अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

एक दिन लुप्त हो जाते हैं हम...

खो जाना...
चले जाना...


ये अचानक नहीं होता...


हर क्षण घटती रहती है ये जाने की प्रक्रिया 


तमाम उपस्थितियों के बीच
अनुपस्थितियां अपने घटित होने हेतु पृष्ठभूमि रच रही होती हैं...


और रचते बसते इन पृष्ठभूमियों में...
एक दिन लुप्त हो जाते हैं हम...


खो जाने का
क्या फिर
सालता होगा गम... ?


या खुशियों का मंज़र होता होगा
कि यहाँ से खो कर, इस जगह से गुम होकर
कहीं पा लिए जाते होंगे हम... !! 




1 टिप्पणियाँ:

अजय कुमार झा 28 दिसंबर 2015 को 4:30 pm  

यही तो आज तक रहस्य बना हुआ है जी ..बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह ..सुन्दर रचना

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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