अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

"कृष्णार्पनं अस्तु"

मनोरम छवि
प्रभु की..
ऐसा ही सुन्दर
जीवन का हर प्रभात हो !
कृष्ण...राधिका संग
हृदय में विराजे...
भाव-भक्ति की
यह अनुपम सौगात हो !!

बाल ग्वालों के
झूंड में..
कान्हा की उपस्थिति सा
आभास साथ हो !
कौन्तेय को जैसे
सन्निधि प्राप्त थी...
वैसे ही हमारे सर भी
केशव का हाथ हो !!

मुखरित
कर्म सन्देश बन..
अविरल बहती धारा से
सिंचित दिवारात हो !
सौम्य सी छवि
नयनो में बसी हो...
हिय में खिला सदा ही..
दिव्य प्रात हो !!

कृष्णार्पनं अस्तु
मंत्र से उत्प्रेरित सिंचित..
सकल क्रिया-क्लापों की
श्रेष्ठता की कभी न मात हो !
कृष्ण...राधिका संग
हृदय में विराजे...
भाव-भक्ति की
यह अनुपम सौगात हो !!

11 टिप्पणियाँ:

वन्दना 22 सितंबर 2010 को 12:33 pm  

बहुत ही भावमयी प्रस्तुति।

sunita 22 सितंबर 2010 को 12:36 pm  

सच में अनुपमा जी .....आपकी हर कविता अनुपम है ....भक्ति के भाव से सजी सुन्दर रचना ....

संगीता स्वरुप ( गीत ) 22 सितंबर 2010 को 5:21 pm  

बहुत सुन्दर ...कृष्णमय कर दिया आज तो ..

डॉ. नूतन गैरोला " अमृता " 22 सितंबर 2010 को 7:49 pm  

anupama ji bahut accha laga aapke saath is anupam yatraa mei... aap shayad mere saath aur kahi bhi hai.agar mai galat naa pehchaanoo to...

shyam1950 23 सितंबर 2010 को 1:24 am  

अच्छी रचना है ..कुछ समय के लिए तो कृष्णमय कर गई..कृष्ण भगवान थे या नहीं यह तो मैं नहीं जानता लेकिन विलक्षण ऐतिहासिक व्यक्तित्व के रूप में मुझे बहुत प्रभावित करते हैं .. विशेषकर उनका बाल्य-काल जैसी कबीलाई और उन्मुक्त सामाजिक सरंचना में व्यतीत हुआ वह तो हमेशा ही उनके उल्लेख से मेरे चिंतन के केन्द्र में आ जाती है.. नन्द का कबीला अपने समय में सत्ता-केंद्रित शहरी व्यवस्था के विरुद्ध बागी वनवासी कबीला रहा होगा घुमन्तूजनों का कबीला जिनका भ्रमण-क्षेत्र आज के वृन्दावन गोवर्धन गोकुल से लेकर चम्बल के बीहड़ों तक फैला हुआ था..काश! हमारे पास कृष्ण का मिथक से मुक्त इतिहास होता ..

राजभाषा हिंदी 23 सितंबर 2010 को 4:07 am  

बहुत अच्छा समर्पण, प्रभु को। बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
अलाउद्दीन के शासनकाल में सस्‍ता भारत-2, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

Suman Tiwari 23 सितंबर 2010 को 7:33 am  

बहुत सुंदर

mridula pradhan 23 सितंबर 2010 को 9:18 am  

wah.bahot sunder .

sandhyagupta 23 सितंबर 2010 को 12:41 pm  

भक्ति रस में सराबोर कर दिया.शुभकामनायें.

मनोज कुमार 23 सितंबर 2010 को 2:39 pm  

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
आभार, आंच पर विशेष प्रस्तुति, आचार्य परशुराम राय, द्वारा “मनोज” पर, पधारिए!

अलाउद्दीन के शासनकाल में सस्‍ता भारत-2, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

babanpandey 24 सितंबर 2010 को 9:16 am  

bahut hi sundar ...krishn ke sansaar ka varnan
badhaii..

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