अनमोल है
दिल के रिश्तों की
दुनिया,
यहाँ
मौन संवाद की
परंपरा है!
बादलों से
आच्छादित
है भावविभोर अम्बर,
और
सत्यनिष्ठ
सहनशील धरा है!
विडम्बना ही है-
अंतर अकालग्रस्त
और बाहर,
कृत्रिम संसाधनों से
सज्जित
सबकुछ हरा भरा है!
मानवीय क्रियाक्लापों के
कितने दूरगामी
हैं प्रभाव,
इससे अनभिज्ञ..
कलयुगी चेतना ने
कृत्रिमता को ही तो वरा है!
चलता ही रहता है शोरगुल
खामोशी..
बोल न पाती है,
हमने खोये हैं मनभावन शब्द
भावों की धरती तो
अब भी उर्वरा है!
अनमोल है
दिल के रिश्तों की
दुनिया,
यहाँ
मौन संवाद की
परंपरा है!
भावों की धरती... अब भी उर्वरा है!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
20 अक्टूबर 2010

8 टिप्पणियाँ:
मानवीय क्रियाक्लापों के
कितने दूरगामी
हैं प्रभाव,
इससे अनभिज्ञ..
कलयुगी चेतना ने
कृत्रिमता को ही तो वरा है!अनमोल है
दिल के रिश्तों की
दुनिया, .......आप के सब्दों की माला सुन्दर फूलों से सु सज्जित है अनु जी !!!!!!!!!!!!
अनमोल है
दिल के रिश्तों की
दुनिया,
यहाँ
मौन संवाद की
परंपरा है!
आप बिलकुल सही कह रही हैं आप दिल के रिश्तों की न कोई भाषा होती है और न ही कोई नाम.
शब्दों के बेहतरीन संयोजन से आपने अपनी बात कही है.
बहुत ही सुन्दर और मनभाती प्रस्तुति।
आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (22/10/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com
अनमोल है
दिल के रिश्तों की
दुनिया,
यहाँ
मौन संवाद की
परंपरा है!
- बहुत बढिया अनुपमा जी...
खामोशी बहुत कुछ कहती है, खामोशी शब्दों से भी ज्यादा मुखर होती है. पर अर्थहीन शब्दों के दमधोंटू, आपाधापी भरे कोलाहलमय संसार में खामोशी कई बार सिर्फ़ किसी मूक बांसुरी की खोई हुई गूंज बन कर रह जाती है. हमेशा की तरह बेहद खूबसूरत और संवेदनशील अभिव्यक्ति. बधाई. आभार.
सादर
डोरोथी.
har rachna mugdh kar deti hai..bahut sundar abhivyakti
भावों की धरती तो
अब भी उर्वरा है!
यहाँ
मौन संवाद की
परंपरा है!
do alag alag baten anu!!!!!!!!!!!!
बहुत कुछ कह्ती है आपकी रचना
एक टिप्पणी भेजें