते आ रहे हैं "विश्व का कल्याण हो! विश्व का कल्याण हो!" पर हमने धर्म को धारण नहीं किया है, इसलिए हमारी धार्मिक यात्रा रस्सी में बंधे नाव में सवार हो जोरदार पतवार चलाने पर भी एक फीट भी आगे नहीं बढ़ी है।
धर्म चिल्लाने की वस्तु नहीं धारण करने की चीज है :--"धारणात् धर्मः,नान्यथा"
जय भास्करः।
--सत्यनारायण पाण्डेय
कि "जीवन" जीवन ही नहीं था... !
सबसे ज्यादा हताश थी जब...
दुनिया में कहीं कुछ भी
ठीक नहीं लग रहा था तब.
खुद से ही बेइंतहा नाराज़गी थी
उस क्षण-
जीवन से अधिक त्याज्य
जैसे कुछ भी और नहीं था...
कि "जीवन" जीवन ही नहीं था... !
इतने अँधेरे कभी नहीं देखे थे
हम तो चाँद तारों को आसमान का सच मानते थे
किसे पता था कि
धरा से चाँद तारों का सामीप्य
सब कोरी कल्पना हैं...
दूरी के ऐसे मानक प्रतिस्थापित हैं
कि जिसकी गणना, कल्पना भी, अकथनीय है...
ऐसे में
ये हमारा भोलापन ही तो रहा होगा
जिसने चाँद तारों से
सामीप्य और नेह के धागे जोड़े होंगे !
यथार्थ के कठोर धरातल पर सब शुष्क है...
मात्र दूरियां ही तो जीवंत हैं... !!
ऐसी हताशा में
चुपके से
कोमलता के एक प्रतिमान का
स्पर्श महसूस किया हिय ने...
जैसे कह रही हो वह कोमलता--
जीवन है...
अनुभव सा आंकती चलो...
चलते चलते अपने ही भीतर झांकती चलो...
तुम्हें
तुम्हारे सारे जवाब
मिल जायेंगे...
हताश निराश,
विराट नीलेपन से ही,
अनुभूतियों के मोती झिलमिलायेंगे...
उन्हें चुनकर पिरो लेना...
जीवन का दामन थामे...
फिर "जीवन" ही हो लेना... !!
पापा से बातचीत :: एक अंश ४
श्रीमद्भगवद्गीता माहात्म्य में सात श्लोक हैं। चौथा श्लोक यह है :--
गीता सुगीता कर्तव्या, किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः। या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिः सृता।।
गीता सुगीता कर्तव्या = गीता को सुगीता बनाना चाहिए, ऐसा क्यों कहा? क्या गीता सुगीता नही है ? ऐसी बात नही है, दूसरी पंक्ति में स्पष्ट कहा है जो गीता स्वयं पद्मनाभ भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण के मुखारविन्द से प्रकट हुई है, उस रहस्यमयी गीता को अभ्यासपूर्वक हम अपने लिए सहज सुलभ बना लें, तो "किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः" अन्य शास्त्र के विस्तार में जाने की क्या जरूरत "यानि गीता के सम्यक अध्ययन के बाद "न अन्यद् किञ्चदपि ज्ञातव्यमवशिष्यते" कुछ और अलग से जानने की जरूरत नहीं रह जाती।
पर यह पाठ मात्र, या श्लोक उद्धृत कर श्लोकार्थ वाटसप पर पोस्ट कर देने मात्र से सम्भव नहीं हो पाएगा, हमे अध्ययन मनन और अनुकरण से अपने लिए पहले गीता को, सुगीता = सहज सुलभ, बनाना होगा।
मंगलकामनासहितम्! शुभ प्रभात! नमस्कारःसर्वेषम् ।
***निवेदन है कि कोई अन्यथा नहीं लेंगे मैं खुद गीता को सुगीता बनाने की चेष्टा में वर्षों से प्रयत्नशील हूं, पर समझना जन्म जन्मान्तर तक चलता ही रहेगा, भगवत्कृपा होगी तो अवश्य सम्यक ज्ञान प्राप्त होगा ही। पुनःप्रणाम! शुभ दिवस !
