भावों की धरती... अब भी उर्वरा है!

अनमोल है
दिल के रिश्तों की
दुनिया,
यहाँ
मौन संवाद की
परंपरा है!

बादलों से
आच्छादित
है भावविभोर अम्बर,
और
सत्यनिष्ठ
सहनशील धरा है!

विडम्बना ही है-
अंतर अकालग्रस्त
और बाहर,
कृत्रिम संसाधनों से
सज्जित
सबकुछ हरा भरा है!

मानवीय क्रियाक्लापों के
कितने दूरगामी
हैं प्रभाव,
इससे अनभिज्ञ..
कलयुगी चेतना ने
कृत्रिमता को ही तो वरा है!

चलता ही रहता है शोरगुल
खामोशी..
बोल न पाती है,
हमने खोये हैं मनभावन शब्द
भावों की धरती तो
अब भी उर्वरा है!

अनमोल है
दिल के रिश्तों की
दुनिया,
यहाँ
मौन संवाद की
परंपरा है!

8 टिप्पणियाँ:

Travel Trade Service 21 अक्टूबर 2010 को 9:00 am बजे  

मानवीय क्रियाक्लापों के
कितने दूरगामी
हैं प्रभाव,
इससे अनभिज्ञ..
कलयुगी चेतना ने
कृत्रिमता को ही तो वरा है!अनमोल है
दिल के रिश्तों की
दुनिया, .......आप के सब्दों की माला सुन्दर फूलों से सु सज्जित है अनु जी !!!!!!!!!!!!

Yashwant R. B. Mathur 21 अक्टूबर 2010 को 11:41 am बजे  

अनमोल है
दिल के रिश्तों की
दुनिया,
यहाँ
मौन संवाद की
परंपरा है!

आप बिलकुल सही कह रही हैं आप दिल के रिश्तों की न कोई भाषा होती है और न ही कोई नाम.
शब्दों के बेहतरीन संयोजन से आपने अपनी बात कही है.

vandana gupta 21 अक्टूबर 2010 को 12:27 pm बजे  

बहुत ही सुन्दर और मनभाती प्रस्तुति।
आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (22/10/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com

Barthwal 21 अक्टूबर 2010 को 3:31 pm बजे  

अनमोल है
दिल के रिश्तों की
दुनिया,
यहाँ
मौन संवाद की
परंपरा है!
- बहुत बढिया अनुपमा जी...

Dorothy 21 अक्टूबर 2010 को 4:21 pm बजे  

खामोशी बहुत कुछ कहती है, खामोशी शब्दों से भी ज्यादा मुखर होती है. पर अर्थहीन शब्दों के दमधोंटू, आपाधापी भरे कोलाहलमय संसार में खामोशी कई बार सिर्फ़ किसी मूक बांसुरी की खोई हुई गूंज बन कर रह जाती है. हमेशा की तरह बेहद खूबसूरत और संवेदनशील अभिव्यक्ति. बधाई. आभार.
सादर
डोरोथी.

संगीता स्वरुप ( गीत ) 22 अक्टूबर 2010 को 6:25 am बजे  

har rachna mugdh kar deti hai..bahut sundar abhivyakti

www.navincchaturvedi.blogspot.com 22 अक्टूबर 2010 को 3:28 pm बजे  

भावों की धरती तो
अब भी उर्वरा है!

यहाँ
मौन संवाद की
परंपरा है!

do alag alag baten anu!!!!!!!!!!!!

palash 22 अक्टूबर 2010 को 6:46 pm बजे  

बहुत कुछ कह्ती है आपकी रचना

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