बादल किसी से कुछ नहीं लेते..... उनका तो एकमात्र ध्येय है बस छाना और बरस जाना.... स्नेहमयी बूंदों से आद्र कर जाना सबों को! यूँ ही यह कविता कुछ रोज़ पहले लिख गयी थी.... मेरी कलम से! मुझे बादलों का सहोदर जो मिला..... तो मैंने जाना, बादल की व्यथा को, और उसके भावों से साम्य स्थापित करते हुए..., बादलों के सहोदर ने, मुझसे यह कविता लिखवा दी! आज ऐसी ही एक स्नेह भरी बारिश ने मेरे इस सृजन संसार (इस ब्लॉग) को नीले रंग की सुषमा से भर दिया....
मन अभिभूत हो तो शब्द मौन हो जाते हैं.....!!!
बादलों की बातें करते हुए ललित भैया की प्रेरणा से यह रचना अस्तित्व में आई थी...., आज उन्ही के द्वारा नए रूप में सजाये गए "अनुशील ...एक अनुपम यात्रा" पर सबसे पहले उन्ही की प्रेरणा से लिखी एक कविता.....
"बादलों का सहोदर"
बादल अपनी व्यथा-
उनसे कहते हैं...
वो पीर लिए हृदय में-
हँसते हुए सबकुछ सहते हैं...
और अगर यह कहूं-
तो न बादल ही मानेंगे,
न आप ही कभी जान पाओगे
कि दोनों के भाव
मेरी आँखों से निरंतर बहते हैं-
कभी आंसू तो कभी प्रार्थना बनकर
कभी सांसारिक विरक्ति
तो कभी याचना बनकर
कोई क्या पहचानेगा-
कि भावनाओं का तार
कैसे रिश्ते जोड़ जाता है
तेरा दर्द-
अनजाना होकर भी
क्यूँ (?) मुझे यहाँ रुलाता है!
जैसे बादल-
तेरे अपने हैं...
वैसे ही दूर क्षितिज पर तैरते-
मेरे भी कुछ सपने हैं...
मेरा भी-
छाए हुए बादलों से सरोकार है...
हृदयहीन नहीं हैं,
सुशील हृदया की आँखों में भी-
बादलों सा एक संसार है...
कौन कहाँ कैसे जगह पाता है
मीलों लम्बी दूरी है फिर...
क्यूँ (?) मुझे सबकुछ स्पष्ट नज़र आता है!
सभी भ्रांतियों से परे-
कथा कहनी है...
पेड़ क्या जाने-
कितना रोई टूट कर,
वो जो एक टहनी है...
बहनें कहाँ जड़ों संग रह पाती हैं...
जहां जन्मी...वहाँ से परे
दुनिया अलग बसाती हैं...
वैसे ही जैसे-
बादल जन्मते है कहीं...
हो जाते है कहीं के...
और बरसते हैं कहीं
फिर भी हृदय तो
बचपन के आँगन के लिए
रोता है न...
बादल बिना सोचे,
धरती की आद्रता की खातिर
अपना वजूद खोता है न...
सब विम्ब जुड़े हुए से हैं;
गर जुड़े नहीं हैं तो,
"जल की आस ... सागर सा हृदय"
क्यूँ (?) मुझे यूँ उद्वेलित कर जाता है!
बादल मेरा भी सगा है...
और जाने क्यूँ
मुझे अभी अभी ऐसा लगा है...
कि आपके हृदय की बात,
मुझ तक है आयी
आशीषों से भरी वाणी ने
मुझको आवाज़ लगायी:
"बादल...तू और मैं-
ये सब जाने दे!
जीवन के इस महासमर में
गीत तराने गाने दे!"
कविता-कहानी, कर के-
यह सब परे...
जीवन की-
व्यवहारगत सच्चाईयों को
जब हम टटोलने लगे...
तब मन बहुत रोया
तेरे दर्द का कोई बीज-
शायद विधाता ने,
मेरे भीतर भी है बोया
तभी तो ये जुड़ाव है...
भैया! आपके नेह की अनुपम यह नाव है!
और क्या बोलूं
बादलों के सहोदर से!
मेरी सारी खुशियाँ, उन्हें दे डालो
इस राखी पर...यही याचना है, गिरिधर से!
(२१/८/२०१०)
बादलों का सहोदर!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
7 अक्टूबर 2010

8 टिप्पणियाँ:
मन की भावनाओं को बखूबी लिखा है ...बदल के सहोदर को जान कर अच्छा लगा ..
सुन्दर ...हमें भी बनना चाहिए बादल
जैसे बादल-
तेरे अपने हैं...
वैसे ही दूर क्षितिज पर तैरते-
मेरे भी कुछ सपने हैं...
मेरा भी- ..................वाह... वाह...मन को छु गई जी ...क्या तो आप ने भावनाओ को कुरेद कर बाहर निकाला है आप ने ...वेसे भी आप अक्सर ...कवीता में खुद को नजदीक से ढाल कर लिखती है !!!!!! धन्यवाद सुबह सुबह अच्छी कवीता के लिये !!!!!!!!
सभी ही अच्छे शब्दों का चयन
और
अपनी सवेदनाओ को अच्छी अभिव्यक्ति दी है आपने.
आपकी कविता पढ निराला जी की कुछ पंक्तियां स्मरण हो आईं
“अरे वर्ष के हर्ष !
बरस तू बरस-बरस रसधार!
पार ले चल तू मुझको,
बहा, दिखा मुझको भी निज
गर्जन-गौरव संसार!
उथल-पुथल कर हृदय-
मचा हलचल- चल रे चल-”
जीवन की
व्यवहारगत सच्चाईयों को
जब हम टटोलने लगे...
तब मन बहुत रोया ....
bahut sundar bhavpurna abhivyakti...aabhar..
मुझे अभी अभी ऐसा लगा है...
कि आपके हृदय की बात,
मुझ तक है आयी
आशीषों से भरी वाणी ने
मुझको आवाज़ लगायी:
"बादल...तू और मैं-
ये सब जाने दे!
जीवन के इस महासमर में
गीत तराने गाने दे!"
बहुत सुंदर रचना ....सुंदर भावों के साथ
http://shikanjee.blogspot.com/
दर्द का भी दिल भर आता है, हमसे मिल कर तो दर्द भी रोता है जार जार..
J C Gupta
एक टिप्पणी भेजें