अनायास ही
एक भाव अवस्था होती है
एक होता है मौन
अनायास ही
ज़िन्दगी
अगले ही क्षण
ये रूठने-मानने का खेल चल रहा है
कुछ पड़ाव, कुछ शब्द चित्र
रेल
धीरे धीरे
बढती है गंतव्य की ओर
कितने ही दृश्य
यादों में संजोने
यादें,
जिनका होना है,
न कोई ओर न छोर
बस भागते हुए ही बीतनी है रातें
भागते हुए ही होती है भोर
कभी तो ठहर, ज़िन्दगी!
किसी ठौर
***
हर पड़ाव से बढ़ते हुए
वहीँ कहीं थोड़ा सा
छूट जाते हैं हम
और यूँ छूटते छूटते एक दिन
ख़त्म हो जानी है यात्रा हमेशा के लिए
***
इस एकांत में
विराट पर्वत की
अचलता महसूस की
अथाह पानी के
बहते निर्मल स्वरूप को
आत्मसात किया
पत्तों के हरेपन में
दर्द की हूक सुनी
बारिश की बूंदों में
नेह के उज्ज्वल इंद्रधनुषी रंग देखे
इन सब देखने में
अपनी लघुता भी देखी
प्रकृति के यूं होने की सार्थकता महसूस करते हुए
अपने होने की निरर्थकता को भी जाना
कि यात्राएं हमें हमारे सच तक ही तो ले जाती हैं
हर यात्रा वस्तुत: खुद से खुद की यात्रा ही तो है
***
किस सदी के ईंट पत्थर
ये भी एक अद्भुत मंज़र
इतिहास इन किलों में मुस्कुराता है
अंधेरा यहां, प्रकाश का ही, प्रतिरूप हो जाता है
***
सूरज है तो डूबेगा भी
लेकिन फिर उग आएगा
सवेरा लेकर
जाता है रात को वह
सारी जिम्मेदारियां
चाँद को देकर
कि धरा पर
जितनी बेचैन आत्माएं हैं
सबको चांदनी मिली रहे
जब भोर में उगे वह
तो आस विश्वास की क्यारी
सबके आँगन खिली रहे !!
जीवन मृत्यु के द्वन्द के बीच प्रार्थनारत चेतना
एक रोज़
जीवन खुद
स्वयं से हारा था
उसने
अपनी सारी जिजीविषा को
मृत्यु पर वारा था.
मृत्यु
दिखती हो क्रूर
पर होती है ममतामयी ही
तभी तो
हारे हुए जीवन को
अंक से लगाया
प्यार से
सर पर हाथ फेर
समझाया--
ये मुझसे मिलने की उत्कंठा
क्षण भर की बात है
हे जीवन!
जिजीविषा तुम्हारी संगिनी है
वही तुम्हारा प्रात है
इनकार नहीं
मैं हूँ तुम्हारी अंतिम परिणति
परमलक्ष्य सी दूर खड़ी
एक दिन तुझे मैं स्वयं अंक में ले लूंगी
पर अभी तुम्हारे
खेलने खाने के दिन हैं
जिजीविषा का दामन थामे
तुम्हें कितनी ही राहों को
रौंदना है अभी
तुम्हें जीना है
अभी मीलों चलना है
मुझ तक आने की राह
अभी लम्बी है
हे जीवन! अभी तुम्हें
जीवन जय करना है !
कितनों की राहों के
कांटे चुनने हैं
जीवन!
तुम्हें अपने नाम की सार्थकता के
अभी पैमाने बुनने हैं !!
ज़िन्दगी...
ज़िन्दगी !
तुम्हारी अनुपस्थिति
खलती है.
वो
कहाँ है
किस हाल में है
सोच-सोच
व्यथित होता है मन
इंतज़ार करती हुई आँखें
जगी-जगी जलती हैं.
ज़िन्दगी
कभी-कभी
लम्बे समय तक
ऐसे भी चलती है.
तब जाकर कहीं रोना होता है... !!
आंसुओं से
दुःख धुल जाते हैं...
जब दुःख पहाड़ से हों
आँखें पथरा जाती हैं...
आंसू तब बहुत बौना होता है...
