अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

थी वहीँ आसमान तकती ज़मीं...


खूब रोई थीं आँखें...


अब
हंसने की कोशिश
कर रहे थे
आँखों में उभर आये इन्द्रधनुष...


पर
रूदन ही झलक रहा था...
भरा हुआ मन
आँखों से छलक रहा था...


देखने वाली नज़रों ने महसूस कर ली नमी...
आँखों में समाया हुआ था सारा आकाश
थी वहीँ आसमान तकती ज़मीं...


फिर धीरे से
आंसुओं ने खटखटाया पलकों का दरवाज़ा...
और बेतरह आँखें बरस पड़ीं...


हंसने की कोशिश में
आँखें एक बार फिर रो पड़ीं... !!

1 टिप्पणियाँ:

Onkar 20 दिसंबर 2015 को 11:01 am  

सुन्दर रचना

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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