प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
26 जुलाई 2017
 |
| डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय |
इस त्वरित रचना के लिए बहुत बहुत धन्यवाद पापा!
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है आज कारगिल दिवस
भारतीय सैनिकों की
गौरव गाथा का दिन
हुई थी
भारत के शान की
रक्षा...
वीर सैनिकों के
मान की रक्षा...
सम्मान की रक्षा...
यह है
दुश्मन के पश्त होने का दिन
पाक के नापाक होने की दास्तान
है सन् निन्यानवे की बात,
मुशर्रफ ने
छुपे रूप में
की थी वारदात.
नवाजशरीफ
शरीफ बन बैठे रहे
अन्दर ही अन्दर
मुशर्रफ कुचक्र रचते रहे
है हमारी भी आन,
पर हम
किसी को छेड़ते नहीं,
पर कोई भूल से भी
छेड़ दे
तो छोड़ते नहीं...
तत्कालीन प्रधानमन्त्री
अटल जी ने
अटल लिए इरादा
की थी सौहार्दयात्रा...
दुष्ट को
यह सब कहां भाता है
उन्हे बार बार
शिकस्त खाने पर भी
नहीं समझ आता है... !!
हमारी सेना और नीतिज्ञों ने
सबकुछ भांप लिया...
और रातो रात वह हुआ
जो सबने देखा और जान लिया...
मरे पाक के हज़ारो सैनिक
घायल हुए हज़ारों,
जो भाग सके भाग लिए
कायर भी हज़ारों... !
थी साजिश पाक की...
सीमित युद्ध ने ही
उनका काम तमाम किया !
भारतीय सेना ने
फिर ऊंचा अपना नाम किया !!
थी उनकी
छिपी अच्छी तैयारी,
फिर भी
हमारे सैन्यबल के आगे
पाकसेना हारी !
है भारत को अपने सैन्यबल पर नाज
रोते रहें मुशर्रफ और नवाज !!
है हमारा भारत महान
वीर सैनिक हैं,
सीमा पर जिसकी शान
कारगिल दिवस पर
हार्दिक अभिनन्दन...
देश के रक्षक
तेरी चरणधुलि का
करते हम चन्दन!
हैं हम और देश सुरक्षित
आज पुनः गर्व से दीपित
है भारत का
भव्य भाल...
क्यों न हो,
यह तो है
"कारगिल विजय" का कमाल
यह तो है कारगिल विजय का कमाल !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
25 जुलाई 2017
सच है,
गति ही जीवन है...
ये और बात है, कि
जीवन में
हर क्षण
टूटता एक कहर रहा है... !
कहीं कोई पल
सदियों के फासले मिटा देता है...
वरना
सुधा की आस में
हर कोई यहाँ
पीता जहर रहा है... !
कितने जीवन
बस झूठी शान में निमग्न हैं...
ये भ्रम पाल बैठे हैं
कि ये दिन यूँ ही रहेंगे
जबकि सब देख रहे हैं
हर जीवन अंततः डूबता पहर रहा है... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
24 जुलाई 2017
कभी कभी क्या होता है...
सकल विपत्तियाँ एक साथ आती हैं...
समय कि ऐसी धाक है कि
उसके एक इशारे पर
मेरा कितने ही जतन से बनाया
रेत का महल
ढह जाता है...
समुद्री लहरें
सब बहा ले जाती हैं...
एक कतरा भी
आस विश्वास का
कहीं रह नहीं जाता...
---
मैं
रुंधे हुए गले से
पूछती हूँ समंदर से...
समंदर तो प्रगल्भ है...
विशुद्ध मौन है...
वो कुछ नहीं कहता...
अपनी लहरों से कहलवाता है::
रेत का ही महल था न...
फिर से बना लो...
तुम्हारे महल में दरवाज़े तो थे
झरोखे नहीं थे
इस बार
झरोखे भी बनाना
कि
देख सको तुम आसमान
उन निराश अशक्त क्षणों में भी...
कि जब तुम जा नहीं सकती खुले गगन के तले
कुछ दर्द
पाँव की ज़ंजीर बन
उन्हें बढ़ने नहीं देते
उन लम्हों के लिए
ज़रूरी हैं वो झरोखे
तो
इस बार भूल न जाना
झरोखे भी बनाना !
---
सुन लिया
लहरों का कहा...
मेरी चेतना ने फिर कुछ यूँ मुझको तहा --
कभी कभी
सब कुछ ढह जाए
ये भी ज़रूरी है...
कि
तभी नए सिरे से
शुरुआत होगी...
ज़िन्दगी
बचपन का भोलापन ही है...
वहीं तट पर खेलती हुई मिलेगी !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
दूध और दही की नदियाँ,
बहाने का नारा ----
बाद में देना!
कम से कम प्यासों को,
शुद्ध पानी तो पिलाओ!
सर्वं कर्तुं समर्थः -
सर्वकारः (सरकार) पद से
बना है।
फिर
सरकार (सर्वकारः) के होने पर भी -----
गरीब मजदूर,
बेहाल किसान क्यों ???
कर रहे आत्म-हनन।
क्या बहु बेटियां,
यूं ही सतायी जायेंगी?
कभी अफसरशाही,
कभी जनप्रतिनिधि की
तानाशाही --
चलती ही रहेगी?
आखिर अब हम कब बदलेंगे?
भ्रष्टाचार का बढ़ना,
दयालुता का-
इस तरह मरना --
ओह!
होता मन मे प्रश्न -
क्या अब भी नहीं होगा --
इन कुप्रवृत्तियों का अन्त ।
स्वार्थपरता का,
जन जन मे बढ़ना,
है विकट संत्रास
हो रहा निरन्तर
तप-त्याग का ह्रास ।
क्या अब भी
सर्वत्र
ऐसा ही रहेगा?
तबाही-अराजकता और हाहाकार?
तबाही-अराजकता और हाहाकार???!!!
[[ जनवरी ९९ ]]
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
लें संकल्प ::
मै क्रोध नहीं करूंगा ।
चिन्ता न पास फटक पाये
ऐसा यत्न करूंगा ।
अपना दैनंदिन कार्य-
आलस्यरहित हो करूंगा ।
किसीपर निर्भरता से दूर-
सम्भव हुआ तो --
दूसरे की-
सहायता ही करूंगा ।
हो सभी जीवों से प्रेम --
कि है सब में --
एक ही ईश्वर का वास !
अगर यह ज्ञान "सम्यक" हो जाए-
फिर कौन?
किसी पर क्रोध करेगा?
होगी यह भावना पुष्ट,
तो सहअस्तित्व और सेवाभाव जगेगा ।
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
23 जुलाई 2017
 |
| Dr. S.N.Pandey |
छोड़ो कल की बातें
कल किसने देखा?
माना
बीता कल भी
कल है!
आने वाला कल भी
कल है!
पर हम क्यों न करें,
आज की बात ।
वर्तमान में ही जीना सीखें।
बीता तो कल भूतकाल, बन जाता है
आने वाला कल "भविष्यत् "कहलाता है ।
आज
यानी "वर्तमान" मे हम ---
जीना सीख लें ---
तो कल का झंझट खत्म हो जाएगा ।
न बीता कल डरायेगा,
न आने वाले कल की चिंता ----
सतायेगी ।
बीता कल "भूतकाल"
आनेवाला कल "भविष्यत काल" है
जो साथ है,
वही है --"वर्तमान",
सहृदय सुन्दर काल!
"वर्तयति इति वर्तमानः" होवें यदि हम सब,
इसी में क्रियमान
हो पूरी ईमानदारी,
सजगता,
औ' कर्म के प्रति सम्मान
बीते कल से
लेकर शिक्षा --
वर्तमान का करें सदुपयोग
न भूत (भूतकाल) का
भूत (भय) सतायेगा !
आज की सजगता---
भविष्य की नींव सुदृढ़ करेगी
चिन्ता होगी काफूर ।
मन होगा शान्त ।
हृदय को शुकून मिलेगा ।
आज के कृत्य, आज ही निपटायेंगे
मन नहीं भटकेगा ।
कार्य की पूर्णता मे ही रमेगा ।
बढेगा कर्म-कौशल,
गुणवत्ता बढ़ेगी ।
जीने का अन्दाज़ मिल जाएगा ।
जीवन आदर्श बन जायेगा...
जीवन आदर्श बन जायेगा !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
नाम में क्या रखा है... कि नाम में ही सब रखा है, ऐसी ही कुछ जिज्ञासा पर जरा सी बातचीत का एक अंश
*** *** ***
सिर्फ और सिर्फ अपना ही भला चाहने वाले को, सुयोधन, "सुयशः धनं यस्य -स सुयोधनः", किंतु नाम के विपरीत आचरण के कारण "दुर्योधन" नाम से वह प्रसिद्ध हुआ ।
अपनों का भला चाहने वाले को "अर्जुन" क्योंकि धर्मयुद्ध यानि धर्म की स्थापना के लिए युद्ध की प्रेरणा (भगवान कृष्ण के द्वारा) दिए जाने पर दोनो सेनाओं के बीच स्थित अर्जुन ने भगवान् श्रीकृष्ण से कहा था "स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम् माधव!" सम्पूर्ण सृष्टि की भलाई चाहने वाले को भगवान कृष्ण कहते हैं--
"धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे"
अब हम स्वयं आत्मावलोकन करें, अभी हम क्या हैं और हमे बनना क्या चाहिए ।
विचारणीय! सधन्यवाद प्रेषित!