पैठ जाता है जब भीतर तक दुःख,
तक जाकर कहीं रोना होता है... !!
हमने बहुत देर तक
आँखों में एक आंसू के आमद का
इंतज़ार किया...
नहीं भीगी आँखें
कि मन पथराया हुआ था !!
भजन की गूँज ने फिर
जाने क्या खोला भीतर
जैसे बादलों की बोरी के मुख की
गाँठ ग़ ल ती से खुल गयी हो...
विधाता के प्रति
असीम कृतज्ञता से भरा
शरणागत मन रो पड़ा... !!
आसमान!
बरसते हुए तुम अच्छे लगते हो...
लेकिन ज़रा थम कर बरसो
प्रार्थनायें सुना करो
हाथ जोड़े घुटनों के बल बैठे अब तो हुए हमें वर्षों !!
जय हिन्द, जय हिन्द की सेना... !!
पर्वतों की
उस ऊंचाई तक
संदेशे
जाने कैसे पहुँचते होंगे...
उन वीरानों में
कैसे वो
सपनों सा रचते बसते होंगे...
कैसा उनका तेज़ प्रखर
कि वो जीवन जय करते हैं...
अपनों से दूर
निराली अपनी दुनिया में रहते हैं...
मिटटी में रमा हुआ
जो मन है
आंसू भी नत-विनत हँसते होंगे...
उन वीरानों में
कैसे वो
सपनों सा रचते बसते होंगे... !!
स्वतंत्रता सुतंत्रता ले आएगी :: सत्यनारायण पाण्डेय
लेखनी!
तूं क्यों हुई मौन?
अब भोले जनमानस को--
जगाए कौन?
नेता बने पहनकर खादी-
पर आज़ादी की गरिमा भुला दी
बहा बहा घड़ियाली आंसू-
धन-दौलत ही केवल बटोर रहे -
काट रहे चकमक चांदी।
मंत्रीपद पाने से पहले सूखे होते-
इनके कपोल,
फिर मंत्री बनते ही-
दीखने लगते गोल मटोल।
अमर शहीदों के बल आयी--
आजादी की गंगा।
फिर भी देश क्यों है?
भूखा-नंगा।
तिकड़म भिड़ा,
जनता की सम्पत्ति से बढ़ा रहे
अपना बैंक बैलेंस !
त्याग तपस्या हुई बेकार
ये उड़ाया करते उसका मखौल
चढा देश का भाग्य,
दाव पर
भूला दिए--
शहीद भगत को-
चन्द्रशेखर आजाद, गांधी, पटेल को
नेहरू, सुभाष को।
दिखा प्रगति का झूठा सपना
तिजोरी भर रहे वे केवल अपना
झूठी होती घोषणा,
केवल--
सब्जबाग।
दिलायी जिसने आजादी
आजादी के लिए स्वप्राण की--
हंसते हंसते बलि चढ़ा दी
उनकी भी मर्यादा भूल--
नेता बनते जा रहे
जनता के लिए शूल।
अब कौन सिखाये
इन्हे वह उसूल --
आजादी की लड़ी थी जंग जिसने
प्राणों का मोह ही नही सबकुछ--
थे त्याग दिये,
वे थे भारत मां के सच्चे सपूत,
छात्रशक्ति, तपःपूत।
"वन्दे मातरम्" गाते ही---
धड़का देते थे दुश्मन की छाती
आज के छात्र क्यों हैं?
मौन... ?!!
क्यूँ माने बैठे हैं हम
अपनी शक्तियों को गौण... ?!!
है व्यवस्था ही जैसे चरमरायी हुई
अवरुद्ध कंठ आवाज़ है भर्रायी हुई
शिक्षक
शिक्षण से दूर रहने को मजबूर।
हों मंत्री,
संस्थापक या व्यवस्थापक
हैं रहते योजना-
उद्देश्य से दूर!
केवल विज्ञापन,
दिखावा, प्रचार-
भरते जाते तिजोरी अपनी-अपनी
ऐसे में कैसे हो उद्धार... ?!!
जागें अब भी नौनिहाल!
