अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

एक रोज़ ऐसा भी आये...


बादल... धूप... पवन...
बारिश... छाँव... सिहरन... 


प्रार्थना... दीप... वंदन...
समर्पण... बाती... चन्दन...


ये सब सफ़र के साथी हैं...
ज़िन्दगी इन्हें अपना सगा बताती है...


राही के साथ चलते हैं
ये हमें ढालते हैं, हममें ढलते हैं 


चलते-चलते
ढलते-ढलते 

एक रोज़ ऐसा भी आये...

हम बादल, धूप, पवन हो जायें... !!

2 टिप्पणियाँ:

Onkar 6 दिसंबर 2015 को 4:38 am  

बहुत बढ़िया

Anita 6 दिसंबर 2015 को 6:19 am  

वह एक रोज आज ही क्यों न हो..

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