--सत्य नारायण पाण्डेय
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
ईश्वर देते हैं,
सबको सहज व्यक्तित्व...
हर कोई
अपनी सहज अभिव्यक्ति दे --
तो अच्छा है.
प्रतिभा प्रदर्शन के नाम पर,
स्वभाव का त्याग
प्रयत्न पूर्वक,
दूसरे की तरह बनने का हठ अनुराग
सम्भव है हमे पंगु बना दे!
कि,
दूसरे का अनुकरण,
फलित हो,
जरूरी नही...
स्वाभाविक प्रतिभा के मिटने का भी
फिर ख़तरा है!
हो अपनी स्वभाविकता,
साथ ही
स्वप्रतिभा के विकास की सोच...
बनाती है,
अपनी भी पहचान.
दूसरे की नकल पेश कर,
हम वाहवाही पा लें...
पर
मौलिकता जाती रहेगी...
इस तरह से
पाए गए ऐश्वर्य
भागते बादल की छाँव की तरह होते हैं...
हैं अभी,
फिर अगले क्षण नहीं...
भागते बादल
भागे नहीं
कि धूप का आलम
छा जायेगा...
आत्मविश्वास भी
डगमगायेगा.
स्वस्वरूप जो ईश्वर ने दिया था,
उसे भी गवां देंगे !!
स्व सहज व्यक्तित्व को बचाना
सहज प्रस्तुतिकरण,
स्वव्यक्तित्व रक्षण,
वास्तविकता के साथ प्रतिभा का अनुसरण
यही
हर शख्स के लिए शुभ है
कि,
ईश्वर ने सबको दिया है --
कोई न कोई विशिष्ट गुण
हर व्यक्ति होता है,
अपने आप मे पूर्ण ! अपने आप मे पूर्ण !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
हमने
देख लिया
अपना होना...
हमने
ये दुनिया भी
देख ली...
हर जुड़ने वाला
उतना ही खरा है...
फिर
मन मेरा क्यूँ
आखिर इतना भरा भरा है...
सारा दोष मेरा है...
जुड़ने जाते हैं...
बार बार ठोकर खा कर भी
इस दुनिया की मंशा भांप नहीं पाते हैं...
तो मन चल अब
अपनी उस खोह में
जहाँ किसी का भी
आना वर्जित हो...
वहीँ
झूठ फ़रेब की मार से टूटे हुए दिल को
ज़रा सी शान्ति तो अर्जित हो... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
22 जुलाई 2017
काठ की बनी बांसुरी
किस युक्ति से धुन बन जाती है
सुनना कभी गौर से
ज़िन्दगी भी ऐसे ही पल पल सरगम गाती है
शोर में गुम गया है आत्मा का संगीत
जाने क्या होती है वो शय जिसे कहते हैं प्रीत... !!
काठ की बांसुरी में
प्राण फूंकने वाले कृष्ण
जाने कहाँ विलुप्त हैं...
यहाँ वीरान है
भक्ति का आँगन और
और अँधेरा पल पल रहा है जीत... !!
हवा का कम्पन
कुछ सिरज रहा है
रंध्रों में कोई ध्वनि उग रही है
पराजित हो रहा है मौन
ख़ामोशी से ज़िन्दगी पहचान रही है अपने लिए
अपने सबसे बुरे दिनों में साथ खड़े होने वाले मीत... !!
काठ की बांसुरी से हौले हौले रिस रहा है "कृपा रूप" संगीत... !!!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
काम के बोझ ने,
हँसना भूला दिया है
हम खुलकर हँस भी सकें,
वैसी जगह कहां है?
हां,
है ऐसी ही बात,
अब तो हँसी भी रूठ गई है ---
इसी लिए तो
जिंदगी बोझ बन रही है
अरे भाई!
अब भी सचेत हो जाओ
असमय मौत को तो न बुलाओ
हँसो
छोटी छोटी बातों पर भी,
मत खोजो हास्य के लिए बड़ा जलसा
या जलवा...
अगर यही हाल रहा तो,
मनुष्य बन कर रह जायेगा मलबा !
हंसी
गाहे-बेगाहे,
अवश्य आनी चाहिए --
कोई पास न भी हो तो, यह नुक्सा अपनाईये...
ऐसी व्यवस्था की ही जानी चाहिए... !
याद करें
कभी तो आयी होगी हँसी खुलकर
करें उन्ही पलों की याद चुन चुन कर
अरे भाई! जितना अच्छा होता है हँसना,
उससे भी कहीं अच्छा है - दूसरों को हँसाना
करें सायास प्रयास ---
जो भी आये पास वह भी हँसता हुआ जाए...
क्यों? हम मनहूस बन बैठें
कि दूसरे की हँसी भी छिन जाए... !
यह हम सब जान लें
हँसने और हँसाने से अच्छा---
कोई काम नहीं,
तनाव से मुक्ति का उपाय भी तो यही है.
तनाव
शरीर को झकझोर देता है,
खुलकर हँसना भी --
शरीर को झकझोरता ही है,
पर है दोनों में कितना अन्तर!
तनाव की झकझोर शरीर को तोड़ देती है
हँसी भी झकझोरती है,
पर कर तरोताजा मन-मस्तिष्क को ----
नई उर्जा भर देती है
जीवन को एक सहज सुन्दर मोड़ देती है... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
रेल
धीरे धीरे
बढती है गंतव्य की ओर...
कितने ही दृश्य
यादों में संजोने...
यादें,
जिनका होना है,
न कोई ओर न छोर...
बस भागते हुए ही बीतनी है रातें
भागते हुए ही होती है भोर...
कभी तो ठहर, ज़िन्दगी!
किसी ठौर...
***
हर पड़ाव से बढ़ते हुए
वहीँ कहीं थोड़ा सा
छूट जाते हैं हम...
और यूँ छूटते छूटते एक दिन
ख़त्म हो जानी है यात्रा हमेशा के लिए...
***
इस एकांत में
विराट पर्वत की
अचलता महसूस की
अथाह पानी के
बहते निर्मल स्वरूप को
आत्मसात किया
पत्तों के हरेपन में
दर्द की हूक सुनी
बारिश की बूंदों में
नेह के उज्ज्वल इंद्रधनुषी रंग देखे
इन सब देखने में
अपनी लघुता भी देखी...
प्रकृति के यूं होने की सार्थकता महसूस करते हुए
अपने होने की निरर्थकता को भी जाना
कि यात्राएं हमें हमारे सच तक ही तो ले जाती हैं
हर यात्रा वस्तुत: खुद से खुद की यात्रा ही तो है... !!
***
किस सदी के ईंट पत्थर...
ये भी एक अद्भुत मंज़र...
इतिहास इन किलों में मुस्कुराता है...
अंधेरा यहां, प्रकाश का ही, प्रतिरूप हो जाता है... !!
***
सूरज है तो डूबेगा भी...
लेकिन फिर उग आएगा
सवेरा लेकर...
जाता है रात को वह
सारी जिम्मेदारियां
चाँद को देकर...
कि धरा पर
जितनी बेचैन आत्माएं हैं
सबको चांदनी मिली रहे...
जब भोर में उगे वह
तो आस विश्वास की क्यारी
सबके आँगन खिली रहे... !!
*** *** ***
[[ जीवन, यात्रा और हम ]]
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
कभी सुनामी लहर,
कभी प्रचण्ड भूकंप की कहर...
कर देते है,
मानव की ज़िन्दगी तबाह
परिवार के परिवार बिखर जाते हैं
बच्चे अनाथ,
स्त्रियां बेवा
पुरूष भी विधुर-
बेहाल हो जाते हैं।
सरकारें,
स्वयंसेवी संस्थाएं,
ऐसी विपदा में हैं करती देखभाल
पर प्रकृति प्रकुपित हो
हमें भी सिखाती है--
"रहो दायरे में,
स्वभाव मत छोड़ो ।
केवल स्वार्थपूर्ति के लिए
मुझे मत छोड़ो ।"
पर यह हम
कहां समझ पाते हैं!
पुनः पुनः
सब भूल
स्वार्थपरता में ही
लिपटते चले जाते हैं।
थी हमारी स्वाभाविकता,
परदुःख कातरता ।
पर अब हम परदुख देख
दुखी नहीं होते ।
होते भी हैं तो,
होती मात्र औपचारिकता ।
आज
भावनात्मक रूप से
क्यों निष्क्रिय हो गये हैं हम?