कब तक झेलेंगे दुखद हाल।
जिस दिन सेवक और मालिक का भेद
सामान्य जनमानस समझ जाएगा,
मिट जाएगी यह विडम्बना
मिट जाएगा सकल दुःख-दैन्य
स्वतंत्रता सुतंत्रता ले आएगी--
भारतमाता फिर फूली नहीं समायेगी !!
![]() |
| डॉ सत्यनारायण पाण्डेय |
स्वतंत्रता दिवस :: सत्यनारायण पाण्डेय
![]() |
| Dr.S.N.Pandey |
आया शुभ पंद्रह अगस्त
हुए हम सब उन्मत्त-मस्त !
पर हम सुध-बुध न खो दें
अमर शहीदों को भी, करें याद !
जिनके प्राणों की आहुति
दे गयी हमें यह विभूति !
अब न चलेगी चिर-सुसुप्ति
हमें मिल जुल खोजनी है---
ऐसी युक्ति --
मिल जाए सबको दुःख से मुक्ति !
सभी होवें खुशहाल ,
आगे भी जन्मे नौनिहाल !
था उन्नीस सौ तीस का वह दिन
सम्पूर्ण स्वराज्य का था,
हुआ संकल्प !
संकल्प की दृढ़ता ने दिला दी
आजादी !
पर सात दशक बाद भी--
आजादी बेमानी है !
सब को सुख हो, सबको सुविधा
इस में अब भी है, क्यों दुविधा
अशिक्षा, रोग, भुखमरी ने आज भी घेरा है...
सभी लें आज के पवित्र दिवस पर--
वैसा ही मन पवित्र कर,
पवित्र संकल्प !
सभी सुखी हों,
सभी यति हों !
व्यवस्था ऐसा बनानी है
बलिदान से मिली स्वतंत्रता -
सुतंत्रता में बदल जाय !
न हम दुःखी रहें,
न कोई दुःखी रह जाय !
हो पंद्रह अगस्त की सच्ची प्रतिष्ठा -
अनेक धर्म, जाति, सम्प्रदाय में
एकता की निष्ठा ।
एकता की निष्ठा ।
सुप्रभातम्! जय भास्करः! १५ :: सत्य नारायण पाण्डेय
![]() |
| Dr. S.N. Pandey |
पापा से बातचीत :: एक अंश
--------------------------------------
"ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय, श्रीकृष्णाय नमः!
श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की शुभकामनाएं! श्रीमद्भगवद्गीता के अठारहवें अध्याय के अन्तिम श्लोक में भगवान् व्यास देव की कृपा से दिव्यदृष्टि प्राप्त संजय ने संम्पूर्ण गीता का सार धृतराष्ट्र को बतलाते हुए स्पष्ट कहा है:---
"यत्र योगेश्वरोकृष्णः यत्र पार्थोर्धनुर्धरः ।
तत्र श्री विजयो भूति ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम्।।
अर्थात् हे राजन!(राजा धृतराष्ट्र) मेरा स्पष्ट मत है कि --जहां योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और गाण्डीवधारी अर्जुन हैं -निश्चितरूप से वहीं श्रीः (शोभा,लक्ष्मी), विजय और विभूति का होना सुनिश्चित है, यह मेरा मत और दृढनिश्चय है।
यहां आज के संदर्भ में योगेश्वर श्रीकृष्ण भगवान् के जन्मोत्सव के शुभ अवसर पर हम सब को उपर्युक्त श्लोक के सार को ग्रहण करते हुए योग से विमलबुद्धि धारण करते हुए निःस्वार्थ होकर कार्य करना सीखना चाहिए! ऐसा जबतक हम नही सीख लेते तब तक कौरवों की तरह भगवान् की नारायणी सेना सहित भीष्म, द्रोण, कर्ण जैसे महारथियों के सहयोग के बाद भी, केवल स्वार्थबुद्धि के कारण, समूल नष्ट होने के कगार पर ही अपने को खड़ा पायेंगे।
अतः भगवान् कृष्ण की विमलमति काअनुसरण करते हुए जैसे अर्जुन का विजयी होना ध्रुव था, वैसे ही हम सब भी स्वार्थ रहित हो कर्मठता को सहजता से या अभ्यास पूर्वक अपना लें, तो निश्चय जानें व्यक्तिगत रूप से हम तो सुखी होंगे ही, हमारा परिवार, समाज, राज्य, देश यहां तक की सारा विश्व सुख सुविधाओं का भागी होगा। संदेह की कोई गुंजाइश ही नहीं, पर वर्तमान की मानसिकता हमारी नहीं बदलती तो अगले हजारों वर्षों तक भी हम इस दुखदस्थिति में ही जीने को अभिशप्त रहेंगे।
भगवान् हमसब को इस शुभ पुण्य दिन को सुमति प्रदान करें।
जय श्री कृष्ण!राधे!राधे!राधे!
