अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

दूब, तेरी जिजीविषा प्रणम्य... !!

हर एक पन्ने पर
अंकित है
शब्दों का तारतम्य...


और जो सफ़हे रिक्त हैं
उनमें है अंकित
मौन की भाषा अगम्य...


पलटती हुई
सुख दुःख के हर पृष्ठ को
हर मोड़ से आगे निकल जाती है ज़िन्दगी


विस्मित
देखती ही रह जाती है नियति
ये साहस अदम्य...


निराश हताश मंज़र हो...
पूरा का पूरा वातावरण
स्याह बंज़र हो...

वो वहीं कहीं
चुपके से उग जाती है...
दूब, तेरी जिजीविषा प्रणम्य... !!

1 टिप्पणियाँ:

Anita 13 दिसंबर 2015 को 6:08 am  

दूब जिन्दगी के प्रति विश्वास जगाती है..तभी तो पूजा में देवता के चरणों पर अर्पित होती है..

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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