अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

अच्छा है रंग ग़मगीन ही... !!

ये सफ़र लम्बा है,
अंतहीन भी...
खुशियाँ छलती हैं,
अच्छा है रंग ग़मगीन ही...


इतना दर्द हो
कि कई दर्द स्वतः भूल जायें...
कभी जो सुख के पल हों
वे बस यादों में मुस्कायें...


पाँव के छाले हों
या मन की दरारें हों...
पीड़ा हो मर्मान्तक
और जीतते हुए हम हारे हों...


ज़िन्दगी!
तुझसे रूठें हम
तेरे ही सहारे हों... !!


1 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार जोशी 1 दिसंबर 2015 को 5:46 pm  

बहुत सुंदर ।

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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