--सत्यनारायण पाण्डेय
"हीरा जन्म अमोल था... " :: सत्यनारायण पाण्डेय
![]() |
| Dr. S.N. Pandey |
यहीं से भूल आरम्भ हुई है
राम कृष्ण को
क़िताब की वस्तु समझ
हमने अलमारियों में सजा दिया है...
पूजा घरों में बिठा दिया है...
उन मूल्यों की
हम आरती गाते हैं
पर अफ़सोस !
आचरण में
कहाँ वो जीवन शैली उतार पाते हैं... !
रामायण हो
या कि
महाभारत, पुराणादि
सब
उन्ही चरित्रों के संग्रह हैं,
जो उसी रूप में
जीये गये हैं...
आज भी
सदचरित्
आचरण की वस्तु है,
न कि
पुस्तक का विषय बता
पल्ला झाड़ लेने की
ऐसे तो फिर कभी
सुधार की सम्भावना नहीं।
"आचरणात् आचार्यः"
शब्द और अर्थ
अलग अलग नहीं,
पर हम
जागने को तैयार ही नहीं
बैंकर्स चेक के
बाऊंस होने की अवधि
तो सबको याद रहती है,
चाहे छोटी राशि ही क्यों न हो
पर
"हीरा जन्म अमोल था
कौड़ी बदले जाय"--
कबीर की यह वाणी
मात्र किताब की ही वस्तु बनी रहे,
इससे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता...
सोचें!
भुगत कौन रहा है ?!!
सब सम्भव है...
दृढता चाहिए,
सुशासन चाहिए,
कर्तव्यनिष्ठता चाहिए !!
यों
युग धर्म भी
प्रभावी होता है,
अच्छे उदाहरण अतीत् के हैं तो !!
मगर वर्तमान तो
भविष्य के लिए बुरे उदाहरण ही गढने मे लगा है
क्या इसे
युगधर्म मान
संतोष कर लेंगे हम ?
या दुन्दुभी नाद से जागेंगे
कुछ ठोस करेंगे
इस युग का वर्तमान बदलेंगे
इस युग का वर्तमान बदलेंगे... ??!!
सुप्रभातम्! जय भास्करः! १४
![]() |
| डॉ सत्यनारायण पाण्डेय |
पापा से बातचीत :: एक अंश
----------------------------------
सुप्रभातः सर्वेषाम्! मंगलकामना सहितम्! जयतु भास्करः!
मनुष्य को धन का स्वामी बनना चाहिए, नौकर नहीं।तात्पर्य यह कि मालिक ही अपनी इच्छानुसार धन का उपयोग कर पाता है, सेवक (नौकर) तो जीवन पर्यंन्त धन के रक्षण में ही लगा रह जाता है। शास्त्र आरम्भ से आगाह करते रहे हैं :---"धन की तीन गति सुनिश्चित है :: दान--भोग--नाश । जरूरतमंदो को दान दें, आवश्यकतानुसार अपने और अपनें परिजनों के भोजन-वस्त्र-आवास, शिक्षा पर कृपणता छोड़ खर्च करना, ये खर्च सार्थक खर्च हैं, नहीं तो धन की तीसरी गति तो सुनिश्चित है ही--नाश । चोर चुरा लेंगे, अग्निकाण्ड में सब जल जाएगा या मृत्यु के उपरान्त परिजन, अगर कोई वारिस नहीं है तो, सरकार के खजाने में चला जाएगा!
