अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

स्नो फॉल


श्वेत डगर...


आच्छादित धरती का आह्लाद
रच गया सुनहरे पहर...


ठूंठ पेड़ ढंका रहेगा...
रहस्य रोमांच यूँ बचा रहेगा...


फिर से रचेगी प्रकृति उत्सव...
अंधेरों के बीच उजाले का सूक्ष्म उद्भव...


ये बारिश
हम मुट्ठी में भर आए हैं...
ज़िन्दगी जहाँ नहीं
वहां ज़िन्दगी के साए हैं... !!

1 टिप्पणियाँ:

अजय कुमार झा 28 दिसंबर 2015 को 4:32 pm  

कमाल है जी ,क्या कहने अभी अभी एक टुकड़ा और बहुत ही गहरा सा पढ़ के आगे निकला तो यहाँ आया पहुंचा ..रचते चलिए ..बहुत बहुत शुभकामनायें आपको

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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