*** *** ***
हमारे यहां की परिपाटी पितृपक्ष की है, प्रत्येक वर्ष आश्विन कृष्णपक्ष पितृपक्ष कहलाता है, पूरे पंद्रह दिन सुनिश्चित हैं, जिनके पिता जीवित हैं, साथ रहते हैं!
भारतीय परम्परा में नित्य पिता के दर्शन और सेवा से जुड़ना, स्वभाविक स्तर पर है। पा रक्षने-धातु से --'पाति=रक्षति, इति पिता'। पिता संतान की रक्षा करने वाले होते हैं, इसलिए ही पिता कहलाते हैं।
हां दुर्गा सप्तशती में पंक्ति आयी है :-- मानुष मनुजव्याघ्रा साभिलाषाः सुतान् प्रति। लोभात्प्रत्युपकाराय नन्वेतान किं न पश्यति ।।
मनुष्य ही नही हिंस्रपशु व्याघ्रादि भी सन्तान के प्रति पालक की भूमिका निभाते हैं, प्रत्युपकार की भावना से, और यह परम्परा सृष्टि के आदि काल से चली आ रही है, अब भले वह एक दिन के "फादर्स डे "की कट्सी में बदल जाय। समझ दैनिक और कालिक। मान्यता अपनी अपनी।
मंगलकामनासहितम्!
--डॉ सत्यनारायण पाण्डेय
सुप्रभातम्! जय भास्करः। ३
पापा से बातचीत :: कुछ अंश
"क्षमा" यह एक प्रसिद्ध शब्द है। क्षमाशील होना मनुष्य का सबसे बड़ा गुण माना जाता है, पर शर्त यह कि उसे शक्तिशाली भी होना चाहिए, क्योंकि शक्तिविहीन के द्वारा क्षमा किया जाना हास्यास्पद लगता है। दिनकर ने कुरूक्षेत्र में लिखा भी है :- क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो, उसको क्या? जो दंतहीन विषरहित विनीत सरल हो।।
अतः हमें प्रयत्न पूर्वक शरीर, मन, बुद्धि विवेक से सबल होना चाहिए । "मनु" शब्द की व्युत्पत्ति है "मननात् मनु" मननशील होना ही मनु की संतान होने के कारण हमारा विशिष्ट गुण है। "मुनि" शब्द भी "मननात् मुनि" से ही बना है। मनन चिन्तन को अपनाते हुए मानवोचित गुणों का हम मे से प्रत्येक को अनुसरण करना चाहिए। नहीं तो आधुनिकता के इस दौर मे भी भौतिक सुख-सुविधा की उपलब्धि के बाद भी मानवोचित गुण से रहित होने के कारण स्थिति भयावह ही होगी। कवि दिनकर पुनः कह उठते हैं:- "झर गई पूंछ रोमान्त झरे, पशुता का झरना बाकी है। ऊपर ऊपर तन संवर चुका, मन अभी संवरना बाकी है।" शायद हम आज भी इस तर्क से झुठला नहीं सकते। आज स्थिति यह हो गई है कि अकेले में मनुष्य खूंखार जानवर से उतना भयभीत नही होता, जितना अकेले में "मानवाकृति" को देखते ही डर जाता है !!