धनस्वामी बनें, धन के नौकर नहीं।
यह श्लोक भी इस संदर्भ में ध्यान देने योग्य है:--
नास्ति कृपणसमो दाता, न भूतो न भविष्यति ।
यः अस्पृशन्नेव सर्वं धनं-परेभ्यः प्रयच्छति ।।
अर्थात!
कृपण के समान दानी (सुनने में विरोधाभासी, पर सत्य) न तो कोई आजतक हुआ है और न भविष्य में कभी होगा! सारे धन को पाई-पाई कर जीवन भर तिजोरी या बैंक में रखता है, कृपणता के कारण अपने ऊपर भी खर्च नहीं करता, एक दिन बिना हाथो से स्पर्श (छुए) किए करोड़ो की सम्पत्ति एकमुस्त दूसरे के लिए छोड़ जाता है। दानी तो छूकर थोड़ा धन ही न्योछावर कर दानी की श्रेणी में गिना जाता है।
यदि कोई व्यक्ति भविष्य के लिए वर्तमान में कष्टमय व्यतीत करता हुआ धन संग्रह कर रहा है, तो भविष्य का सुख अनिश्चय के गर्भ में है वर्तमान का सुख भविष्य की चिन्ता की बलि चढ गया, लाभ क्या हुआ।
यदि धन संचय सन्तान के लिए कोई कर रहा है, तब भी व्यर्थ परिश्रम ही है। अनीति से कमाया धन भी बन्धन या दण्ड का कारण बन सकता है, वैसे कहा भी है:--
"पुत्र कुपुत्र किं धन संचय ?।पुत्र सुपुत्र किं धन संचय ?।।
अर्थात् दोनों ही परिस्थतियों में वर्तमान में जीने की कला सीखें, क्यूंकि संतान यदि सपुत हुआ तो खुद अपनी व्यवस्था बना लेगा और यदि कपुत निकल गया तो वर्षों की मिहनत की कमाई को मिनटो में स्वाहा कर देगा, कुमार्ग पर भी चल पड़ेगा।
इसी लिए तो नीतिज्ञ कह गए हैं:-
"अध्रुवानि शरीरानि, विभवो नैव शाश्वतः।
अध्रुवेण शरीरेण कर्तव्यो धर्मसंचयः।।
अब स्वयं विचार करें--हमसब को धन के प्रति कैसा लगाव रखना चाहिए।
सधन्यवाद प्रेषित्।
--सत्यनारायण पाण्डेय
त्रासद समय
रिश्ते आज
खूंटियों पर टंगी
तस्वीर हो गए हैं...
दीवारों में
दरारें उग आई हैं...
जीवन
मौत के कगार पर खड़ा
क्रंदन कर रहा है...
और मौत क्या करे
वह हँस कर
अपनी गोद में पनाह दे रही है
तड़पती आत्माओं को...
ऐसा लगता है
ज़िन्दगी ने अपनी सारी रीत
सिरे से भुला दी हो जैसे...
जीने वालों ने
जीवन को
कैसा निरीह बना दिया है...
कभी भी पूर्णविराम लग जाता है...
हादसा
वीभत्स चेहरे इख्तियार कर
ज़िन्दगानियाँ निगल जाता है !
मृत तो मृत
हताश उदास ज़िन्दा आँखों में भी
फिर
कुछ नहीं बचता...
आस्था विश्वास की जडें हिल जाती हैं
सुबहें...
सूरज और
किरणों से
विरक्ति सी हो जाती है...
---
फिर
नियति इतनी भी क्रूर नहीं
कुछ विम्ब उज्जवल से
प्रतिस्थापित करती है
हमारी चेतना के धरातल पर
और
हम उन निराश क्षणों में
एक नन्हे से श्वेत पुष्प में
आशा की किरण देख लेते हैं
इस त्रासद समय में
हम
यूँ अपने सांस लेते रहने की
गुंजाईश
बचा लेते हैं... !!
स्मृति शेष
यूँ
किसी का नहीं रहना
विश्वासयोग्य नहीं लगता...
आज सांस लेते हुए
क्या यकीन कर सकते हैं हम
कि एक दिन
हम भी नहीं रहेंगे...
जीवन
इतना बड़ा रहस्य है...
पर्दा ही नहीं उठता.
माया मोह से दामन जिस दिन छूटता है...
