अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

फिर, एक ऐसा मौसम आया...

बर्फ़ की
पतली चादर से ढँक कर...
धरती का मौन
जैसे हुआ मुखर... 


आसमान ने
जो लिखे पत्र...
सब बांचे गए
गंतव्य तक पहुंचकर...


अक्षर-अक्षर
पढ़ा गया...
धरती के आँचल में
जीवन मढ़ा गया... 


कहते-कहते
जब गला रुंध गया...
तब मौन में
फिर सब कहा गया...


फिर एक
ऐसा मौसम आया...
कहना-सुनना
सब पीछे रह गया...


आत्मीयता की वो गाँठ बंधी
बिन कहे सब संप्रेषित हो गया... !!


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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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