अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

शीर्षकविहीन... !!

खुद को ढूंढ़ते हुए
बहुत दूर निकल आये थे...


कुछ कवितायेँ मिली हमें राह में...


उन कविताओं को सहेज लाये हैं... !


शायद एक दिन
मिल जाये हम भी खुद को
ऐसे ही किसी खोयी कविता की तरह...


पर हमें पता है...
ऐसा ही होगा--


खुद को पाकर फिर खो देंगे हम
इस बात पर फिर अनायास रो देंगे हम... !!


*** *** ***


खो जाना है धुंध में...


इन विराट विसंगतियों को...
आसन्न आपदाओं को...
सकल विपत्तियों को...


और खुद तुम्हें और मुझे भी इसी धुंध में मिल जाना है एक रोज़...


अनिश्चितताओं के इस समुद्र में
दो कदम जो साथ हैं...
कुछ क्षण जो हमारे पास हैं...
उन्हें जी लें... ?!!



1 टिप्पणियाँ:

संगीता स्वरुप ( गीत ) 4 दिसंबर 2015 को 7:27 am  

जो क्षण हमारे पास हैं बस वही जी लें .... बहुत गहन और अच्छी अभिव्यक्ति .

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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