गम्भीरता से सोंचे --
यह हमारे लिए अच्छा नही है
कि
मानव होकर भी,
मानवता से दूर हो गए हैं हम ।
है यह
खतरे की घंटी ।
हम बेचारा बन जायेंगे ।
बचे खुचों के जीवन मे
रह जायेगा केवल गम ।
अन्ततः
मानवता मिट जाएगी ।
समय रहते,
अगर हम नहीं चेते ---
तो प्रकृति भी
हमें क्योंकर बचायेगी?!!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
21 जुलाई 2017
इन टुकड़ों का रचनाकाल याद आता है... रोज़ आदमी कैसे अपने कार्यक्षेत्र में रोज़मर्रा की दुनिया में उलझता सुलझता हुआ जीता है इसी की एक सहज सी झांकी प्रस्तुत करती सी भाव दशाएं हैं... वैसे तो बहुत व्यक्तिगत अनुभवों का समावेश है... कॉलेज की समस्याएं, व्यवस्था से टकराव और शिक्षकों की स्वार्थपरता एवं डर को लक्षित कर लिखे कुछ भाव हैं..., परन्तु ये हर दौर में प्रासंगिक से लगे. आज इस कविता को डायरी के पन्नों से यहाँ उतारते हुए वे दिन सजीव हो उठे... वो हर रोज़ का संघर्ष आँखों के आगे से गुज़र गया !
खैर, आज प्रस्तुत है करीब डेढ़ दशक पुरानी पापा की यह रचना...
अंधेर नगरी, चौपट राजा
टके सेर भाजी टके सेर खाजा
थी प्रसिद्ध कभी यह कहावत,
यह अब भी सच लगता है ।
ठोकर जितनी भी लगे,
कौन? कहां? कब? सीखता है ।
क्षुद्र स्वार्थ के लिए सब खण्डित,
कैसे हो सच्चाई मण्डित ?
सत्य तो तिक्त होता ही है ।
सुनने वाला अभियुक्त रोता ही है ।
नीति कहती है--
प्रिय सत्य ही बोलो...
"सत्य" अप्रिय हो, मुंह मत खोलो...
है यह आलम सारा,
सत्य सर्वत्र दीखता हारा ।
प्रिय पर, झूठ ने, जब सबको "ललकारा "।
अब क्या होगा?
जब भाग रहे सबके सब, जिम्मेवारी से ।
अपना कर्तव्य भुला,
दूसरे को दिखाते न्याय की तुला ।
आखिर क्यों ये ऐसा कर रहे,
जबकि जीवन है, मात्र एक बुलबुला।
धौंस दिखा,
अच्छे होने का प्रमाण पत्र तो
हम पा जाते हैं,
पर क्या, अन्तःकरण की आवाज को,
अनसुना कर पाते हैं ?!!
जहां भी होते
अन्दर की सज्जनता,
धिक्कारती है,
पर दुर्जनता उसे कहां स्वीकारती है?
*** *** ***
"मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना"
माना है स्वाभाविक!
पर क्या?
ऐसे में किनारा पा सकता है,
नाविक?!!
मतलबी तो,
करेगा ही
अपने मतलब की बात...
उन्हें तो दीखती
बस अपनी सौगात...
पर क्या
हम सब मिलकर भी,
नहीं रोक सकते गलत आघात ?!!
दुख है
समूह समझ नही पाता
शातिर दिमाग की चाल ।
पर कौन? कैसे? लोगों को बताए?
जब तक तुम सब जगोगे सब लुट जाएगा ।
बगुलाभगत लगा अपनी जुगत
मन ही मन इतराता है ।
अपनी निष्पन्दता दिखा जलचर को भरमाता है ।
मासूम मरे, समझदार क्या करे?
जब सब ओर यही नजारा है,
पर आशा है यही प्रबल,
आता हर रोज रात्रि के बाद उजाला ।
लाख लोग लगायें सच्चाई के मुखपर ताला ।
*** *** ***
अब न कभी कुछ बोलूँगा
न तो सभी के साथ डोलूँगा
कुछ लोग तो रहते ही हैं सुविधाभोगी
उनके होने से कब दुनिया सुख भोगी
बता दे कोई आज हमें
भगत सिंह, चन्द्रशेखर जन्में कितने
जो चाहते मर कर ही अमर होना
उन्हें कब डिगा पायी गोली
कब विचलित कर पाया चांदी सोना
गलती कर जो अकड़ दिखाते
लोगों को भरमा निज जकड़ जताते
खाल शेर का ओढ़ अभी वे जितना अकडें
असली शेर के आते ही जायेंगे पकड़े
*** *** ***
चल रे मन निश्छल उपवन की ओर
सब चल रहे पकड़े विनाश की डोर
यदि है शिकायत व्यवस्था से तो मत देखो उस ओर
चल रे मन निश्छल उपवन की ओर
दुनिया में सब जीवन को भरमा रहे
सच कब किसे सुहाता है
मोह में ही जीना थाती है
अन्धकार में रहना
विषदंश सहना
नियति
अब तो है केवल समय की प्रतीक्षा
लोगों में ज़रूर जागेगी सद इच्छा
अभी तुम्हारी चल रही परीक्षा
जब तक प्रबल है जन जन की धन इच्छा
समय आएगा
सब संभल जायेगा...
चलता चक्र ही परिवर्तन लायेगा
सब हो जागरूक समझदार
सबकी बुद्धि हो एक
"सत्य" छोड़ो यह आशा
छोड़ो यह टेक !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
20 जुलाई 2017
पापा की एक और कविता, या यूं कह लें कविता जैसा ही कुछ... शीर्षक कुछ और लिखा था उन्होंने मैंने बदल कर संजीवनी कर दिया कि मेरे लिए तो ये बातें संजीवनी ही है!
संजीवनी
---------------------------
प्रकृति
नैसर्गिकता...
स्वाभाविकता ही तो है...
सिखाती सदा,
मत करो मनमानी !
वह सिखाती है --
सदा मेरे साथ रहो,
होगा स्वस्थ जीवन,
होगी प्रेममयी ज़िन्दगानी !
अगर
न हो प्रकृति से छेड़ -छाड़,
तो क्यों कर आए विपदा अपार !
प्रकृति को समझना,
उससे
गहराई से जुड़े रहना -
यदि हो जीवन में नया रंग भरना !
क्या जाड़े में
हमें सूर्य नहीं भाते हैं...
असह्य गर्मी के बाद,
आई वर्षाऋतु
क्या हमें
आनंदित नहीं कर जाती है... !
आकाश में
उड़ते तैरते बादल ही तो,
कवि कालिदास के यक्ष हेतु,
प्रियतमा के लिए
संदेश वाहक बन जाते हैं !!
हम भी
अगर उन्हे निहारें,
खुले गगन में दृष्टि पसारें...
सच मानिए,
ये नीलगगन में
नीलनीरद
बोझिल मन को
हल्का कर देंगे...
इतना ही नहीं,
बादलों के बीच से,
यदा कदा चमकता सूरज,
आंखो को नई रौशनी देगा...
हमें
दूसरे के लिए भी जीना है,
यह भाव स्वतः स्पंदित होगा...
हर एक का अनुभव है,
अक्सर
हम अपने को
एकाकी पाते हैं...
दोस्त - रिश्तेदारों की बात तो दूर -
यहां तक कि -
पुत्र -पुत्री भी दूर चले जाते हैं...
जब
विशेष सहायता की
जरूरत नहीं होती
सब होते हैं साथ...
बुढ़ापे में होती जरूरत,
तब वर्तमान युग की मांग पर,
वे होते दूर जाने को मजबूर...
हां समय की मांग पर,
वे हो जाते दूर... !!
अपने भी आ गये,
अवकाश प्राप्ति के दिन
है स्वाभाविक
कभी न कभी -
उदासी आ घेरेगी...
तब भी प्रकृति ही,
साथ निभायेगी... !!
कि...
न तो वह अबतक साथ छोड़ी थी,
न आगे ही
साथ छोड़कर जाएगी...
जब भी
उदासी और अकेलापन
फटकें पास हमारे...
खुले छत या बालकनी से,
अनन्त आकाश को निहारें...
गगन में
दूर दूर उड़ते, चहकते पंछी
ही नई प्रेरणा देंगे...
उदास मन में उत्साह भर देंगे...
फिर होगी
नयी शुरुआत,
चिन्ता न लगा पायेगी कोई घात...
यह शाश्वत सत्य है,
प्रकृति कभी भी
हमें नहीं सताती है,
भले
हम उसके दुश्मन बन जाते हैं।
अब इस एकाकीपन में,
हर कोई करता यह एहसास...
हर क्षण, हर पल,
प्रकृति से बड़ा
कोई सहारा नहीं
कि...
हम जहां भी होते हैं-
चाहे वह देश विदेश हो
या कहीं और...
प्रकृति तो है सब जगह
वन, उपवन फैली अंतरिक्ष-गगन...
सकल मही हर ठौर...
अतः मेरे भाई !
करो प्रकृति से प्रेम
पर्यावरण को ही खंगालो...
न हो भूमि अधिक तो,
घर के आंगन
या घर की छत को ही,
पौध भूमि बना लो...
लगा दो
रंग बिरंगे फूल के पौधे
उसी में
खाद, पानी यथा समय डालो,
फिर करो इंतजार
नाना रंग आकृति वाले
नव पुष्पों का...
ये नवोदित पुष्प तुम्हें
नव जीवन देंगे...
अकेलापन भी हर लेंगे... !