उस दिन और भी बड़े रहस्य की चादर
ढांप लेती है हमें.
अश्रुपूरित नयन
बस चुपचाप रह जाते हैं...
जीवन मृत्यु के रहस्य की खनक
जाने क्या कहती है ?!
क्यूँ ये त्रासदी है
कि एक दिन
हम बस
स्मृति शेष रह जाते हैं... ?!!
सा ग र और न दी...!
सा ग र--
सा र है
ग गन है
र वानगी है
जीवन की सबसे अनूठी बानगी है
कि वो विशाल है, अथाह है, अपार है
उसके होने में असंख्य नदियों का स्वयंसिद्ध विस्तार है
न दी--
न श्वर है
दी दार को प्यासे उसके नयन हैं
सागर तक की यात्रा उसके लिए एक कठिन चयन है
कि ठोकरों से भरी उसकी धार है
वो धीरे धीरे अपनी मंजिल तक का सफ़र तय करती हुई विशुद्ध रफ़्तार है
बस इतना ही रिश्ता
बस यही एक रिश्ता है
जिसने धरा की समस्त तरलता थामे रखी है.
किसी और जैसा होने का व्यतिक्रम ही भ्रम है... / डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय
श्रमरत चींटी,
फुदकती गौरैया...
जाल बुनती मकड़ी,
यहाँ वहां उड़ानरत तितली...
ईश्वर की
अनन्त रचना के
ये कुछ एक विम्ब
देते हैं
सर्वसाधारण को संदेश...
कि
ईश्वर की कोई रचना
निरूद्देश्य नहीं हैं !
सबके सब महत्वपूर्ण हैं,
सब की कार्यविविधता,
जटिलता का एक दूसरे को एहसास
भले करा रही होती हैं...
पर
हर कोई
अपने स्वभाव के कारण
अपने जटिल कार्य मे व्यस्त रहकर भी
आनन्द का अनुभव ही कर रहा होता है...
और
जिसका मन भटक जाता है,
वे ही
सुनने सुनाने के चक्कर में पड़
अपने कार्य की गति
धीमी कर लेते हैं...
अतः
यही श्रेयष्कर है--
अपने आप में
संतुष्ट रहें,
सभी अपने आप में
महत्त्वपूर्ण हैं--
सब अपने आप में विशिष्ट
अपने तरह के केवल एक अकेले जीव हैं
किसी और जैसा होने का व्यतिक्रम ही भ्रम है...
खुद सा होना ही असल परिश्रम है !!
उदासी, फिर आना !
मैंने
बहुत सारी उदासियाँ जी हैं...
उन बहुत सारी उदासियों में से
कुछ तो मुझे
हज़ार खिलखिलाहटों से अधिक प्रिय हैं...
कि
वे उदासियां
मुझे मेरे इतने करीब ले गयीं
कि मैंने
उस निकटता के प्रकाश में
अपनी तमाम खामियों को
स्पष्ट पहचाना...
अपनी लघुता महसूस की
अपने होने की निरर्थकता को पहचाना
अपनी कविताओं में दर्ज़
आस विश्वास की
कितनी ही बातों को मैंने तत्क्षण खारिज़ किया
सृजन के कुछ दिव्य पल जिए
आंसुओं से अपनी आत्मा के दाग धोये
क्रोध से उपजे वैमनस्य को
कतरा कतरा आंसुओं से शांत किया
जीवन को पुनः विश्रांत किया
कि
इतने में
धूप खिल आई...
सूखा ले गयी
सारी नमी
थम गयी रुलाई...
मुस्कान वहीँ खिली बैठी थी
मेरे दामन से लिपट गयी
ज़िन्दगी ने मुझे आवाज़ दिया
उदासियाँ अचानक सिमट गयीं
मैंने
मुस्कान को
गले लगाते हुए,
उदासी को
भरे मन से विदा किया !
कहीं आँखों की कोर से
छलकता कोई भाव चुपके से इशारों में कह गया--
उदासी, फिर आना
कि मुझे फिर अपने करीब होना है
मुझे अपने बहाने कोटि कोटि आत्माओं के दुःख से रोना है... !!
