अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कविता सी है...


वो
अपने समय पर आएगी...
और स्नेह से संग ले जाएगी...


ज़िन्दगी की तरह
वो अंतहीन इंतज़ार नहीं करवाएगी...


वो
हर क्षण संग चल रही है
उपस्थित होती हुई भी बस दिखती नहीं है...


वो आकर
बस बढ़ जाती है आगे
नेपथ्य में ही रहती है सदैव
मौत घड़ी भर भी रूकती नहीं है...


कविता सी है...
पता ही नहीं चलता कब घटित हो गयी... !!


2 टिप्पणियाँ:

Onkar 13 दिसंबर 2015 को 2:12 am  

वाह, सटीक तुलना

Anita 13 दिसंबर 2015 को 5:54 am  

वाह ! कविता सी सदा साथ है..मृत्यु का इतना सुंदर स्वागत..

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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