प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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31 मई 2019
गुज़रती हुई
रेलगाड़ी की आवाज़ से
गूँज रहा है मेरा एकांत
उस आवाज़ में कई स्वर शामिल हैं
पटरियाँ
अपने दुःख गुनगुनाती हैं
रेल पूरी कर्कश तन्मयता से
उस पर से गुज़र जाती है
अंधेरे बोलते हैं
आवाज़ में अपना भी स्वर घोलते हैं
उनके स्वर में अनचिन्हे दुःख हैं
दूर गुज़रती रेल
और मेरे एकांत के बीच
जो फ़ासला है
वहाँ बीच में कहीं आकाश की भी उपस्थिति है
कुछ टिमटिम तारों की लय से
आकाश के फैलाव में
मुस्कानें हैं
कहीं उदास सा चाँद भी है
जो हर दिन
अलग ही होता है
उसके अकेलेपन के राग से
कभी-कभी तो
आकाश भी द्रवित हो रोता है
बारिश होती है
फिर
वह टिप-टिप स्वर में
सौंधे शब्द पिरो
आसमान का दर्द भी गाती हैं!
रेलगाड़ी को गुज़रते हुए सुनना
कितनी आवाज़ों को आत्मसात करना था-
ये शायद ही
मेरा समय
कभी रेखांकित कर पाए
ज़िंदगी
आवाज़ और ख़ामोशी के गणित को जीती हुई
किसी तरह किसी रोज़
पूरी की पूरी समझ आ जाए
काश!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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28 मई 2019
यादें, टीसें, दर्द, विदाई
ये हमारे घरों की इंटें हैं
समय का पहिया निर्विकार घूमता है
कि शून्य है सब उसकी परिधि में!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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एक दीप गगन में
एक संजीवन द्वीप मन में
इतना है, तो जीवन है, जीवन में !
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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27 मई 2019
ज़िन्दगी से
उठापटक जारी है
साँस लेना भी
जैसे भारी है
संशयों के झुरमुट में
लम्हें बीत रहे हैं
हम बूँद-बूँद
पात्र से रीत रहे हैं
अपना आप ही
खुद से खो रहा है
आँखें निस्तेज़ बेसुध पड़ी हैं
मन फूट-फूट कर रो रहा है
शोर भरे जीवन में
सन्नाटा सा पसरा है
संवाद बचे नहीं किसकी ओर देखें
अब बस अपना ही आसरा है
जो ओझल हो गयी
वो ज्योत हमारा सर्वस्व थी
ओझल हो मन-प्राण अँधेरा कर गयी
इस रीतेपन में कैसे
अपना बिखराव समेटें
एकाकी मन को वह गमगीन बयार और अकेला कर गयी !
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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23 मई 2019
उन दिनों
मिलावट नहीं थी
खनक वह
सहज थी
आज
खोटा सिक्का
हो चला है जीवन
कुछ और नहीं
ये परिवर्तन की
मार महज थी
कल फिर
वक़्त करवट लेगा
खोट चलन के बाहर होगा
वो खनक लौट आएगी
बिसार दिया जाएगा
हर उस अलंकार को
जो व्यर्थ की सजधज थी!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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20 मई 2019
ईश्वर
सकल रचनाओं का मूल भी,
वही उनमें तल्लीन है
उसकी
कृपादृष्टि के बिना
हम बिन पानी के मीन हैं
रचनाएं कितना कुछ कह कर
मौन हो जाती हैं
वे स्वभावत: शालीन हैं
ऊंचे उड़ते
पंख पसारे भावों की
एक ठोस सहज सी ज़मीन है
मेरी कविताएं
शीर्षकविहीन हुआ करती थीं
वे आज भी शीर्षकविहीन हैं !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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19 मई 2019
कई बार
कई-कई दिन कुछ नहीं लिखा जाता
उठते-गिरते हुए भी तो
कितनी बार कुछ नहीं सीखा जाता
कई-कई दिन उदास गुज़र जाते हैं
तब कहीं से कोई ज्योत टिमटिमाती है
फिर बुझ जाती है
उगते-डूबते
दिन निकलता है
ढल जाता है
कभी बड़ी महत्वपूर्ण रही कोई बात
फिर कोई मायने नहीं रखती
ऐसा भी पल आता है!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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18 मई 2019
हो न हो
सफ़र की धूल ही
आँखों का सुकून है
जीवन
अहर्निश चलते चलने की
कोई अनाम धुन है.