कई बार ऐसा होता है
हम आते हैं किसी दरवाज़े तक
और बिना दस्तक दिए
लौट जाते हैं
इस आस में
कि हमारी आहट को ही
दस्तक सा पहचान
खुल जाये दरवाज़ा...!
शायद ऐसे ही कई बार
आती है कविता
ज़रूर ऐसे ही कई बार
आई होगी कविता...
और लौट गयी होगी
कि उसकी आहट से
अनजान रहे हम
दूर रही हमसे
हमारी ही कलम...!