जरा गंभीरता से सोंचे तो सही ।
*** *** ***
प्राचीन काल से यह परम्परा रही है :-- अच्छे कृत्य के लिए प्रशंसा एवं पुरस्कार से अच्छे सेवक या कार्यकर्ता या जो कोई भी हो सुकृत करने वाला हो "सम्मानित किया जाना" एवं गलत कार्य के लिए घोर निन्दा एवं कठोर दण्ड का विधान भी, पर आज स्थिति पारिवारिक स्तर पर ही नहीं, प्रत्येक देश ही नहीं, वैश्विक स्तर पर "झूठे का बोलबाला, सच्चे का मुह काला" चरितार्थ होने लग गया है। क्योंकि हमारी सामूहिक कमजोरी है, गलत के विरुद्ध हम भय वश बोलते नहीं, थोड़े लोग येन केन प्रकारेण अपना उल्लू सिद्ध करने में सफल हो रहे हैं। सोचें कैसे परिवर्तन के युग मे हम जी रहे हैं :-------
एक समय था घर में ताले नहीं लगाए जाते थे, किसी की कोई वस्तु रास्ते में भी गिर जाती थी, तो साफ ऊंची जगह पर राहगीर रख दिया करते थे, या पेड़ की डाली से बांध देते थे ताकि जिसका है उसे आसानी से मिल जाये। आज की स्थिति से हम सब भली भांति परिचित हैं, सात-सात ताले फिर रखवाला रखने के बाद भी हम, हमारा सामान सुरक्षित नहीं। स्वप्न में हरिश्चंद्र ने राज्य दान कर दिया और उस व्यक्ति की प्रतीक्षा में बैठे रहे, और आज वचन से मुकरना, सरासर झूठ बोलना और झूठी गवाही देना कितना सहज स्वीकार्य हो गया है, हमसे छुपा नही है, फिर इस बदले समय में हमें कितने सजग होने की जरूरत है! हम सद्विचार वाले लोग संगठित होकर सोचें। कहा भी है भय वश या लोभ वश गलत करने वाले को नजरअंदाज करना भी अपराध ही कहलाता है, तो हम क्यों न संकल्प लें :--
अकर्तव्यं नैव कर्तव्यं प्राणं कण्ठगतैरपि।
कर्तव्यमेव कर्तव्यं प्राणं कण्ठगतैरपि ।
अर्थात् प्राण कंठगत ही क्यों न हो सात्विक कर्म का किया जाना या अनुमोदन ही श्रेयस्कर है, न कि गलत कार्य का किया जाना या अनुमोदन। हम डटकर देखें तो सही।
*** *** ***
एक सूक्ति संस्कृत में प्रचलित है
"स्थान भ्रष्टाः न शोभन्ते दन्ताः, केशाः, नराः, नराः"
अर्थात् अपने स्थान से भ्रष्ट हो जाने पर (हट जाने, गिर जाने पर) अपनी शोभा या अपना महत्त्व खो देते हैं, कौन कौन महत्त्व खो देते हैं? दांत, केश, नख और नराः = मनुष्याः = मानव। दांत जबतक मुख में हैं, कहा जाता है, मोती की तरह चमकते दांत हैं ; सिर पर स्थित केशकुन्तल, अहा कितने सुन्दर हैं,आपके केश या केशपास; नख के साथ भी ऐसा ही है, जब तक हाथ की उंगली से जुड़े हैं, सुन्दरता का क्या कहना? वैसे ही नर यानी मनुष्य अर्थात् मानवमात्र जब तक अपने पद, प्रतिष्ठा, मर्यादा के अनुरूप कार्य करता है, समाज उसके स्वागत में पलक पावड़े सजा कर रखता है, पर जैसे ही वह पद प्रतिष्ठा मर्यादा का उल्लंघन करता है, समाज की नजरों में वैसे ही -- तुच्छ, त्याज्य, अश्रद्धा का विषय बन जाता है, जैसे स्वस्थान से हटते ही दांत, केश और नख! अपने अपने स्थान पर रहते हुए तो अपनी और उस व्यक्ति की शोभा के कारक कहलाते हैं, पर स्व स्थान से च्युत होते ही उस व्यक्ति के लिए भी घृणा की वस्तु बन जाते हैं, अन्य जन की दृष्टि में कहना ही क्या? अतः मननशील मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी मर्यादा, स्वकर्तव्य पालन से कभी च्युत न हो, नही तो समाज से निन्दित वह "धृतः शरीरेण मृतः स जीवति" की स्थिति मे आ जाता है।
अतः प्रयत्नपूर्वकं स्वस्थनेव स्थातव्यम् अस्माभिः!
मंगलकामनासहितम्!
सत्यनारायणः।
इति शुभम !
क्रमशः ....
जुदा-जुदा किनारे...
किनारों को
जोड़ रहे पुल की
विरल गरिमा...
आती जाती धारा
देख रही थी
यह महिमा...
दो किनारों को,
जोड़ देता है,
एक पुल का विश्वास...
गाती है यह महिमा फिर,
हर आती जाती,
श्वास...
एक पुल के विश्वास पर,
हैं जुड़े हुए
दो जुदा-जुदा किनारे...
