काश!

गुज़रती हुई
रेलगाड़ी की आवाज़ से
गूँज रहा है मेरा एकांत
उस आवाज़ में कई स्वर शामिल हैं


पटरियाँ
अपने दुःख गुनगुनाती हैं
रेल पूरी कर्कश तन्मयता से
उस पर से गुज़र जाती है


अंधेरे बोलते हैं
आवाज़ में अपना भी स्वर घोलते हैं


उनके स्वर में अनचिन्हे दुःख हैं


दूर गुज़रती रेल
और मेरे एकांत के बीच
जो फ़ासला है
वहाँ बीच में कहीं आकाश की भी उपस्थिति है


कुछ टिमटिम तारों की लय से
आकाश के फैलाव में
मुस्कानें हैं
कहीं उदास सा चाँद भी है
जो हर दिन
अलग ही होता है
उसके अकेलेपन के राग से
कभी-कभी तो
आकाश भी द्रवित हो रोता है


बारिश होती है


फिर
वह टिप-टिप स्वर में
सौंधे शब्द पिरो
आसमान का दर्द भी गाती हैं!


रेलगाड़ी को गुज़रते हुए सुनना
कितनी आवाज़ों को आत्मसात करना था-


ये शायद ही
मेरा समय
कभी रेखांकित कर पाए


ज़िंदगी
आवाज़ और ख़ामोशी के गणित को जीती हुई
किसी तरह किसी रोज़
पूरी की पूरी समझ आ जाए


काश!

समय का पहिया निर्विकार घूमता है

यादें, टीसें, दर्द, विदाई
ये हमारे घरों की इंटें हैं


समय का पहिया निर्विकार घूमता है
कि शून्य है सब उसकी परिधि में!



अरुणोदय













एक दीप गगन में
एक संजीवन द्वीप मन में 


इतना है, तो जीवन है, जीवन में !

सन्नाटा सा पसरा है

ज़िन्दगी से
उठापटक जारी है
साँस लेना भी
जैसे भारी है


संशयों के झुरमुट में
लम्हें बीत रहे हैं
हम बूँद-बूँद
पात्र से रीत रहे हैं 


अपना आप ही
खुद से खो रहा है
आँखें निस्तेज़ बेसुध पड़ी हैं
मन फूट-फूट कर रो रहा है 


शोर भरे जीवन में
सन्नाटा सा पसरा है
संवाद बचे नहीं किसकी ओर देखें
अब बस अपना ही आसरा है 


जो ओझल हो गयी
वो ज्योत हमारा सर्वस्व थी
ओझल हो मन-प्राण अँधेरा कर गयी 


इस रीतेपन में कैसे
अपना बिखराव समेटें
एकाकी मन को वह गमगीन बयार और अकेला कर गयी !

वो खनक लौट आएगी

उन दिनों
मिलावट नहीं थी


खनक वह
सहज थी


आज
खोटा सिक्का
हो चला है जीवन


कुछ और नहीं
ये परिवर्तन की
मार महज थी


कल फिर
वक़्त करवट लेगा
खोट चलन के बाहर होगा


वो खनक लौट आएगी
बिसार दिया जाएगा
हर उस अलंकार को
जो व्यर्थ की सजधज थी!


शीर्षकविहीन

ईश्वर
सकल रचनाओं का मूल भी,
वही उनमें तल्लीन है


उसकी
कृपादृष्टि के बिना
हम बिन पानी के मीन हैं


रचनाएं कितना कुछ कह कर
मौन हो जाती हैं
वे स्वभावत: शालीन हैं


ऊंचे उड़ते
पंख पसारे भावों की
एक ठोस सहज सी ज़मीन है


मेरी कविताएं
शीर्षकविहीन हुआ करती थीं
वे आज भी शीर्षकविहीन हैं !!

सब समय की बात है

कई बार
कई-कई दिन कुछ नहीं लिखा जाता


उठते-गिरते हुए भी तो
कितनी बार कुछ नहीं सीखा जाता


कई-कई दिन उदास गुज़र जाते हैं
तब कहीं से कोई ज्योत टिमटिमाती है
फिर बुझ जाती है


उगते-डूबते
दिन निकलता है


ढल जाता है


कभी बड़ी महत्वपूर्ण रही कोई बात
फिर कोई मायने नहीं रखती


ऐसा भी पल आता है!

सफ़र की धूल

हो न हो
सफ़र की धूल ही
आँखों का सुकून है


जीवन
अहर्निश चलते चलने की
कोई अनाम धुन है.


इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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