न समझोगे
कभी अपने को मजबूर
न तुम कभी प्रकृति से होवोगे दूर,
न प्रकृति ही कभी होगी दूर... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
18 जुलाई 2017
पापा से बातचीत का एक अंश
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वेद और हम
हमारी प्राचीन परम्परा और मान्यता यही थी --
"निष्कारणं ब्राह्मणेण षड्गों वेदोधेयोगेयश्च"
अर्थात यह कि वेदाध्ययन से अर्थ की, यश की स्वर्ग की प्राप्ति होगी या नहीं होगी, यह सब विचार छोड़ कर ब्राह्मण को वेदपाठ, वेदाध्ययन, वेद भगवान का ध्यान करना चाहिए।
लेखन के साधन के अभाव मे वेद के पाठ की निरन्तरता एवं सुनकर स्मृति मे शिष्य परम्परा ने इसे जीवित रखा था, फिर लेखन कला और बनाई गई स्याही से तालपत्र एवं भुर्जपत्र पर वेद भगवान आदिम अवस्था में मानस से अवतरित हुए, फिर कालान्तर में छापे की मशीन और कागद के अविष्कार ने जन जन के लिए वेदभगवान को उपलब्ध कराया । आज उस सुविधा के कारण वेदों का मूर्तरूप तो आवश्यकतानुसार उपलब्ध है, पर अर्थप्रधान इस युग ने ब्राह्मणों को भी "अर्थकरी च विद्या" की ओर ज्यादा आकर्षित किया और धीरे-धीरे "निष्कारणं ब्राह्मणेण षड्गो वेदोधेयोगेयश्च" की मान्यता लुप्त होती गई, अब कुछ गुरुकुल देश के अन्दर भी इसके स्वरूप के संरक्षण में प्रयत्नशील हैं, संस्कृति और संस्कार के लिए संस्था या सरकारी पहल ही, आज के युग मे कार्य करने की दिशा में कारगर हो सकती है (सामुहिक तौर पर); व्यक्तिगत तो इच्छुक व्यक्ति के लिए स्वप्रयास ही काफी है ।
मंगलकामनासहितम्! शुभ संध्या सर्वेषाम्! जयतु भास्करः!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
आज प्रस्तुत है २००५ की लिखी हुई पापा की एक कविता...
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जी --का मतलब जी हां!
सकारात्मक ।
ना --का मतलब नकारात्मक
ध्यान रहे--
जी हां! कब और कैसा हो?
जी ना! कब और कैसा हो?
यही
ठीक-ठीक समझ लेना,
सच्चा जीना है
यदि ऐसा नहीं है,
तो जी - ना क्या है?
स्वार्थ के लिए,
स्वाभिमान, आत्मसम्मान को खोना---
और चाहे कुछ भी हो
वह नहीं है सच्चे अर्थों में जीना...
सब जायें (संगी साथी )
सब जाये (धन सम्पत्ति )
कुछ भी फर्क नही पड़ता ।
दुष्टता,
असत्य...
जितने भी बली हों,
जितना भी सर उठाएं --
सज्जनता,
सत्याचरण...
कभी बौने नही हो सकते ।
बादल,
थोड़ी देर
तेजस्वी सूर्य को ढक
भले इतरा ले...
झूठी शान बना
हंस ले
पर
सूर्य उस समय भी
प्रकाशित रहता हुआ,
प्रकाश ही फैला रहा होता है।
सूर्य की तरह
सत्य
सदा से है,
सदा रहेगा।
सूर्य और सत्य --
हमे हमेशा समझा रहे --
"अपने 'स्वभाव' को
'अभाव' में भी मत छोड़ो
सत्याचरण और सद् आचार से मुख मत मोड़ो"
सत्य और सदाचरण में --
जो तेज है,
उष्णता है,
उससे बादल की तरह --
असत्यभाषी,
दुष्टता भी
लज्जित हो, हट जायेगी...
फिर सच्चाई और इमानदारी ही
सब को ----
जी और ना ---"जीने" का मर्म सिखायेगी ।
--डॉ. सत्यनारायण पांडेय
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
 |
| [ छोटी बहन और दामाद जी !! अमित अनामिका ] |
जोड़ियाँ
उपरवाला तय करता है...
सुना है
उसने हम सबको जोड़ियों में बनाया है...
हर एक हृदय के लिए कही एक धड़कता हुआ दिल है...
हर एक पंछी का एक साथी पखेरू है...
दिए के लिए
सदा समर्पित उसकी बाती है
और यह संयोग
दुनिया की सबसे अनुपम घटना है
कि...
दिए और बाती का साथ होना
प्रकाश का निर्मित होना है... !
मोम के साथ धागा जलता है...
और धागे के साथ मोम पिघलती है...
ये संयोग
युगों से घटित होता आ रहा है...
जीवन अन्यान्य पड़ावों से गुज़रता हुआ
साथ-संवेदना के गीत ही तो गा रहा है...
ये संगीत अनुपम
आप दोनों के जीवन में सदैव ध्वनित हो...
इतनी खुशियां हों आँचल में
कि मन प्राण विस्मित हों...
युग युग तक यह जोड़ी
यूँ ही परिवार का मान रहे...
ये साथ है, तो सब कुछ है-
इस सत्य की बस पहचान रहे...
कितने उत्सव जीवन के
फिर यूँ ही मूर्त होते रहेंगे...
हर क्षण ही उत्सव होगा...
स्वतः आपके द्वारा
प्रकाश-परमार्थ के निमित्त
कर्म होते रहेंगे... !!
जीवन सदैव मुस्कुराता रहे
हर जन्मदिन यूँ ही यादों को समृद्ध बनाता रहे... !!
शुभ जन्मदिवस, अमित जी!!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
17 जुलाई 2017
पिछली सदी की एक नाव को देखते हुए...
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बीती सदी लहरों पर खूब झूमी होगी
कितने कितने सागर घूमी होगी
आज बस विश्रामरत है...
गति विराम सब चक्रवत है... !!
*** *** ***
दिसंबर की एक बर्फ़ीली शाम
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जाने कितना सफ़र शेष है,
अभी कितने मोड़ आने बाक़ी हैं...
वीरान भी है, सर्द भी,
रास्ते की ये तो छोटी सी झांकी है...
*** *** ***
एक झरना आसपास
--------------------------
झरने से झरते जल में,
बह गए कितने ही पल...
उस शाम ने महसूसा था,
कुछ दुखों के नहीं होते कोई हल...
फिर भी
ज़िन्दगी चहकती है...
यादों की कोई ज़मीन
हर क्षण कहीं दरकती है... !!
*** *** ***
जीवन, यात्रा और हम
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यात्रा में कितने पड़ाव आते हैं...
कभी कभी
बीत जाने के बहुत बाद
कोई एक याद...
कोई एक तस्वीर...
मुस्कान टांक जाती है...
कुछ यात्राएं अपने ख़त्म होने के बाद शुरू होती हैं... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
14 जुलाई 2017
वो छुट्टियों का मौसम था कोई... कोई ९३ या ९४ की बात है... हम चारों भाई बहन और पापा मिल कर कुछ समय साथ बीता रहे थे... खेल कूद का ही माहौल था और फिर उसी दौरान कुछ कवितायेँ जोड़ी थीं हमने... आज इन यादों को पापा ने भेजा तो लगा सहेज लेना चाहिए कि यादों के मौसम रोज़ नहीं आते... !!
उस दिन की कुछ कवितायेँ
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१.
मेरी अभिलाषा
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मेरी यह अभिलाषा
हो सबकी प्रेमपगी भाषा
सब होवें सतर्क
हो सब के साथ-सबका सहज सम्पर्क
तेजस्विता हो जैसे हों अर्क
न समझे आदमी आदमी मे फर्क
सब की पूरी हो आशा ।
मेरी यह अभिलाषा ।
हम समझें अपने राम-रहीम
करें निर्णय जैसे करते हकीम
समझें...
करना है मर्ज का इलाज
जिससे बन जाय स्वस्थ समाज
रह न पाए किसी कोने में निराशा ।
मेरी यह अभिलाषा ।
२.
आए अनचाहे मेहमान
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आए अनचाहे मेहमान ।
चाहते सदा पूरा सम्मान ।
हमें करना पड़ता अपनी इच्छाओं का बलिदान!
आए अनचाहे मेहमान ।
इन्हे नहीं होती, दूसरे की चिंता ।
चाहे चढ़ जायें ,अरमान चिता ।
उनको अपना कुछ काम नहीं।
जम जाते जहां जाते वहीं ।
इन्हें नही होती समय की पहचान ।
आए अनचाहे मेहमान ।
हे प्रभु! दो इन्हें भी ज्ञान ।
हो जाए मेरी समस्या का समाधान ।
अब न ये मेरा समय जाया करें ।
अनावश्यक न आया करें ।
समझें वे अपनी भी आन
आए अनचाहे मेहमान ।
३.
आज के लिडर
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क्या यही आज के लिडर हैं ?
चोरी में ये निडर हैं ।
पर सीमा पर तो वे गिदड़ हैं ।
देखो खाते ये जनता की हैं,
पर गाते ये गुण्डों को हैं ।
इन्हें शरम का लेश नहीं,
बदल लेते हैं वेश कहीं ।
इनकी बातों का एतबार नहीं,
अब चाहे रोएं सौ बार कहीं ।
जनता अब न ठगायेगी ।
इनको सबक सिखायेगी ।
४.
