जैसे झरने से झरता है जल
समय की धारा में जैसे बहते हैं पल
वैसे ही मौन हो या मुखर, निरंतर
घटित होती है कविता!
होते हैं जब शब्द विकल
बाँधने को वेदना सकल
तब घास पर, ओस की बूंदों सी
मिल जाती है कविता!
खिलता है जब कोई कमल
कल्याणार्थ पीता है जब कोई गरल
तब आस का अमृत पीकर, मानों
जी जाती है कविता!
ठोस पत्थर भी हो जाते हैं तरल
ये सच है.. जीना नहीं सरल
इस उहापोह में, मूंदी पलकों के बीच
खो जाती है कविता!
कठिन प्रश्नों के ढूँढने हैं हल
आज सृजित होने हैं आनेवाले कल
इस निश्चय की ज़मीन पर, सहजता से
खिल जाती है कविता!
जैसे झरने से झरता है जल
समय की धारा में जैसे बहते हैं पल
वैसे ही मौन हो या मुखर, निरंतर
घटित होती है कविता!
कविता का प्रादुर्भाव!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
31 अक्टूबर 2010

16 टिप्पणियाँ:
हमसे पूछिए तो,
फुर्सत में,
घटित होती है कविता !
जिन्दी के अधूरे मंसूबे ,
ख्वाहिशे को, कागज़ पर लिए,
उतरती है कविता ...
आपकी जैसे उम्दा नज़र नीयत ,
है अपनी नहीं,
इसलिए शायद नहीं हमसे ,
घटित होती अच्छी कविता !
बहुत अच्छी अभिव्यक्ति, लिखते रहिये ....
"जैसे झरने से झरता है जल
समय की धारा में जैसे बहते हैं पल
वैसे ही मौन हो या मुखर, निरंतर
घटित होती है कविता!"
कहते हैं 'जहाँ न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि'....कल्पना लोक में कवि कहाँ से कहाँ पहुँच जाता है..लेकिन कल्पना और यथार्थ की सरस अभिव्यक्ति ही कविता है.
बहुत ही ख़ास और जुदा अंदाज़ है आपका अपनी बात कहने का.
सादर
बहुत सुन्दर ,,,
सच में कविता कभी नहीं मरती यह कहीं ना कहीं किसी ना किसी रूप में जिंदा ही है ,,,,,
जैसे झरने से झरता है जल
समय की धारा में जैसे बहते हैं पल
वैसे ही मौन हो या मुखर, निरंतर
घटित होती है कविता!
बहुत ख़ूबसूरत...ख़ासतौर पर आख़िरी की पंक्तियाँ....मेरा ब्लॉग पर आने और हौसलाअफज़ाई के लिए शुक़्रिया..
बेहतरीन अभिव्यक्ति……………कविता का सृजन तो हर वक्त होता ही रहता है……………।सुन्दर आयाम दिया है।
जैसे झरने से झरता है जल
समय की धारा में जैसे बहते हैं पल
वैसे ही मौन हो या मुखर, निरंतर
घटित होती है कविता!
उम्दा रचना !
u r beyond my expectations.........umeed se zyada...bahut zyada....amazing..God bless u
भावनाओं के इस सोते को सदा नम रखिएगा ताकि इस निर्झरणी के अविरल प्रवाह से हम भी भीगते रहें।
सुंदर रचना, भावना तरल, बिल्कुल झरने की तरह।
होते हैं जब शब्द विकल
बाँधने को वेदना सकल
तब घास पर, ओस की बूंदों सी
मिल जाती है कविता!
सच कहा...तभी होती है कविता.
सुंदर अभिव्यक्ति.
सच को बयां कर गयीं आपकी पंक्तियां।
कितनी रचनाशीलता से लिखती हैं आप।
यूं ही सुन्दर रचनाएं लिखती रहिए, आपकी कविताओं की बस्ती काफी रचनात्मक है।
धन्यवाद
कविता का पहला बंद बहुत दिलकश लगा ... और ...
वैसे ही मौन हो या मुखर, निरंतर
घटित होती है कविता!
वाह अनुपमा जी,
आप ने सच ही कहा है,मौन हो या मुखर दोनों ही कविता के रूप हैं !
आपकी कविता की हर पंक्ति अपने आप में एक पूर्ण कविता लगती है !
इतनी अच्छी अभिव्यक्ति के लिए मेरी बधाई स्वीकार करें !
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ
www.marmagya.blogspot.com
bahut achchi lagi aapki kavita.
कविता की अभिव्यक्ति अच्छी लगी । शुभकामनायें ।
सही है!
वैसे हम तो यूँही तुकबंदी कर देते हैं! सोचते समझते नहीं!
आशीष
---
पहला ख़ुमार और फिर उतरा बुखार!!!
होते हैं जब शब्द विकल
बाँधने को वेदना सकल
तब घास पर, ओस की बूंदों सी
मिल जाती है कविता!
... bilkul
is rachna ko rasprabha@gmail.com per bhejiye parichay aur tasweer ke saath vatvriksh ke liye....
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