चल रही है जीवन-नैया,
कौन जाने,
कब नाविक पार उतारे... !!
*** *** ***
[[ तस्वीर :: बुडापेस्ट की एक शाम ]]
सुप्रभातम्! जय भास्करः। २
![]() |
| भारत गौरव पुरस्कार से सम्मानित डॉ सत्यनारायण |
पापा से बातचीत :: कुछ अंश
सुप्रभातः सर्वेषाम्!
मंगलकामनासहितम्! भगवान श्री कृष्ण ने
भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय के श्लोक संख्या चौदह, पन्द्रह, सोलह में शारीरिक,
वाणी का और मन का तप कैसे गृहस्थाश्रम में
किया जा सकता है, बताया है,
जैसे आज शारीरिक तप स्वरूप देखें
:--देवद्विजगुरूप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् । ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं
तप उच्यते ।।
अर्थात् देव, ब्राह्मण,
गुरू, और विद्वानों की पूजा, शुद्धता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा शरीर के तप कहलाते हैं । इसका अभ्यास गृहस्थ करें,
घर परिवार समाज मे रहते हुए करें, तपस्या के लिए वन जाने की जरूरत नहीं है। क्रमशःअगले दिन वाणी एवं मन की तपस्या के बारे जानेंगे ।
*** *** ***
सुप्रभातः सर्वेषाम्!
मंगलकामनासहितम्! जयतु भास्करः! आज हम सब गीता के सत्रहवें अध्याय के श्लोक 15'16 का मनन करेंगे, जिसमें वाचण एवं मन (मानस) तप के स्वरूप को सुनिश्चित किया
गया है :--अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्
।मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः । भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो
मानसमुच्यते।।
अर्थात् हमारे वाक्य किसी को उद्वेलित करनें वाले न हों, (किसी ने ठीक ही कहा है कि "वाक् संयम ही
विश्व मैत्री की पहली सीढ़ी है") महाभारत का कारण भी उद्वेग उत्पन्न करने
वाले वाक् का असंयम ही रहा है, सभी जानते हैं, वचन प्रिय हों, हितकर हों,
सत् शास्त्रों का स्वाध्याय होता रहे बस वचन का
तप सिद्ध हो जाता है! घर, परिवार, समाज, देश की खुशहाली
के लिए इसी तप की तो आवश्यकता है ।मानसिक तप भी देखें :--''मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः
। भावसंशुद्धिरित्येत्तपो मानसमुच्यते ।। अर्थात् मन को प्रसन्न रखें, सौम्य मौन
(मुनियों की तरह मननशील होना) मन पर काबू
(नियंत्रण) रखना और हर समय शुद्धभाव से भरे रहना मानस (मानसिक) तप कहलाता है। भला बतायें, अगर समाज के
प्रत्येक व्यक्ति शारीरिक, वाचिक और मानसिक
तप गीता के निर्देशन के अनुरूप अपना लें तो "स्वर्गः नान्यत्रः ---इहैव हि,
इहैव हि" कहा जाने लगे।
मंगलकामनासहितम्!
सत्यनारायणः।
इति शुभम !
क्रमशः ....
बियाबान जंगल...
जिसकी
खो गयी हो चाभी,
वो ताले रो गए...
रिश्तों के
बियाबान जंगल में
चलते चलते,
पाँव में ही नहीं,
मन में भी छाले हो गए... !!
ख्वाहिशें... !!
कोई एक हो
जो मेरी ख़ामोशी सुन ले...
अब मन
हर एक शब्द अक्षर
सब खोना चाहता है... !
थक गया है
चल चल कर...
मिले कोई स्नेहपूर्ण गोद
अब मन कुछ देर
सोना चाहता है... !
सब धुल जाये
धुल धक्कड़...
मेरा मन
तुम्हारे हृदय से लग कर
रोना चाहता है... !
रेत ही रेत है
मेरी आँखों के सामने...
जाने फिर भी
कैसे तो हौसला कर
उम्मीदें बोना चाहता है... !!
हे ईश्वर !!
असीम है वो आकाश...
अथाह है सागर...
अनगिन विश्रामरत रहस्य सी,
दृश्यमान हैं नौकाएं...।
_____
अथाह को जानना हो,
तो स्वयं अथाह होना होगा...
