अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

वो पास मेरे आया...

एक रोज़ जीवन दुबका सा
पास मेरे आया ...

मेरी भाव भंगिमा में
जाने उसने क्या पाया ...
बोल उठा अनायास ही-
'क्यूँ चिंता में डूबी है काया ...
काहे घेरे हुए है तुझे
मिथ्या जगत की माया ...
अंतस्तल की दुनिया में
नहीं है कोई दुरूह साया ...
स्वयं से सामंजस्य बिठाना
क्यूँ नहीं फिर तुझको भाया ...
जा समेट अपने आप को
न कर व्यर्थ वक़्त ज़ाया ...!'
मैंने उसी पल चेतन शक्ति को-
बड़ी विनम्रता से शीश नवाया ...
आत्मद्वार को आहिस्ते से
खटखटाया ...
फिर इस अद्भुत यात्रा का
चित्र सम्मुख हो आया ...
जीवन का मीठापन.. शीतलता.. भगवन..
ऱब.. सब तब मन के भीतर पाया ...

एक रोज़ जीवन दुबका सा
पास मेरे आया ...

8 टिप्पणियाँ:

राजभाषा हिंदी 15 सितंबर 2010 को 7:54 am  

मनुष्य का जीवन अनुभव का शास्त्र है।

राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

काव्य प्रयोजन (भाग-८) कला जीवन के लिए, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

vandana 15 सितंबर 2010 को 10:17 am  

अद्भुत यात्रा का.....अद्भुत वर्णन...!!!

संगीता स्वरुप ( गीत ) 15 सितंबर 2010 को 11:37 am  

बहुत सुन्दर यात्रा ...

MOTWANI NARESH 15 सितंबर 2010 को 5:16 pm  

अद्भुत यात्रा का.....अद्भुत वर्णन..

anupama 16 सितंबर 2010 को 9:54 am  

शब्दाशीश हेतु हार्दिक धन्यवाद !!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 16 सितंबर 2010 को 10:24 am  

कमाल की अभिव्यक्ति है!
--
बधाई!
--
दो दिनों तक नेट खराब रहा! आज कुछ ठीक है।
शाम तक सबके यहाँ हाजिरी लगाने का

babanpandey 16 सितंबर 2010 को 11:32 am  

bahut hi bhavpurn ...

संजय भास्कर 19 सितंबर 2010 को 9:21 am  

फिर इस अद्भुत यात्रा का
चित्र सम्मुख हो आया ...
जीवन का मीठापन.. शीतलता.. भगवन..
ऱब.. सब तब मन के भीतर पाया ...

एक रोज़ जीवन दुबका सा
पास मेरे आया ...
ऐसी कवितायें रोज रोज पढने को नहीं मिलती...इतनी भावपूर्ण कवितायें लिखने के लिए आप को बधाई...शब्द शब्द दिल में उतर गयी.

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