अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

प्रेरणा और गीत

हम तो श्रीहीन हो सोये थे..
ऐसे में कोई लिख रहा था उजालों को!
शब्दों की व्यथा हर संघर्षरत प्राणी की व्यथा है..
अपने गीतों का सारा श्रेय चलनेवालों को!!

कहीं इस कविता को पढ़ने वाले पहले व्यक्ति की ही ये प्रेरणा तो नहीं
ये अद्भुत बात है, कहीं लिखनेवाले से पढ़नेवाला ही बड़ा तो नहीं
विचारों का मंथन जरूरी है...
लिखा जाना पर्याप्त नहीं, लिखने वाला और पढ़ने वाले विचारमग्न हों
तब कथनी और करनी की खाई को पाटने की सम्भावना पूरी है
इस दिशा में प्रयास हो...
हमारे उद्देश्य किन्ही अर्थों में भिन्न तो नहीं
जो मेरी बात... वही तेरा कथ्य... कोई भी खिन्न तो नहीं

हम तो श्रीहीन हो सोये थे..
ऐसे में कोई लिख रहा था उजालों को!
शब्दों की व्यथा हर संघर्षरत प्राणी की व्यथा है..
अपने गीतों का सारा श्रेय चलनेवालों को!!

7 टिप्पणियाँ:

हमारीवाणी.कॉम 17 अगस्त 2010 को 11:15 am  

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कौशल तिवारी 'मयूख' 17 अगस्त 2010 को 3:21 pm  

sundar

anupama 18 अगस्त 2010 को 6:06 am  

dhanyavad!

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) 19 सितंबर 2011 को 4:56 pm  

कल 20/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

संगीता स्वरुप ( गीत ) 20 सितंबर 2011 को 11:15 am  

अच्छी प्रस्तुति

रेखा 20 सितंबर 2011 को 12:24 pm  

सुन्दर अभिव्यक्ति ..

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') 21 सितंबर 2011 को 4:44 pm  

badhiya prastuti...
sadar

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