असीम की थाह पाने को
वैसा ही असीम होना होता है...
जान तो नहीं ही सकते थे
कि अभी कहां हममें वो प्रगल्भता!
तो बस बिना जाने
आंखो ने थाम लिया वो लम्हा
और हम निकल पड़े उस यात्रा पर
जहां हम हो सकें असीम...
अथाह...
कि अभी
शेष है जानना उस विस्तार को
और शेष है जानना तुम्हें भी,
हे ईश्वर !!
ईला, तुम्हारे जन्मदिन पर तुम्हारे लिए...
![]() |
| गायत्री वल्लभ ,ईला |
गुड़िया रानी...
ये हमारे यहां पहला जन्मदिन है न तुम्हारा !
पहली खुशियां अनमोल होती हैं
'पहला'--
इस शब्द से जुड़ा होता है
कितना कुछ अमूल्य जीया हुआ
जैसे पहली खुशी
जो मात-पिता ने तुम्हे पहली बार चलते देख महसूसी होगी
पहली बार स्कूल यूनिफॉर्म पहनने का सुख याद होगा
शायद पहली बार स्कूल जाते हुए तुम रोयी होगी
गुणा भाग जोड़ घटाव
गिरना संभलना याद होगा
हमें आभास है ::
तुम्हारे घर में आज कितना सूनापन
तुम्हारे बाद होगा
पहली बार कुछ खोया होगा
वो गम भूली नहीं होगी
आज भी पा कर छोटे छोटे सुख
देखना, आंखों में आसुओं की लड़ी होगी !
पहले पहल की ये खुशियां
तुम आजीवन जीना
पल पल जीवन में जड़ती रहना
भाव-भाषा का अनमोल नगीना... !!
आज तुम्हारे साथ तुम्हारा हमसफ़र भी है
संग उसके मिलकर
खिलखिल फूलों सा मुस्काना...
इन अकिंचन शब्दों में ही
हमारी ओर से
जन्मदिन का कोटिशः आशीष पा जाना !!
[[ दीदी/जीजाजी ]]
*** *** ***
ये कितनी प्यारी बात है कि भाई गायत्री वल्लभ ने भी अपनी ईला के लिखा... उन उद्गारों को भी यहाँ सहेज लेते हैं, तुम्हारे लिए ईला !!
ईला :: कल्पना से यथार्थ तक
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कल्पनाओं में भी सदा
जिसका स्वरुप धूमिल ही रहा
कौन होगी... कैसी होगी
हृदय में बना कौतूहल ही रहा
कभी-कभी सोचता था
कि कैसी ये रीत है
संयोग से मिल जाती कोई
बनती जीवन की प्रीत है
फिर तुम मिली हमसे...
थोड़ी सकुचाई सी... थोड़ी शरमाई सी
अपने परिवार जनों के बीच बैठी
मन में जाने कितने प्रश्न लिए थोड़ी भरमाई सी
कहते हैं हृदय की कोई भाषा नहीं होती
सच है::
जहाँ "आभाष" हो वहां भाषा की
जरूरत भी नहीं होती
पहली बार जो देखा तुमको तो लगा
मानो जो स्वरुप सदा धूमिल रहा
कभी-कभी जिसकी कल्पना करता था
मन में सदा जो कौतूहल रहा
वह स्वरुप प्रकट हो आया हो
कल्पना जीवंत रूप में उपस्थित हो आई हो
सारे कौतूहल हो गए हो शांत
और सभी प्रश्न उत्तरित से
ऐसी कामना होती सबकी कि
राम-सीता सी जोड़ी हो
मैं राम सा न सही...
पर जनकपुर की "ईला" तुम मेरी सीता हो !
अर्धांगनी जीवनसंगीनी प्राणप्रिये
तुम करती पूर्ण मुझे मेरी "ईले" !!
सेवा-श्रद्धा-विश्वास-त्याग-प्रेम से
यूँ ही हृदय सजाये रखना
चाहे बदल जाये संसार...
तुम सदा
प्रेम-सद्भाव बनाये रखना
मेरे जीवन
मेरे परिवार का
अब तुम अभिन्न अंग हो...
