अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

यादें...

गुजर जाने के बाद भी ,
कुछ बातें रह जाती हैं याद ही!

वो तोतले लबों का गायन
प्यार भरी नज़रों ने किये जो रिश्ते कायम
वो ठोकर खाकर गिरना
और चखना सफलता का स्वाद भी,
कुछ बातें रह जाती है याद ही !

वो रिमझिम बरसता सावन
वो अपना भीगा-भीगा दामन
जिंदगी अपनी प्रेयसी ....
हम ही इसके मजनू भी ..... फरहाद भी ,
कुछ बातें रह जाती है याद ही !

वो पाप-पुण्य का खेल पुरातन
कभी मन के राम पे जो पड़ा भरी रावण
वो संघर्ष की सनातन बेला -
और जीतने का उन्माद भी ,
कुछ बातें रह जाती है याद ही !

वो झूमती हुई कलियाँ ... वो आँगन
वो पीछे छूटा घर ... वो यादों में बसा प्रांगन
यही हमारी पूंजी है -
और यही हमारी जायदाद भी ,
कुछ बातें रह जाती है याद ही !

सुख-दुःख का बारी-बारी से आगमन
पतझड़ भी है सगा उसका .... जिसे हम कहते हैं सावन
जीना है गुलशन को..
गम नहीं गर कुछ कलियाँ हो जाएँ बर्बाद भी ,
कुछ बातें रह जाती है याद ही !

त्याग से ही आभूषित जीवन कानन है
आज फिर मचा हुआ ये कैसा आनन-फानन है
सहर्ष त्याग दें खुद को लक्ष्य की खातिर ,
हरियाली छाये इसके लिए बनना पड़ता है कुछ को खाद भी ,
कुछ बातें रह जाती है याद ही !

स्वार्थ का कर चोला धारण
क्यों ये चौपायों सा आचरण
अरे!करें कुछ ऐसे कर्म जो दीप्त करे ... राहें आजीवन
और शायद जीवन के बाद भी ...
कुछ बातें रह जाती है याद ही !

गुजर जाने के बाद भी ,
कुछ बातें रह जाती हैं याद ही!

6 टिप्पणियाँ:

राजभाषा हिंदी 17 सितंबर 2010 को 8:11 am  

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

मशीन अनुवाद का विस्तार!, “राजभाषा हिन्दी” पर रेखा श्रीवास्तव की प्रस्तुति, पधारें

मनोज कुमार 17 सितंबर 2010 को 8:41 am  

जीना है गुलशन को..
गम नहीं गर कुछ कलियाँ हो जाएँ बर्बाद भी ,
कुछ बातें रह जाती है याद ही !
जीवन का नाम है गति। जो बीत गई सो बात गई!
बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
मशीन अनुवाद का विस्तार!, “राजभाषा हिन्दी” पर रेखा श्रीवास्तव की प्रस्तुति, पधारें

अंक-9 स्वरोदय विज्ञान, आचार्य परशुराम राय, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

संगीता स्वरुप ( गीत ) 17 सितंबर 2010 को 10:28 am  

बहुत खूबसूरती से यादों को सहेजा है ..

nirmal gupt 18 सितंबर 2010 को 8:47 am  

गुजर जाने के बाद भी ,
कुछ बातें रह जाती हैं याद ही!

यादों का खूबसूरत आख्यान .बधाई .

अनुपमा पाठक 18 सितंबर 2010 को 4:03 pm  

@all
धन्यवाद!

संजय भास्कर 19 सितंबर 2010 को 9:20 am  

सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