अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

अँधेरा है तो क्या हुआ.. दीप जलते हैं!

एक मुस्कुराहट क्या कुछ नहीं खिला देती
जुदा जुदा राहियों को मंजिल है मिला देती!

चलते हुए कितने ही दीप जलते हैं
सुन्दर सपने.. हृदयों में पलते हैं
साझे सपनों का इन्द्रधनुष है खिला देती
अठखेलियाँ करती हवा लौ को है हिला देती!

वसुधा की गोद में क्या क्या खेल चलते हैं
समय निर्धारित है अवसान का.. फिर भी हम मचलते हैं
क्षणिकता के सौंदर्य को कीर्ति है दिला देती
जलती हुई दीपमालिका बुझी आस है खिला देती!

यूँ ही नहीं अरमान पलते हैं
अँधेरा है तो क्या हुआ.. दीप जलते हैं
गंतव्य स्पष्ट हो तो संकल्पशक्ति जीत है दिला देती
जिजीविषा मुरझाती कली को भी है खिला देती!

जुदा जुदा राहियों को मंजिल है मिला देती
एक मुस्कुराहट क्या कुछ नहीं खिला देती!

18 टिप्पणियाँ:

यश(वन्त) 10 नवंबर 2010 को 1:09 pm  

बहुत ही आशावादी कविता!
"......एक मुस्कुराहट क्या कुछ नहीं खिला देती"

सुबह से मैं कुछ टेंशन में था.पर ये कविता पढ़ कर दिल खुश हो गया.:)

सादर

Majaal 10 नवंबर 2010 को 1:15 pm  

उम्मीदें इस कदर आपने हर लफ्ज़ में समेटी,
सुना ले जो कोई कब्र से आपकी कविताई,
तो खुदा कसम, ये उसको को भी जिला देती !

बहुत अच्छे , ऐसी ही भरते रहिये आशाओं की पेटी ...

sunita 10 नवंबर 2010 को 2:04 pm  

मुस्कुराती ओर हंसाती ,,फिर भी बहुत कुछ गंभीरता से कहती कविता

Kunwar Kusumesh 10 नवंबर 2010 को 3:10 pm  

"यूँ ही नहीं अरमान पलते हैं
अँधेरा है तो क्या हुआ.. दीप जलते हैं"

आशावादी दृष्टिकोण लिए अच्छी कविता

shikha varshney 10 नवंबर 2010 को 3:26 pm  

सुन्दर सकारात्मक कविता.

मनोज कुमार 10 नवंबर 2010 को 3:29 pm  

सुंदर भावाभिव्यक्ति!

Dorothy 10 नवंबर 2010 को 4:39 pm  

खूबसूरत और भाव प्रवण रचना. आभार.
सादर,
डोरोथी.

अनामिका की सदायें ...... 10 नवंबर 2010 को 4:56 pm  

बहुत खूबसूरत और भाव प्रवण रचना.

डॉ॰ मोनिका शर्मा 10 नवंबर 2010 को 4:59 pm  

यूँ ही नहीं अरमान पलते हैं
अँधेरा है तो क्या हुआ.. दीप जलते हैं
बहुत सुंदर और प्रेरणादायी पंक्तियाँ हैं....

Shekhar Suman 10 नवंबर 2010 को 6:59 pm  

bahut hi khubsurat kavita...kaafi sakaraatmak urja hai isme....
badhai....
meri nayi rachna par padharein..

आशीष मिश्रा 11 नवंबर 2010 को 4:37 am  

sundar kavita kahai hai aapane.........abhar

ज्ञानचंद मर्मज्ञ 11 नवंबर 2010 को 4:57 am  

अनुपमा जी,
`जिजीविषा मुरझाती कली को भी है खिला देती है `
आपकी इस पंक्ति में जीवन का रहस्य छुपा हुआ है ! आपकी पूरी कविता जीने की राह प्रशस्त करती है !
इतनी सुन्दर कृति के लिए मेरी बधाई स्वीकार करें !
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

संगीता स्वरुप ( गीत ) 11 नवंबर 2010 को 8:51 am  

बहुत सुन्दर भावों से बुनी अच्छी रचना

babanpandey 11 नवंबर 2010 को 10:03 am  

bahut hi saargarvhit rachna

Abha Khetarpal 11 नवंबर 2010 को 2:49 pm  

यूँ ही नहीं अरमान पलते हैं
अँधेरा है तो क्या हुआ.. दीप जलते हैं

is sakaratmak soch ne man moh liya!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) 11 नवंबर 2010 को 4:13 pm  

उपयोगी पोस्ट सुन्दर रचना!
इसकी चर्चा यहाँ भी है-
http://charchamanch.blogspot.com/2010/11/335.html

Yashwant Yash 2 नवंबर 2013 को 10:56 am  

दीप पर्व आपको सपरिवार शुभ हो !

कल 03/11/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
धन्यवाद!

Onkar 3 नवंबर 2013 को 6:13 am  

सुन्दर रचना

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