एक मुस्कुराहट क्या कुछ नहीं खिला देती
जुदा जुदा राहियों को मंजिल है मिला देती!
चलते हुए कितने ही दीप जलते हैं
सुन्दर सपने.. हृदयों में पलते हैं
साझे सपनों का इन्द्रधनुष है खिला देती
अठखेलियाँ करती हवा लौ को है हिला देती!
वसुधा की गोद में क्या क्या खेल चलते हैं
समय निर्धारित है अवसान का.. फिर भी हम मचलते हैं
क्षणिकता के सौंदर्य को कीर्ति है दिला देती
जलती हुई दीपमालिका बुझी आस है खिला देती!
यूँ ही नहीं अरमान पलते हैं
अँधेरा है तो क्या हुआ.. दीप जलते हैं
गंतव्य स्पष्ट हो तो संकल्पशक्ति जीत है दिला देती
जिजीविषा मुरझाती कली को भी है खिला देती!
जुदा जुदा राहियों को मंजिल है मिला देती
एक मुस्कुराहट क्या कुछ नहीं खिला देती!
अँधेरा है तो क्या हुआ.. दीप जलते हैं!
प्रस्तुतकर्ता
अनुपमा पाठक
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10 नवंबर 2010

16 टिप्पणियाँ:
बहुत ही आशावादी कविता!
"......एक मुस्कुराहट क्या कुछ नहीं खिला देती"
सुबह से मैं कुछ टेंशन में था.पर ये कविता पढ़ कर दिल खुश हो गया.:)
सादर
उम्मीदें इस कदर आपने हर लफ्ज़ में समेटी,
सुना ले जो कोई कब्र से आपकी कविताई,
तो खुदा कसम, ये उसको को भी जिला देती !
बहुत अच्छे , ऐसी ही भरते रहिये आशाओं की पेटी ...
मुस्कुराती ओर हंसाती ,,फिर भी बहुत कुछ गंभीरता से कहती कविता
"यूँ ही नहीं अरमान पलते हैं
अँधेरा है तो क्या हुआ.. दीप जलते हैं"
आशावादी दृष्टिकोण लिए अच्छी कविता
सुन्दर सकारात्मक कविता.
सुंदर भावाभिव्यक्ति!
खूबसूरत और भाव प्रवण रचना. आभार.
सादर,
डोरोथी.
बहुत खूबसूरत और भाव प्रवण रचना.
यूँ ही नहीं अरमान पलते हैं
अँधेरा है तो क्या हुआ.. दीप जलते हैं
बहुत सुंदर और प्रेरणादायी पंक्तियाँ हैं....
bahut hi khubsurat kavita...kaafi sakaraatmak urja hai isme....
badhai....
meri nayi rachna par padharein..
sundar kavita kahai hai aapane.........abhar
अनुपमा जी,
`जिजीविषा मुरझाती कली को भी है खिला देती है `
आपकी इस पंक्ति में जीवन का रहस्य छुपा हुआ है ! आपकी पूरी कविता जीने की राह प्रशस्त करती है !
इतनी सुन्दर कृति के लिए मेरी बधाई स्वीकार करें !
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ
बहुत सुन्दर भावों से बुनी अच्छी रचना
bahut hi saargarvhit rachna
यूँ ही नहीं अरमान पलते हैं
अँधेरा है तो क्या हुआ.. दीप जलते हैं
is sakaratmak soch ne man moh liya!!
सुन्दर रचना
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