पञ्चवर्षीय योजना
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बन गई हमारी पञ्चवर्षीय योजना ।
अब इसमें (योजना के क्रियान्वयन में ) नहीं कुछ खोजना ।
यहां बनती सड़कें कागज पर,
नहरें भी बहती हैं कागज पर ।
यहां जनता की समृद्धि के प्रतीक,
होते केवल सत्ताधीश ।
जनता की करूण पुकार,
अनन्त काल से बेशुमार ।
कोई सुन न पाता है ।
हो कोई तो ठोकर खाता है ।
अगर हुआ हममे कोई समझदार,
जनता की ओर से की पुकार,
तो होता किसी साजिश का शिकार ।
पर होना नहीं निराश ।
करनी है खुद मे से ही आगे की तलाश ।
तभी जाकर होगी सार्थक योजना
जिसकी न कभी होगी आलोचना
होगा सर्वत्र सुख -शान्ति का साम्राज्य ।
सभी समझ जायेंगे -----
देशप्रेम के लिए "क्षुद्र स्वार्थ" है
सर्वथा त्याज्य, ! सर्वथा त्याज्य,! सर्वथा त्याज्य!!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
13 जुलाई 2017
 |
| Dr. S.N.Pandey |
शैतानों की इस नगरी में इंसान खोजते हो?
मरू भूमि में बागों का उन्वान खोजते हो?
जहाँ केवल पेट की ही चिंता सर्वोपर्री हो,
वहाँ चिंतन महान खोजते हो ??
हे सत्य!
भूलो मत,
भीड़ में खोना आसान है...
पर नैतिकता समाप्त हो जाएगी
यदि तुम हार मानते हो
कि तुम्हारी महिमा का समय को भान है...
सामाजिक संरचना का
अब जाने हाल क्या होगा !
मुस्सलम ईमान नहीं,
फ़िर कोई मुसलमान क्या होगा !
जाने पीर पराई नहीं
वह विष्णु की संतान क्या होगा !
जिसके लिए
धर्म, नैतिकता, सदाचार
इतिहास की बातें हों
वह उसे अपने चरित्र में अपनाने को
तैयार क्यूँ होगा ?!!
मनुष्यों में
विशेष कर बुद्धिजीवियों में
न खोजो अब " ज़मीर "
क्यूंकि
अब सबकी एक सोच है
जैसे भी हों बस बन जाएँ "अमीर"
ऐसे में निराशा जो सताने लगे
समय का अन्धकार भरमाने लगे
तो ध्यान धरना
इधर उधर दृष्टि करना
कुछ कही कोई
किरण सा उग आएगा
विश्वास की पतवार संबल पाएगी
कि वो बीता युग लौट आएगा
अब कल ही की तो बात है
ख़बरों में खिलने वाला कोई प्रात है
पढ़ा होगा न वह समाचार
चुहिया अपने बच्चे के अस्तित्व रक्षा के लिए
कर बैठी विकराल नाग पर प्रहार !!
हृदय से उसके लिए सम्मान
कि मरी तो वह भी
पर उस विषैले नाग ने पहले दम तोड़ा
इसके बाद ही उस चुहिया तन छोड़ा
---------------
मुट्ठी भर हौसला
पूरी अन्याय व्यवस्था पर भारी है...
ज़िन्दगी बेबस है, माना !
दबना, दुःख सहना, लाचारी है...
पर
जो मन एक बार ठान लेगा
हमारा हर कदम फिर
सत्य का ही संधान होगा !!
[[२५.८.२००४ ]]
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
12 जुलाई 2017
चलना ही जीवन है...
बहुत सुना है
इसे माना भी
सच भी है
कि रुके हुए तो जल भी सड़ जाता है... !
पर
कुछ ऐसे दौर होते हैं...
थका-थका सा
कुछ ऐसा टूटा हुआ सा मन होता है...
कि रुक जाने के सिवा
कोई विकल्प नहीं होता
और यही शायद सबसे उपयुक्त उपक्रम भी...
कि
गति के नाम पर
गलत राह पर बढे जाना
कौन सा गति का सम्मान है ?!
कई बार
हम जाने-अनजाने
ऐसे हो जाते हैं अपने कृत्यों-व्यवहारों में
जो कि स्वयं जीवन का अपमान है !!
तो
तनिक रुक जाते हैं...
बहुत भाग लिया
अब स्थावर हो कर देखें...
क्या अब भी वो पीछे आता है
दुःख हमें ढूंढ-ढूंढ कर रुलाता है... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
11 जुलाई 2017
आज भी प्रस्तुत है पापा की ही एक कविता !
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हे अमृत संतान!
याद करो अपनी पहचान
अंधकार के बीहड़ तिमिर मे
जग जब भटक रहा था
बर्बर पशु सा नग्नकाय
वन वन में अटक रहा था
तब ऋषि-मुनियों ने ज्ञान-दीप जलाये थे
संस्कृतियों के नव ईंट पके
प्रासाद बनाए थे
हम थे निर्मल
वेदों के पावन मन्त्रों से
गुंजित था यह आकाश विमल !
कहां गई वह चेतना?
कहां गया वह ज्ञान?
दुश्मन बन रहा क्यूं?
एक दूसरे का इंसान !
था कितना चिन्तन उच्च
भारत की मान्यता थी सर्वोच्च
हैं एक ही देव भाषित सभी प्राणियों में...
न केवल मनुष्य में
अपितु सभी जीवों में--
अण्डज, पीण्डज, स्वेदज
उद्भिज सूक्ष्म शरीरों में... !!
जियो और जीने दो का सिद्धांत --
था सर्वमान्य, थे सभी विश्वस्त निभ्रान्त
पर आज
लगी है सभ्यता की दौड़
स्वार्थपरता की होड़
कथनी और करनी हुए बेमेल
हुआ भौतिक विकास
होता गया मानवता का ह्रास
धूमिल होता गया ज्ञानप्रकाश
अब हाहाकार मचा है
सारी संत्रस्त प्रजा है
हे देव! दया कर वर दें
मानव मानव के मन मे भर दें
एकता का भरपूर भाव
मानवता के शरीर पर
अब न लगे कोई घाव
सभी पवित्र-भाव से पूरित
मंगलकारी ही होवें--
विज्ञान के भी कृतित्व
अब न कोई विध्वंसकता रचे
सभी "विश्वबंधुत्व" की भावना मे ही
रचें बसें, न कोई मिटे, न हम मिटें !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
10 जुलाई 2017
 |
| सत्यनारायण पाण्डेय |
आज श्रावण मास के प्रथम दिवस/प्रथम सोमवार को प्रस्तुत है पापा की एक कविता... !!
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ईश्वर की
कृति निराली...
नासमझी ने,
मेरी चाल बना दी मतवाली
जी हाँ, 'मत'-वाली (मत-सम्प्रदाय वाली)... !
समझें हम खुद को,
सृष्टिसंरचना को...
तभी होगी,
धरा पर सर्वत्र खुशहाली... !!
किसी ने पूछा,
"तुम किस्मत वाले हो?"
(किस 'मत' वाले हो?)
मैंने कहा-
मैं हूं सत्य-सनातन मतावलम्बी,
किस 'मत' की (किस्मत की) बात कहूं?
सभी मत तो
अलग अलग
एक दूसरे के लिए
प्रश्नवाचक- किस्मत (किस 'मत')
ही तो हैं !
मैं भी हूं
किस्मत वाला (किसी 'मत' वाला)...
अपनी धुन,
अपने आप में 'मत' वाला (मतवाला)...
***
जो शब्द को
अर्थ के धरातल पर गुनें
उनकी सनातन ध्वनियों सहित
शब्दों को गहराई से सुनें
तो थाह लेंगे
कि...
सकल मत-मतान्तर
हैं ऊपर ऊपर...
समझ गये,
तो न पायेंगे अन्तर... !
अन्तःकरण में धरें ध्यान,
पायेंगे जीव मात्र को समान,
फिर ईश्वर और जीव दोनो एक से दिखेंगे --
-- "शिव"-- !
"शिव"
अर्थात कल्याण,
अर्थात् केवल कल्याणकारी भाव का साम्राज्य
वो धरातल
जहाँ आत्मा परमात्मा
सर्वथा अविभाज्य... !!
*** *** ***
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
8 जुलाई 2017
धुंधली होती हैं
यादें...
धुंधली ही तो है
आँखें...
धुंधला ही
हर धाम यहाँ...
जीने की राह में
जीवन ही गुमनान यहाँ...
तो
ऐसे ही धुँध में
बढ़ते चलें...
कौन जाने
धुंधलके से ही
कोई अप्रतिम आयाम मिले... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
7 जुलाई 2017
कोई एक हो
जो मेरी ख़ामोशी सुन ले...
अब मन
हर एक शब्द अक्षर
सब खोना चाहता है...
थक गया है
चल चल कर...
मिले कोई स्नेहपूर्ण गोद
अब मन कुछ देर
सोना चाहता है...