एक सिलसिला जीवन :: डॉ. सत्यनारायण पाण्डेय
जीवन और मृत्यु का
अनन्त सिलसिला...
अतृप्त इच्छाओं की
धुंधली यादें...
जिजीविषा भी...
अवरूद्धमार्ग का
अहसास भी...
स्वतंत्र सोच के साथ
सांसारिक व आध्यात्मिक वर्जनाओं के बीच
मुक्ति के मार्ग की तलाश भी...
शरीरधर्म निर्वहन
शरीर की अनिवार्य क्षुधा की
तृप्ति भी
इस प्रकार
घटित होती है
संसार में
जीवनयात्रा के क्रम में
आत्मा की
परमात्मा तक की यात्रा !!
नियति... !!
चुन लेते
कुछ ख़्वाब कहीं से
हम भी ख़्वाब बो लेते...
गीत छंद की दुनिया में
हम भी किसी कविता की
भूली बिसरी कोई पंक्ति हो लेते...
पर हमें तो
ठोकरों को जीने वाले पाँव
होना था...
कहीं दूर समंदर किनारे बसा
विस्मृत कोई गाँव
होना था...
सो हम वही हुए...
जो थे वही रहे... !!
चन्दनवन की भिलनी :: सत्यनारायण पाण्डेय
| Dr. S. N. Pandey |
आदत बिगड़ गयी है-
सर्वत्र आदर पा कर,
अब क्या करूं ??
इस वृहद परिवार में आकर...
इस कपटी संसार को पाकर...
जहां सत्य और सदाचार--
सब हैं बेकार,
चन्द सिक्कों-
के लिए जहां--
बेच दिए जाते हैं -
धर्म, इमान, सामाजिकता, सद्भाव औ' सरोकार।
माना !
सरलता
और कभी-कभी
अतिपरिचय भी-
व्यक्तियों के प्रति लाता है--
अरूचि
अनादर भाव-
अक्सर लोग
उस सरल व्यक्तित्व का
अनादर कर ही-
सुख पाते हैं
है ठीक ही कहावत--
चन्दनवन की भिलनी
चन्दन को बनाती ईंधन!
वह उसके महत्व को क्या जाने--
यह चन्दन ज्ञानियों के ललाटपर--
होता तिलक, भाल का शोभन!
है कीमती सुगंधियुक्त वन्दन
पर जंगल की भीलनी के लिए-
मात्र ईंधन! मात्र ईंधन! मात्र ईंधन!
लड़ाई मिथ्याभिमान की :: सत्यनारायण पाण्डेय
| Dr. S. N. Pandey |
एक दशक पुरानी पापा की लिखी यह कविता किन घटनाक्रमों से उपजी थी वह स्पष्ट याद है! हमारी सोसाइटी जहाँ हम रहते थे, वहां की कुछ बातों से असहज हो कर लिखी गयी कविता आज पढ़ते हुए पुनः यह बात पुष्ट होती हुई लगती है कि लिख जाने के बाद देश काल परिस्थिति से परे हो जाती है कविता... ऐसा न होता तो आज इसे पढ़ते हुए ये कविता मुझे और भी कई सन्दर्भों में, वर्तमान परिपेक्ष्य में यूँ प्रासंगिक नहीं लगती...
लड़ाई
मिथ्याभिमान की
नासमझी की
अंध स्वार्थ की हो जहाँ...
हो जहां
समाज में-
किंकर्तव्यविमूढ़ता...
प्रबुद्ध जन हों जहां--
मूक, विचलित, भयभीत...
वहां हो
कोई नीतिज्ञ भी -
तो क्या कर पाएगा?
जहां पड़ी हो कूप मे ही भंग-
वहां यथार्थ या सत्यार्थ को भी-
कौन समझा पाएगा?
दम्भी दम्भ भरता हुआ भी-
दम्भ क्या है,
समझ नहीं पाता है...
नाम भले सम्राट अशोक हो--
पर जग को शोकमग्न बनाता है...
सुनते हैं
नरसंहार के बाद वह
बिलकुल बदल गया था,
शान्ति का संवाहक हो गया था।
पर
आज साहस नहीं
लोग अपनी गलती भी स्वीकारें-
अपनी भूल को सुधारें...