भेद नहीं अब हममें कुछ भी
तुम सदा अब मेरे संग हो...
मैं तुम्हारा पूरक रहूँ
एक दुसरे का हम पर्याय बनें...
ईश्वर की रहे कृपा
हम दोनों मिल कर एक अध्याय बनें
ख़ुशी मेरी हो तो मुस्कान तुम्हारी हो
दुःख-कष्ट में भी हमारी साझेदारी हो
संग हँसता-मुस्कराता-खिलखिलाता रहे हमारा मन
एक दूजे के संग सदा यूँ ही सरस बना रहे जीवन !!
--गायत्री वल्लभ पाण्डेय
रचनाधर्मिता / सत्य नारायण पाण्डेय
रचना
वह भी
कविता की
जोड़-तोड़ से कहाँ संभव ?
यह तो दैवीय प्रेरणा है
सृष्टि का यही भेद अभेद्य है
और यह प्रेरणा दिमागी कसरत कदापि नहीं
न तो बुद्धि का ही स्वेद है
जानें बुद्धि के परे भी कोई घटा गहराती है,
तब भी स्पष्ट नहीं, ये प्रेरणा कहां से आती है!
फिर भी
हर सहृदय कवि यह जानता है
अपने अनुभव से भी सत्य मानता है,
कि, जो चीज उसने अभी अभी गढ़ी है,
उसकी बुद्धि की पिटारी वह थी ही नहीं.
यह रचना भी उसकी कलम से उतरेगी-
ऐसी चिंता, उसने कभी की भी नहीं
रचना से पहले, जरा भी न भान हुआ
घटना घट गई तो, उसका संज्ञान हुआ
अरे भई! है यह अजीब दर्द जो
एकाएक ऊभर आता है
कोई यह न समझे,
कविता करने वाला
सुख पाता है
यह तो है,
मजबूरी की बात,
कि वह इस दर्द से भाग नही सकता
आस पास जो मेघ मंडराने हैं, उन्हे वह त्याग नहीं सकता
रचनाधर्मिता की शान यही है
बाकी कविता की अन्य कोई पहचान नही है ।
इति शम।।
सुप्रभातम्! जय भास्करः।
पापा से बातचीत :: कुछ अंश
![]() |
डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय |
कुछ भी करने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति के लिए सर्व प्रथम आत्मविश्वास जरूरी है, चाहे वह कार्य स्वयं के लिए हो, समाज के लिए हो, राज्य के लिए हो, देश के लिए हो अथवा सम्पूर्ण विश्व के लिए हो. सर्वप्रथम लक्ष्य का निर्धारण, लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कठिन परिश्रम एवं स्वस्थ्य मन मस्तिष्क के साथ सकारात्मक कदम उठाने की जरूरत होती है। सफलता के प्रति दृढ़ विश्वास ऐसा हो कि "स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है" की तरह "सफलता मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है". मैं अपनी मेहनत और लगन से निश्चित समय सीमा मे लक्ष्य पाकर ही दम लूँगा ।-----यदि ऐसी दृढ़ इच्छाशक्ति नही है, सेवा के बदले स्वार्थ लेकर कुछ करने की मनसा हो, तो वैसे व्यक्ति को मेरी सलाह है वह समाजिक जिम्मेदारी लेने से दूर रहे। ढोंग तो टिकने वाला नहीं। जय भास्कर!
*** *** ***
"ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा । बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति
।।वह महामाया भगवती भवानी, ज्ञानियों के चित्त को भी बल पूर्वक खींच (ज्ञान से मोह की ओर) कर मोह से जोड़
देती है, इसका अभिप्राय यह है
कि, ज्ञानी भी सजग न
रहें तो, मोह, माया उन्हें भी अपने प्रभाव
में ले लेती है, फिर लापरवाह की बात ही क्या?
सधन्यवाद प्रेषित! मंगलकामनासहितम्! जय मां आदिशक्ति!