सब धुल जाये
धूल-धक्कड़...
मेरा मन
तुम्हारे हृदय से लग कर
रोना चाहता है...
रेत ही रेत है
मेरी आँखों के सामने...
जाने फिर भी
कैसे तो हौसला कर
उम्मीदें बोना चाहता है...
सुनो!
तुम्हारा होना संबल है...
संभावनाओं के चित्र तराशते हुए तुम
कितना कुछ रच गए
कोरे कैनवास पर
मन मेरा अदृश्य कितने ही विम्बों को थाहता है...
सदियों से साथ है...
सदियों तक तुम्हारे साथ रहना चाहता है... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
6 जुलाई 2017
 |
| Dr. S.N. Pandey |
बातचीत का एक अंश
सोचा यहाँ भी बाँट लें...
-----------------------------------
कहते हैं इंसान न कुछ लेकर आया है, न कुछ लेकर जायेगा... फिर एक ये भी बात आती है कि हमारे अच्छे बुरे कर्म तो जायेंगे न साथ, कुछ पूर्वजन्म के संस्कारों को लेकर ही तो आये थे हम इस जहां में... क्या सही है... कौन सी बात ज्यादा उपयुक्त... ऐसे ही कुछ संशय पर ज़रा सी बात ::-
*** *** ***
"कुछ न लेकर आना", कुछ न लेकर जाना " यह कथन भौतिक पदार्थ से जुड़ा है! यह कथन भी परम सत्य को उद्घाटित करता है कि प्राणी पूर्वजन्म के कर्मफल के साथ पुनः इस धराधाम पर आता है, जिसे कर्मयोग सिद्धांत के आधार पर, वह प्राणी भुगत नही पाया था, पुनः इस धराधाम पर करता भुगतता, जो कर्मफल अवशिष्ट रह जाता है, असके साथ ही जाता है !
हां, यह अटल सिद्धांत है, अतः प्राणी मात्र को चाहिए कि ऐसा कर्म करे कि वह बंधन का कारण न बने, यहां के कर्म और कर्म फल "ज्ञानाग्नि दग्ध कर्माणि, तमाहुः पण्डितं बुधाः" अर्थात "जो ज्ञान रूपी अग्नि मे कर्म रूपी बीज को जला डालते हैं, ज्ञानी लोग उसे ही पण्डित कहते हैं" और तब इस परिस्थिति में "कुछ लेकर न आना एवं कुछ न लेकर जाना" भी योगियों के लिए कबीरदास के शब्दों में :---"जस के तस रखदीन्ह चदरिया" कथन को सिद्ध करता है कि सिद्ध पुरूष निष्कलंक संसार मे आते हैं, तथा संगता दोष से रहित कर्म करते हुए भी कर्मफल भोग से मुक्त हुए होने के कारण निष्कलंक वापस परमात्मतत्व मे विलीन हो जाते हैं।
मंगलकामनासहितम्!
शुभ संध्या! जय भास्करः!
--सत्यनारायण पाण्डेय
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
5 जुलाई 2017
पहले कदम पर
आप नहीं थाह सकते
उस कदम के मायने...
चलना लड़खड़ाते हुए ही शुरू होता है!
कभी कभी
वही लड़खड़ाता हुआ क्षण
एक दिन ऐतिहासिक हो जाता है...
महत्त्व की उन ऊचाईयों पर आसीन...
कि...
जिसकी कभी
कल्पना न की गयी होगी... !!
अब ५ जुलाई की तारीख कुछ ऐसी ही तो है.
कविता कोश की नींव रखते हुए
कहाँ आपने
उन दिनों सोचा होगा...
कि
एक दिन
एक सहज सरल सा यह कदम
कितनों के लिए
प्रेरणा, संबल और विश्वास होगा !!
आज कहती है चेतना-
देखना...
आने वाले युग में कविता कोश का
स्वयंसेवा के क्षेत्र में
अपने ढंग का
अनूठा एक इतिहास होगा !!!
एक बढ़ाता है कदम
लोग साथ होते जाते हैं...
पावन किसी ध्येय की खातिर
कितने ही नींव के पत्थर
मिट जाते हैं...
कि...
ईमारत बुलंद रहे
जीवन
तमाम विडम्बनाओं के बावजूद
मकरंद रहे...
शुभ अंक है ग्यारह...
शुभता का पावन संकल्प आज और दृढ़ हो
यह पावन भावना हमारी साझा क्षमताओं की रीढ़ हो !!
*** *** ***
स्थापना दिवस पर सभी स्वयंसेवकों को, कविताकोश को, कविता कोश के संस्थापक को ढ़ेरों बधाई एवं शुभकामनाएं... !!
*** *** ***
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
पापा से बातचीत :: एक अंश!
स्वंयसेवा/ सामाजिक कार्य के संदर्भ में :: एक दृष्टिकोण
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समाज को अगर कोई सचमुच सशक्त और कल्याणकारी बनाना चाहता हो तो, उसे देवाधिदेव महादेव की तरह (जैसे उन्होंने अनन्त कोटि ब्रह्मांड की रक्षा के लिए विषपान कर लिया था) समाज कल्याण के लिए, कटु वचनरूप विष को पीते हुए पारिवारिक विषम स्थिति (विशेष कर विरोधी स्वभाव वाले पारिवारिक सवारी को ही लें :: शिव की सवारी वृषभ, शिवानी की शेर, पुत्र गणेश की सवारी मूषक, कार्तिकेय का मयूर) को सम करते हुए (जैसे गज मुख पर षडानन् छःमुख वाले कार्तिकेय परिवार को नियंत्रित करने मे सफल हैं), वैसा अभ्यास हम सब को गम्भीरता से अपनाना होगा।
*** *** ***
सामाजिक संगठन, उनके परिचालन और उद्देश्य से सम्बंधित कुछ रैंडम थॉट्स
-------------------------------------------------------------------------------
अहम्मन्यता के ही कारण एक ही शहर या कस्बे में एक एक दो दो संगठन चल रहे हैं, या एक जनसमूह ही अहंता के कारण बंट जा रहे हैं। जब समाज के संगठन का उद्देश्य समाज के सर्वांगीण विकास का ही है, तो उद्देश्य की टकराहट तो कारण नही ही है, फिर अहं को छोड़कर "सबहिं मान-प्रद आप अमानी" के फार्मूले को जननायक क्यों नहीं अपनाते।
हां हम छोटे बड़े स्थान और परिवेश के आधार पर संगठन जरूर बनायें... यह आवश्यक भी है, पर जहां ऐक्यमत और बलऐक्य प्रदर्शित करने की जरूरत हो, हमारी आपसी सहमति ऐसी होनी चाहिए कि दुर्गासप्तशति में आए शुम्भ-निशुम्भ के साथ युद्ध में राक्षस के द्वारा यह कहे जाने पर कि "अन्यासां बलमाश्रित्य युद्ध्यसे अति मानीनि", का उत्तर जगज्जननी ने दिया था, हम सब भी अपने विरूद्ध बोलने वाले को गर्व से कह सकें
"एकैवाऽहं जगदत्र, द्वितीया का ममापरा। पश्य दुष्ट! विशन्ति मामेव मम् वभूतयः।।
अर्थात् राक्षस ने कहा कि दूसरे दूसरे का सहारा लेकर लड़ रही हो (इन्द्राणी, रूद्राणी, सर्वदेवशक्तिसम्पन्ना दुर्गा, शिवानी अन्या शक्ति।) और अधिक बलशालिनी बन रही हो, इसी के उत्तर में पराम्बा जगज्जननी दुर्गा ने कहा रे दुष्ट! मेरे सिवा इस संसार में और कौन है? ये तो मेरी ही विभूतियां हैं, जो मुझ में प्रवेश कर रहीं हैं।
किसी भी संगठन के विश्वस्तरीय स्वरूप के लिए कल्याणकारी इस से बढ़कर सोच और क्या हो सकती है? हम सब पूर्वाग्रह से मुक्त हो सोचें तो सही।
जयतु भास्करः! सुप्रभातम् सर्वेषाम्! मंगलकामनासहितः प्रेषितः।
सधन्यवाद प्रेषित!
--डॉ सत्यनारायण पांडेय
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
4 जुलाई 2017
हलकी सी,
स्नेहिल धूप की,
आहट है...
ये जो थामे हुए है धरा को,
तरुवरों का जीवट है... !!
कैसी कैसी विपदाएं झेल जाते हैं पेड़
पतझड़, पावस, बसंत, शीत
सब में उनका एक ही गीत--
-- "जीवन"!!
उजड़े उजड़े से माहौल में,
जरा सी तरलता है,
थोड़ी सी गरमाहट है...
ये जो थामे हुए है जीवन को,
आशाओं का ही जमघट है... !!