ये हैं परम शातीर, रचते स्वांग
कि वे तो भोले और निराले हैं--
पर लोग तो समझ ही लेते हैं दोहरे चरित्र को...
जीता वह घूटन में ही है!
और
स्पष्टवादी किसी की बिना किये परवाह
सब कुछ यहां रख देता है--
धाराप्रवाह! धाराप्रवाह!
अब भी वही हैं, अब भी वहीं है...
तुमसे
कविता कहते थे...
तुमको
कविता कहते थे...
हमें
कब रही
अपनी खबर...
जहाँ के हैं नहीं
वहीँ तो कबसे रहते थे...
ठेस ठोकर
अपने साथी हैं...
चोटिल होकर भी
हम नदिया सा बहते थे...
विशुद्ध भाव की गंगा ले
अपनी नन्ही लोटकी
धन्य किये रहते थे...
हाँ!
तुम से
कविता कहते थे...
तुम को
कविता कहते थे... !!
--- --- ---
अब भी वही हैं...
अब भी वहीं है...
भूली बिसरी
गलियों में हम...
छूट गयी
कविताओं के
संस्कार समेटते रहते हैं... !!
दुख हेय नहीं, यह ध्येय होना चाहिए :: सत्यनारायण पाण्डेय
![]() |
| Dr. S.N. Pandey |
आज सुख दुःख की आवाजाही को समर्पित, पापा की यह कविता या कविता जैसा कुछ... जो भी कह लें...
पीड़ा का उत्सव मनाने वाली सनातन परंपरा के वाहक हैं हम, हमें क्या सुख दुःख डरा पायेगा... इसे पढ़ते हैं तो एक सकारात्मकता जागृत हो उठती है; मन मस्तिष्क जीवन की ओर हर हार के बावजूद आशा भरी नज़रों से ही देखने को प्रेरित होता है... !
तो ये रही, सीख या कविता, जिस रूप में आप तक पहुँचे...
तो ये रही, सीख या कविता, जिस रूप में आप तक पहुँचे...
सुख-दुख
हैं जुड़वा भाई...
सभी के जीवन में
क्रमशः आते-जाते हैं
बिना आपस में ठाने कोई लड़ाई...
हम रहें तैयार,
यथाक्रम--
उन दोनो के
स्वागत के लिए--
इनका
क्रमशः आना-जाना
है अनिवार्य,
दोनों हो हमें सहज स्वीकार्य
दुख से
हार कर बैठ जाना...
है
अपनी प्रगति और प्रतिभा को ही
बाधा पहुंचाना...
जब भी आए दुख की बारी
पहले से ही हो अपनी तैयारी
यह अवश्यम्भावी है-
दुख आया है
चला भी जायेगा
समय का चक्र चलायमान है,
क्योंकर वह सदा-
टीक पाएगा?
है हमें
ध्यान यह रखना--
सुख में
आनंदातिरेक में डूब न जाएँ
न दुख के आने पर एकदम ही टूट जाएँ
न हम भाग्य को कोसें
न हमदर्दी के पात्र बनें।
लें हिम्मत से काम,
दुःख हो या सुख,
लें उससे सीख --
इससे व्यक्तित्व में ही--
आएगा निखार,
आप पाएंगे खुद में परिवर्तन,
सुख दुख लगेंगे सम
फिर क्योंकर सतायेगा गम?
स्थिर रहेगी कार्यकुशलता
न होगा कभी कार्यव्यवधान
सुख दुख लगने लगेंगे समान !!
हो जीवन में
केवल सुख ही सुख -
तो भी नीरस ही
हो जाता है जीवन
यह तो दुख की ही महिमा है,
जो हमे सजग क्रियाशील बनाता है!
भग जाती जीवन की --
एकरसता
नीरसता !!
दुख हेय नहीं
यह ध्येय होना चाहिए...
उसके स्वागत का ख्याल रहे,
सुख दुःख के
मधुर मिलन की
हो मन मे यदि बात,
फिर
हो आनंद ही आनंद,
कि
दोनों ही अब हो गये हैं,
सहज स्वीकार्य !!
भावविभोर लेखनी