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"संकल्प" कितना महत्वपूर्ण है, समझ के अभाव में चाहे वह विद्यार्थी हो, धनार्थी हो, स्वस्थ का याचक हो, किसी भी सामाजिक, पारिवारिक, या कार्यसम्पादनार्थ जो भी कार्य इच्छित हो, उसकी निर्बाध सफलता के लिए अपने इष्टदेव या परमादर्श का हृदय से स्मरण कर सूचिता के साथ संकल्प समूह के समक्ष लेना चाहिए. इसका असर होता है, हम संकल्प के प्रति सजग रहते हैं, फिर सफलता भी कलकदम चुनने को मजबूर हो जाती है। यही कारण है कि हमारे सारे आध्यात्मिक कार्य ध्यान और संकल्प से ही आदिकाल से आरम्भ होते रहे हैं। पर अफसोस जैसे आज के राजनेता, मंत्री, समाज सेवी "सपथग्रहण "को सिर्फ एक कट्सी (परम्परा) मात्र मान कर चल रहे हैं, विडम्बना यह कि हम भी किसी छोटे बड़े कार्य के सम्पादन में परम्परागत संस्कृति को संकल्प आदि को कट्सी (परम्परा निर्वहन) मात्र मान बैठे हैं, सारे प्रयास असफल सिद्ध हो रहे हैं। हम अब भी जागें। अब भी जागें।मंगलकामनासहितम्! सुप्रभातम्! जय भास्करः।
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"सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता" सुख की स्थिति हो की दुःख की ईश्वर बुद्धि वाले (महान) व्यक्ति एकरूप ही बने रहते हैं. "सब पूर्व निर्धारित है, कब क्या होना है? जानकारी के अभाव में हम मनुष्य सुख या दुःख से प्रभावित होते रहते हैं, यह भी उसी परमात्मा की देन है, यथावसर अनुभूतिगम्य बनाने की। ईश्वर हमें यथावसर समभाव में रहने की शक्ति दें।जय राधे! राधे! राधे! राधे!
बस समय की प्रतीक्षा धैर्य पूर्वक करनी चाहिए, मन की बात जहां कही जा सकती है, वहीं कहनी चाहिए, सब से एक जैसी उम्मीद ही दुःख का कारण होता है। सदा खुश रहो, बहुत अपने जो हैं, उनको खुश रखो, दुनिया से कुछ लेना देना है ही नहीं तो फिर दुःख काहेका?
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सुप्रभातः सर्वेषाम्! मंगलकामनासहितम्! जयतु भास्करः! "गृह(धर)को परिभाषित करते हुए "गृहिणी गृह्यमुच्यते "कहा है, हिन्दी की लोकोक्ति भी प्रसिद्ध है :----"बिन घरनी घर भूत का डेरा" स्पष्ट है चहारदीवारी से घिरे कमरों से घर घर नहीं बन जाता, परिस्थिति भले बदली हो पर वर्तमान समय मे भी उपर्युक्त वाक्यों को झुठलाया नहीं जा सकता है। पुनः स्पष्ट किया गया है :-
माता यस्य गृहे नास्ति, भार्याश्च प्रियवादिनीम्। अरण्यं तेन गन्तव्यं यथा गृहं तथा वनम् ।।
अर्थात् जिसके घर में मां नहीं हो, प्रियवचन(मधुर वचन) बोलने वाली पत्नी न हो, उसे जंगल मे ही चले जाना चाहिए, क्योंकि दोनों के अभाव में घर और वन में फर्क ही क्या है? "यथा गृहं तथा वनम् ।। मां लाड़ प्यार के साथ संस्कार भी देती है, पत्नी अपनी अच्छी भूमिका में "तारिणी संसारसागरस्य " संसार रूपी सागर से सहज तरने में पति की सहयोगिनी होती है। स्पष्ट है भूतकाल में अभी वर्तमान में या भविष्य में पति पत्नी की रथ के दो पहिये की भूमिका निभाने की बात सफल जीवन के लिए त्रिकाल में सत्य है। इसे झुठलाना आसान नहीं।
इति शुभम !
क्रमशः ...
हमारा तुम्हारा एक ही आकाश है !
दूरी और सामीप्य के मध्य
कहीं एक अदृश्य क्षितिज है...
वहाँ कहने सुनने से परे
मौन गुनगुनाता है...
एक अदृश्य डोर बाँधती है
कोई गहरा नाता झिलमिलाता है...