कैसी कैसी आपदाओं से घिरता है इंसान
उबार लेते हैं, कितने ही संधान, पाने को, जीवन अमृत
लड़ने का हौसला लिए साथ होता है एक ही मीत--
--"मन"!!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
 |
| सत्यनारायण पाण्डेय |
पापा से बातचीत :: एक अंश
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श्रीमद्भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय के छठे श्लोक मे भगवान श्री कृष्ण ने कहा है :--
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुरएव च।
हे अर्जुन! इस लोक में भूतोंकी सृष्टि यानी मनुष्य समुदाय के दो ही प्रकार हैं:-- पहला दैवीय प्रवृत्ति वाला, दूसरा आसुरी प्रवृत्ति वाला। इसके पूर्व ही क्रमशः दैवी सम्पदा एवं आसुरी संपदा से युक्त व्यक्तियों की पहचान सर्वसाधारण के लिए सुलभ हो,भगवान श्रीकृष्ण ने दोनो के लक्षण भी स्पष्ट किए है।
देखें दैवी सम्पदा वाले व्यक्ति के लक्षण(श्लोक /3/) :--
तेजः क्षमा धृतिःशौचमद्रोहोनातिमानिता ।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ।।
अर्थात् :---तेज (श्रेष्ठ पुरूषों का वह प्रभाव, जिससे दुष्ट भी सद् बुध्दि वाले हो जांये) क्षमा, धैर्य, बाह्यशुद्धि एवं किसी मे भी शत्रु भाव का न होना और अपने में पूज्यता के अभिमान से रहित होना :--दैवी सम्पदा लेकर उत्पन्न हुए मनुष्य के लक्षण हैं।
पुनः आसुरी सम्पदा वाले मनुष्य के लक्षण बताते हुए कहा कि :--
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारूष्यमेवच ।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदासुरीम् ।।
अर्थात् :---हे पार्थ! दम्भ, घमंड और अभिमान तथा क्रोध कठोरता और अज्ञान भी ---आसुरी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरूष के लक्षण हैं ।
अब विचारणीय यह है कि भगवान श्रीकृष्ण के मुखारविन्द से निकली यह अकाट्य और शतप्रतिशत सत्य वाणी का ध्यान यदि हम कर अपना ही मूल्यांकन ईमानदारी से कर लें तो सह अस्तित्व के भाव को समझने मे हमें सहयोग मिलेगा, और आसुरी सम्पदा वालों को दया का पात्र समझते हुए, उनसे दूरी बनाकर अपना बचाव भी कर पायेंगे, साथ ही ये आसुरी सम्पदा से युक्त ये मनुष्य तो आदत से लाचार ऐसा ही जीवन जीने को इस जन्म मे विवश हैं, यह जानते हुए उन पर दया करते हुए दैवी सम्पदा से जोड़ने का प्रयास कर पायेंगे ।
यों ईश्वर की संरचना, सृष्टि को संतुलित करने के लिए होती है, यही कारण है कि हलाहल विष के साथ अमृत को प्रकट संतुलन स्थापित किया गया, भले हलाहल को विश्वकल्याण की भावना से देवाधिदेव महादेव ने विष का अकेले पान कर लिया।
हमें भी यथा समय परिवार, समाज, राज्य, देश ,विश्व के कल्याण की भावना से विषपान कर सबों के कल्याण के लिए कार्य करने का संकल्प लेना चाहिए ।
*** *** ***
भगवान श्री कृष्ण ने दैवी और आसुरी सम्पदा का वर्णन करते हुए कहा है कि दैव और आसुरी प्रवृत्ति का जन्म सृष्टि के आरम्भ से ही है ।
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ।।
दैवी भावना मुक्ति देने वाली होती है और आसुरी भाव बन्धन का कारण होता है
दैवी सम्पद्विमोक्शाय (मोक्षाय) निबन्धाया-सुरी मता ।।
इसी लिए (मा शुचः --आदि श्लोक की अर्धावली) में भगवान अर्जुन को स्पष्ट करते हैं कि --"हे अर्जुन! तू शोक न कर, क्योंकि तुम दैवी सम्पदा लेकर उत्पन्न हुए हो। दैवी सम्पदा की चर्चा हो चुकी है, आसुरीसम्पदा की संक्षिप्त जानकारी जन सामान्य के लिए भी जरूरी है, ताकि उस प्रवृत्ति से बचते हुए, मोक्ष का अधिकारी बन सकें, बन्धन के लिए विवश न हो।
भगवान कृष्ण ने स्पष्ट कहा है "निबन्धायासुरीमता" आसुरी वृत्ति बंधन का कारण होती है। अतः किस प्रकार के स्वभाव और कृत्य से बचाने की कोशिश की जानी चाहिए इसे जानें :---
"काममाश्रित्य दुष्पुरं दम्भमानमदान्विताः।मोहद्गृहीत्वाअसद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ।।अ 16 /श्लोक 10 ।।
अर्थात् (आसुरी प्रवृत्ति वाला व्यक्ति )दम्भ, मान और मद से युक्त शक्ति से अधिक बड़ी बड़ी कामना पालकर, झूठे सिद्धांतों के सहारे, भ्रष्ट आचरण करता हुआ संसार मे विचरण करते समय व्यतीत करता है।
हमे ऐसे मनोभाव से बचना चाहिए। और भी "आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः।।
ऐसे तो कई श्लोक मे आसुरी वृत्ति की चर्चा है विस्तार के लिए मूल ग्रन्थ का अनुसरण करें, पर मुख्य भाव के लिए इन्हे देखें ---
अहंकार बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।
ममात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः।।अ16/श्लोक 18 ।।
इन (अध्याय 16 के श्लोक 10,15,18) को ही ध्यान मे रखें तो कल्याण हो जाय, तो क्रमशः अर्थ देखें :-श्लोक 15 ---"मै बड़ा धनी और बड़े कुटुंबवाला हूं । मेरे समान दूसरा कौन है? (अर्थात् कोई नहीं) मैं ही यज्ञ कर सकता हूं, दान भी केवल मैं कर सकता हूं, मेरे सिवा आमोद-प्रमोद कोई करने मे समर्थ नही हो सकता । इस तरह के अज्ञान से आसुरी प्रवृत्ति का मनुष्य मोहग्रस्त रहता है (कल्याण चाहने वाले को इससे बचना चाहिए )
श्लोक 18 :--अर्थात् "वह व्यक्ति अहंकारी, बल के घमंड वाला काम (तरह तरह की कामना वाला ) और बराबर क्रोध से भरा हुआ दूसरों की अकारण निन्दा करने वाला होता है, उसे यह भी पता नही चलता कि "इस प्रकार के व्यवहार से वह अपने और जिसके अहित में लगा है सर्वत्र स्थित मुझ अन्तर्यामी मे एक ही द्वेष का भागी बन (नर्क का भी द्वार अपने लिए ही खोल रहा है) अपना ही अहित कर रहा है! इतने को जानकर भी हम सतर्क हो जांये, तो कल्याण हो जाय।
सधन्यवाद प्रेषित! मंगलकामनासहितम्! सुप्रभातम् सर्वेषाम्! जय भास्करः!
--सत्यनरायण पांडेय
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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खिड़की
बारिशों को एकटक देखती है...
बादल उसकी आंखों में
कई रंग भरते हैं...
बूंदें
जो उसके हृदय से आकर
लग जाती हैं...
देर तक चमचमाती हैं... !
इस तरह
खिड़की, बादल, बारिश, बूंदें
देखते हुए हम
अपनी दुनिया की विषमताओं से
कुछ देर के लिए
अवकाश पा लेते हैं...
यूं
अपने हिस्से का
आकाश पा लेते हैं... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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3 जुलाई 2017
पास होने का आभास मात्र है...
पहाड़ से तब भी उतनी ही दूरी है...
इतनी दिव्य
ऐसी विशाल है उनकी उपस्थिति...
वहां
अपनी क्षुद्रता महसूसने की
सम्भावना पूरी है !!
दूर से चमकते
बर्फ़ के कणों की आभा को
आत्मसात करना हो
वहां उगे
फूलों के एक पूरे जंगल के बीच
चरण धरना हो
सब सहज ही
स्वतः हो जाता है...
वातावरण की महिमा है
उस ऊंचाई पर
आपका दुःख स्वमेव मुस्कुराता है... !!
प्रकृति अपनी विशालता में स्निग्ध किरणें लिए चलती है...
उसके हृदय में हमारे लिए हर क्षण अपार करुणा पलती है... ... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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बूँद
ज्यूँ गिरी आँख से
कागज़ पर
कागज़ ने शोख लिया उसे.
वही बूँद
शब्दों में ढल गयी
किसी खोयी हुई कविता से
जा मिल गयी
उस बूँद ने शब्दों में ढलने से पूर्व
किसी कविता से जा मिलने से पूर्व
खिड़की के काँच पर पड़ी बूंदों को
एकटक देखा था.
शायद उन बारिश की बूंदों की नमी को आत्मसात किया हो
तभी तो कविता में
आकाश सी संवेदनाएं खिल पायीं.
आसमान ज्यूँ भेद नहीं करता
अपनी धरा पर सहर्ष बरस जाता है
वैसे ही तो कविता
सबकी हो जाती है
सबपर नेह बन बरस जाती है...
ये और बात है
हम हर बार नहीं भींगते
कि हम कई बार छाता ताने रहते हैं...
बरस रही बूंदों से, जान बूझ कर, अनजाने रहते हैं... !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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| डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय |
पापा से बातचीत :: एक अंश
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सुप्रभातम् सर्वेषाम्! मंगलकामनासहितम्!
