अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

निज भाषा के प्रति

निज भाषा में हो व्यक्त व्यथा,
निज भाषा उत्थान हित हो स्व जीवन कथा!
ऐसा पावन भाव जगे..
हम ही तो हैं भाव भाषा के सगे..!
हिंद का गौरव हिंद का पर्याय,
हिंदी से पगा हमारी अभिव्यक्ति का हर अध्याय!
कौन नहीं जो भरे इस बात पर हामी..
हृदय तो है निश्छल भावों का अनुगामी....!
भाषा की परिधि में और उससे परे भी,
कष्ट-कंटकों में विवेकपूर्ण चरण धरे ही..
बढ़ें चुनौतियों को कर स्वीकार ,
हिंदी सर्व समर्थ है,तभी तो सह जाती है उपेक्षा की मार!
जीवट के साथ मुस्कुराने का नाम है
हिंदी हमारे राष्ट्र की शान है !
हिंदी दिवस की पूर्वसंध्या पर आओ हृदय जोड़ें
चलो आज परदे का भ्रम तोड़ें ...!
सारी खिड़कियाँ ...सभी दरवाज़े खोलें
राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मंच पर खड़े हो गर्वपूर्वक हिंदी बोलें!!

8 टिप्पणियाँ:

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 13 सितंबर 2010 को 5:29 pm  

सुंदर प्रस्तुति अनुपमा जी

anupama 13 सितंबर 2010 को 5:50 pm  

धन्यवाद...

संगीता स्वरुप ( गीत ) 13 सितंबर 2010 को 6:52 pm  

हिंदी दिवस की पूर्वसंध्या पर आओ हृदय जोड़ें
चलो आज परदे का भ्रम तोड़ें ...!
सारी खिड़कियाँ ...सभी दरवाज़े खोलें
राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मंच पर खड़े हो गर्वपूर्वक हिंदी बोलें!

बहुत सुन्दर भाव ...

मनोज कुमार 13 सितंबर 2010 को 7:42 pm  

हिंदी के ज़रिए हमारा प्रयास भारत के सभी प्रांतों, अंचलों और जनपदों को सौहार्द्र, सौमनस्य व परस्पर स्नेह से एक सूत्र में बांधने का होना चाहिए।

राजभाषा हिंदी 14 सितंबर 2010 को 5:05 am  

राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

मैं दुनिया की सब भाषाओं की इज़्ज़त करता हूँ, परन्तु मेरे देश में हिन्दी की इज़्ज़त न हो, यह मैं नहीं सह सकता। - विनोबा भावे

भारतेंदु और द्विवेदी ने हिन्दी की जड़ें पताल तक पहुँचा दी हैं। उन्हें उखाड़ने का दुस्साहस निश्‍चय ही भूकंप समान होगा। - शिवपूजन सहाय

हिंदी और अर्थव्यवस्था-2, राजभाषा हिन्दी पर अरुण राय की प्रस्तुति, पधारें

kamal bhai 14 सितंबर 2010 को 8:27 am  

कविता सुन्दर है। पर जाने क्यों हिन्दी दिवस का नाम सुनते ही मन वितृष्णा से भर जाता है। आज़ादी के 60 सालों के बाद भी हिन्दी दिवस मनाया जाय, इस खयाल से ही तर्क उलटा पड़ा नज़र आता है। हिन्दी बहुत फैली है इस बीच, पर शायद, हिन्दी का ये सरकारी ढिंढोरा पीटना बद किया जाये तो हिन्दी को अपने सहज तौर पर फैलने की आज़ादी मिल पायेगी। मैं इस शुभ अवसर को 'हिन्दी का पुण्य-दिवस' कहता हूं जिस दिन ब्रह्म भोज(नेताओं का), कंगाल भोज(बाबुओं का) आदि कर जीती-जागती हिन्दी की बरसी मनाई जाती है।
माफ़ करना! तुम्हारी कविता की भावना की प्रतिक्रिया में ये शब्द नहीं कहना चाहता था। वे हमेशा की तरह पाक़ और मर्म-स्पर्शी हैं।

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार 14 सितंबर 2010 को 9:06 pm  

आदरणीया अनुपमा पाठक जी
नमस्कार !

हिंद का गौरव हिंद का पर्याय,
हिंदी से पगा हमारी अभिव्यक्ति का हर अध्याय!


बहुत सुंदर रचना के लिए आभार !
साधुवाद !!

- राजेन्द्र स्वर्णकार

anupama 15 सितंबर 2010 को 8:00 am  

धन्यवाद आप सबों का!
व्यवस्था पर क्षोभ होना स्वाभाविक है ... कमल भाई जी आपकी प्रतिक्रिया भी स्वाभाविक ही है... वर्त्तमान परिस्थितियों पर निश्चित दुखी हैं हम सब ही....!
हिंदी ...सिर्फ हमारी मानसीकता की वजह से उपेक्षित है वरना इसकी सशक्तता स्वयं सिद्ध है !पंडित राहुल संकृत्यायन ने कहा था "हमारी नागरी लिपि दुनिया की सबसे वैज्ञानिक लिपि है !" जरूरत है मानसीकता में बदलाव की .... और यह होगा.... हम लायेंगे यह बदलाव !!!

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