बिना किसी संवाद के
ज्ञात हो जातीं हैं बातें...
दुःख का साया वहाँ गहराता है
यहाँ और अधिक काली हो जाती हैं रातें...
इस तरह दूर हो कर भी तू पास है
हमारा तुम्हारा एक ही आकाश है !!
मिट्टी का जीवन...
मिट्टी का जीवन...
मिट्टी के दीपक सा ही है...
गढ़ा जाता है जलने के लिए...
रौशनी बन कर आँखों में पलने के लिए...
तेज़ हवा के विरुद्ध
दीप का संघर्ष शाश्वत है...
मनुष्यता के समक्ष खड़ी पहाड़ सी मुश्किलें हैं
दृढ़ निश्चयी मन कहता है: "आओ बाधाओं तुम्हारा स्वागत है..."
कि हम आस-विश्वास के सदैव शरणागत हैं... !!
लें कितना इम्तहान लेंगी परिस्थितियां...
लौ जलती रहती है... जलती रहेगी...
सनातन है यह संघर्ष और अंततः लौ की जीत परंपरागत है... !!
सपनों के रंग
और रंगों का संचयन...
जीवन को हर हाल में श्रेष्ठ बनाता है...
इन्द्रधनुषी आकाश में एक संकल्पों का इन्द्रधनुष भी चमचमाता है...
उन्हीं दिव्य रंगों से चुन कर आशा
हम हर क्षण जीवन के शरणागत हैं...
भले ही अन्धकार छलने में कितना ही पारंगत है
दीप का हौसला साथ है...
हर निशा का निश्चित एक प्रात है... !!
हमने यूँ जीने की तरकीब निकाली...
एक आधी पंक्ति में
अपना टूटना बिखरना क्या ही बताते...
सो कोरे पन्नों वाली
एक पूरी ही क़िताब लिख डाली.
'चुप' में रच डाला सारा प्रेम
आंसुओं की लिपि में लिखे कुछ ज़रूरी ख़त
धैर्य के महीन धागों से बुना इंतज़ार
मौत के मुहाने हमने यूँ जीने की तरकीब निकाली.
शब्द नहीं होते कई बार
छोटे छोटे संवाद भी नामुमकिन से हो जाते हैं
ऐसे में चुप रह जाते हैं हम
गुम कहीं अँधेरे में जैसे हो ही नहीं इस जहां में कहीं
इस शून्य हताश से बेगानेपन में
बस एक ही तसल्ली है-
कि हमारे न होने से भी कुछ नहीं रुकता.
जिन्हें हमारा 'गुम' होना याद है
उनके लिए भी हमारा 'न मिलना' बस एक मामूली सी ही बात है
एक 'पिन' के खो जाने जितना मामूली
या शायद उससे भी कम.
हर क्षण
आने और चले जाने की
पीड़ा जीने को अभिशप्त इस दुनिया में
ये कितना बड़ा इत्मीनान है, कि-
दुखों का पहाड़
बीतते बीतते बन जाता है
कल कल बहती धार
वो धार
जो सींचती है
यादों की ज़मीं...
पहाड़ की
कठोर अचलता में ही कहीं
मुस्कुराती है नमी...
सामीप्य के पैमाने ठगे से रह गए
सब अच्छा ही तो था...
सब अच्छा ही तो है...
फ़िर कहाँ हुई चूक
कैसे छिटक गया फूल और ओस रिश्ता
इतनी दूरियां कैसे आ गयीं
कि सामीप्य के पैमाने ठगे से रह गए
पता ही नहीं चला
कब उग आयीं दरारें...
ऐसे में क्या फ़र्क पड़ता है,
जीतें या हारें...
इतना जटिल है जीवन
इतनी जटिल है मन की दुनिया
कैसे सुलझे
इतने उलझे हुए हैं जो सिरे
कुछ भी तो नहीं हाथों में मेरे!
फ़िर लगता है,
वेदना का मौसम है...
मौसम ही है तो बदल जाएगा...
ओह! ये तो रात है अभी
सुबह होगी, तो-
फूलों पर
ओस की बूंदों का अस्तित्व
नज़र आएगा... !
ये कठिन समय है...














