अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

राह दिखाए... हमारा हो जाए... !!


समझ से परे होती हैं
कितनी ही बातें...


बस अनुभूतियों के आकाश होते हैं...
और ये कहाँ कभी भी स्पष्ट होते हैं...
हो ही नहीं सकते...


बदलता रहता है परिदृश्य...
प्रगल्भ होते हैं भावों के मेघ...
अक्षरशः ऐसे हम हो ही नहीं सकते...


कितने ही अनुभूत सत्य हैं...
जो हम शब्दों में कह ही नहीं सकते...


तो इनके लिए निर्दिष्ट एक आकाश...
और वहीँ से होता रहे दैदीप्यमान प्रकाश...


राह दिखाए...
हमारा हो जाए... !!

2 टिप्पणियाँ:

Dilbag Virk 23 दिसंबर 2015 को 3:16 pm  

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 24-12-2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2200 में दिया जाएगा
धन्यवाद

रश्मि शर्मा 24 दिसंबर 2015 को 3:40 pm  

Bahut sundar likha

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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