अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

यहाँ आँखों से ओझल हर दृश्य अनमना है !

नदी नदी पर्वत पर्वत
मन अन्यमनस्क जड़वत 


चलता जाता है उदास
हमें कहाँ उसकी सतह का भी अंदाज़ 


कब डूब जाए
कब वहां सूरज उग आये 


मन के क्षितिज पर
कितने तो बादल हैं छाये 


कोहरा भी घना हैं
यहाँ आँखों से ओझल हर दृश्य अनमना है


ऐसे में यूँ ही कुछ लिख रहे हैं...
कोई अर्थ नहीं होने का फिर भी दिख रहे हैं... !!




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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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