अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कभी श्वेत भी था, इस बार स्याह है दिसम्बर... !!

एक वो दिसम्बर था
बर्फीली सफ़ेदी से नहाया हुआ
एक ये दिसम्बर है
धुंध, उदास बारिश और स्याह रंगों से भरा...


तब कितना सुन्दर था दृश्य
बर्फ़ के फ़ाहों से पटी थी धरा
अब फुहारों की बाहों में
नमी को है उसने वरा...


दिसम्बर
देख रहा है निर्निमेष
प्रकृति के स्वरुप को हर पल
रचते हुए जीवन का कोई रंग खरा


अंतिम पायदान पर
खड़ा साल सोच रहा है--
कितने भूले बिसरे घावों को
समय फिर से कर गया हरा... !!


1 टिप्पणियाँ:

Onkar 5 दिसंबर 2015 को 4:14 pm  

बहुत खूब

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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