प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
10 जनवरी 2018
दृश्य थम जाते हैं
जल का ठोस हो जाना
गति को
पुनः परिभाषित करता है
कि
बर्फ़ीली सतह के नीचे भी
जीवन पूर्ववत साँस ले रहा होता है.
सागर का विस्तार है
लहरें नहीं हैं
लहरों का शोर नहीं है
जीवन है.
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
6 जनवरी 2018
समंदर की
करुणा
नयनों में वाष्पित
कोहरे में
ठिठुरती प्रकृति के अंक में
जीवन की ऊष्मा परिलक्षित
सब खेल विधाता के
अपने आप में दक्ष
प्रगट कर देते हैं हमें
हमारे ही समक्ष !!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
5 जनवरी 2018
डूबते हुए भी
खिल रहा था
वो डूबते हुए भी सूरज ही था
तो क्या हुआ जो
अंधेरों से मिल रहा था
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
at
1 जनवरी 2018
हर क्षण नया हो
छोटी-छोटी खुशियों का आकाश वृहद हो
तारीखें
सुखद यादों का ताना-बाना बुनती हुई
विदा लें
जीवन रमा रहे.
[[ मंगलकामनाएं ]]
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| [[ And, thus dawned 2018 ]] |