मनुष्य को चाहिए किसी भी विकट परिस्थिति में जब वह अकेले हो उपस्थित परिस्थिति का एक संबद्ध किरदार न बन द्रष्टा बन जाय, विश्लेषक बन जाय, यह घटना दूसरे के साथ हुई है और वह सलाहकार की भूमिका में निरपेक्ष रूप से अपने को महसूस कर ले तो, स्वतः बिना किसी के सहयोग के वह स्वस्थ चित्त हो जायेगा, अन्यथा चित्त की अशांति उसे कहीं का नहीं रहने देगी ।
श्रीमद्भगवद्गीता के तृतीय अध्याय के पैंसठवें, छयासठवें श्लोक पर गौर करें तो पायेंगे कि इसतरह की परिस्थिति में स्वस्थ चित्त (मन का) होना कितना जरूरी है :-
प्रसादे सर्वदु:खानां हानिरस्योपजायते ।प्रसन्नचेयसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते।।
अर्थात् अन्तःकरण की प्रसन्नता होने पर सम्पूर्ण दुखों का अभाव हो जाता है और प्रसन्न चित्त होने के कारण (सम्यक बुद्धि के कारण) सभी चिन्ताओं से मुक्त हो परमात्म बुद्धि वाला हो जाता है या यों कहें परमात्मतत्व में ही उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है !
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना । न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ।।
अर्थात् जिसकी बुद्धि अनिश्चयात्मक होती है, उसके अन्दर बुद्धि धूमिल पड़ जाती है, अन्तःकरण में भावना का भी अभाव हो जाता है, फिर भाव हीन मनुष्य को शांति भी नही मिलती , फिर शान्तिरहित मनुष्य सुख का अनुभव भी कैसे कर सकता है? इस स्थिति को पाने के लिए थोड़ी सजगता, थोड़ा स्वस्थचिन्तन (चिन्ता नहीं) चाहिए क्योंकि शर्त ही यही है "प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धि पर्यवतिष्ठते ।"
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सद्भिरेव सहासीत सद्भिः कुर्वीत संगतिम् । सद्भिः विवादं मैत्रीं च नासद्भिः किंचिदाचरेत् ।।
अर्थात् सज्जन के साथ भोजन, शयन, सज्जनों की संगति ही श्रेयस्कर है, यहां तक कि विवाद भी सज्जन के साथ हो जाता है, तो अपका अहित नहीं होगा मित्रता तो मित्रता है, असज्जन के साथ (काटे चाटे श्वान के दुई भांति विपरीत ) किसी तरह का व्यवहार उचित नहीं।
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"जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु में"
हे स्वामी! जगत् के नाथ! मेरे नयनपथ में आयें, अर्थात् हमें अपना दर्शन देने की कृपा करें।
आज का चिन्तन :--
सज्जनों के प्रति "लंका में प्रवेश के उपरांत श्री हनुमानजी नें विभीषण को राम नामोच्चारण करते सुना और सुनिश्चय किया :--
"इनसन हठकरि करिहौं पहिचानी।साधु ते होहिं कारज हानि।।" इन से मै हठपूर्वक अपनी जान पहचान करूंगा, क्योंकि सज्जन पुरुषों से नुकसान का भय नहीं होता! ठीक इसके विपरीत दुर्जन की संगति से दूर रहने की सलाह बराबर दी जाती रही है, क्यों? इस श्लोक को देखें :--दुर्जनेन समं सख्यं प्रीतिं चापि न कारयेत्। उष्णोदहतिचांगारह शीतः कृष्णायते करम्।।
अर्थात् दुर्जन क्रोध मे है, तो उष्ण अंगारे की तरह जलन पैदा करेगा, और यदि ठंढा (शीतल ) दुर्जन शीतल =शांत भी है तो ठंडे काले कोयले की तरह छूने पर हाथ को काला ही करेगा । दूसरा और भी ध्तक्षककस्य ::
विषं दंते मक्शिकायाः विषं शिरे वृश्चिकस्य विषं पुच्छे सर्वांगे दुर्नृणां विषम् ।।
अर्थात् सर्प के मुख में विष रहता है, मक्खी के शिर में विष रहता है और बिच्छू के पुच्छ में विष होता है, पर दुर्जन के तो सारे शरीर में विष भरा होता है, इसलिए दुष्टव्यक्ति से सदा दूर रहना चाहिए ।
सधन्यवाद प्रेषित! मंगलकामनासहितम्! जयतु भास्करः!
--सत्यनारयण पांडेय
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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2 जुलाई 2017
बहुत पुरानी कभी की लिखी एक कविता है मेरी... जो मुझे कई बार बहुत ही सही लगती है... कि बार बार वह मेरे दुखी हृदय के समक्ष खड़ी हो आती है... सांत्वना देती हुई कि मत हो दुखी... ये दुनिया ऐसी ही है...
हे ईश्वर!
तेरी दुनिया बहुत बुरी है...
चौपायों में तो सिर्फ पशुता है,
दोपाये आसुरी हैं...
हे ईश्वर!
तेरी दुनिया बहुत बुरी है...
बेचैन हृदय...
श्रीहीन सी अन्तःपुरी है...
हे ईश्वर!
तेरी दुनिया बहुत बुरी है...
मृत्यु की सी कातरता
इंसानियत के सामने मुँह बाये खड़ी है...
हे ईश्वर!
तेरी दुनिया बहुत बुरी है...
लुटता हुआ इंसान और लूटने वाला भी इंसान-
ये कैसी विडम्बना सम्मुख आन पड़ी है...
हे ईश्वर!
तेरी दुनिया बहुत बुरी है...
मानवता की शवयात्रा में
मूक दर्शक बन क्यूँ ये भीड़ खड़ी है...
हे ईश्वर!
तेरी दुनिया बहुत बुरी है...
*
हे ईश्वर!
इतना विवेकशील बनाया इंसानों को,
फिर क्यूँ न हमारा हमराह
स्वयं हरि है?
घटनाक्रम क्यूँ लिखवा रहा है चेतना से
कि...
तेरी दुनिया बहुत बुरी है?
आदि मध्य न अंत...
ये कैसी धुरी है !!
*** *** *** *** ***
इसे कई बार फेसबुक पर भी शेयर किया है... प्रतिक्रियाएं अलग अलग तरह की आती ही हैं... आती रहीं... दुनिया का यह रूप आसानी से स्वीकार्य तो नहीं... करना भी नहीं चाहिए... और शायद यह कविता लिखी भी नहीं जानी चाहिए थी... पर क्या करें अब लिख गयी तो...
खैर, इस बार एक सुखद बात घटित हुई... इश्वरीय कृपा ही कहेंगे की सोमदत्त द्विवेदी सर ने मेरी इस कविता का परिष्कार कर दिया...
इस परिष्कृत रूप को देख कर मन आत्मा सब चमत्कृत हो गयी... आज यह चमत्कार यहाँ भी सहेज लें!!
हे ईश्वर!
तेरी दुनिया भरी-पूरी है...
चौपायों में भी रची प्रियता है,
दोपाये आभारी हैं...
हे ईश्वर!
तेरी दुनिया भरी पूरी है...
चैन हृदय...
श्रीसिक्त सी अन्तःपुरी है...
हे ईश्वर!
तेरी दुनिया भरी पूरी है...
मृत्यु की सी शाश्वता
क्षण भंगुर जीवन के सामने मुँह बाये खड़ी है...
हे ईश्वर!
तेरी दुनिया भरी पूरी है...
बसता हुआ इंसान और बसाने वाला भी इंसान-
ये कैसी भाव रसता सम्मुख आन पड़ी है...
हे ईश्वर!
तेरी दुनिया भरी पूरी है...
मानवता की जीवनयात्रा में
हर्षोल्लासित जन यूँ ये भीड़ बड़ी है...
हे ईश्वर!
तेरी दुनिया भरी पूरी है...
*
हे ईश्वर!
इतना विवेकशील बनाया इंसानों को,
फिर भी हर क्षण हमारा हमराह
स्वयं हरि है !!
घटनाक्रम क्यूँ लिखवा रहा है चेतना से
कि...
तेरी दुनिया भरी पूरी है !!
आदि मध्य न अंत...
तू इसकी धुरी है !!
--सोमदत्त द्विवेदी
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
एक तरीका होता...
होती एक लकीर...
जिस पर चल सकने से
जीवन सामान्य चल पाता...
काश!!
एक को मनाओ
दूसरा रूठ जाता है...
एक सिरा पकड़ो
दूसरा छूट जाता है...
एक राह की छाँव
दूसरे के लिए धूप हो जाती है
इस क्षण की सुन्दरता
अगले ही पल कुरूप हो जाती है
ये किस राह में हैं हम...
क्यूँ यूँ हैं आँखें नम...
विस्मय की दीवार लांघते हैं...
फिर कुछ टूटी बिखरी तस्वीरें टांगते हैं
इस तरह चल रहा है...
मन उदास है...
जाने क्या बदल रहा है... !!
सुना है, कविता के पास
उनके लिए भी अमृत है
जिनका जीवन गरल रहा है... !!