अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

चुभेंगे अभी और अनगिन शूल... !!


तुम तक आने को...


कभी
मौन सेतु बनता था...
तो कभी
कविता बनती थी पुल...



ज़िन्दगी!
उसे सरमाथे रखा सदैव
जो पाई थी, कभी हमने, तुमसे
तुम्हारी चरण धूल...



देर तक, तट पर, खेलते रहे रज कणों  से
अब किनारों से आगे बढ़ चली
लहरों में है नैया
हवाओं! दिशा देना देखो न जाना भूल...


ज़िन्दगी! तेरा हौसला है हमें
हम सफ़र में हैं, हमें पता है--
चुभने ही हैं...
चुभेंगे अभी और अनगिन शूल... !!



2 टिप्पणियाँ:

Dilbag Virk 30 दिसंबर 2015 को 2:14 pm  

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 31-12-2015 को चर्चा मंच पर अलविदा - 2015 { चर्चा - 2207 } में दिया जाएगा । नव वर्ष की अग्रिम शुभकामनाओं
धन्यवाद

PBCHATURVEDI प्रसन्नवदन चतुर्वेदी 30 दिसंबर 2015 को 5:59 pm  

बेहद प्रभावशाली रचना......बहुत बहुत बधाई.....

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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