अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

एक दिन छूट जाना है खुद से ही... !!

छूटते हुए दृश्यों की तरह...
एक दिन छूट जाना है खुद से ही...


इतनी छोटी सी है ये ज़िन्दगी
और अनंत हैं राहें...


जहाँ से गुज़र रहे हैं
फिर शायद ही कभी गुजरें... !


प्रबल हो सकती है चाह
लौटने की
पुनः उस राह तक... 


होगी भी... 


पर
अवसर नहीं होगा...
कदम कदम पर जीवन ने
विवशता का दर्द ही तो है भोगा... !!


इसलिए कदम रोप कर
जीते हुए चलें हर पग...
कौन जाने ?
कब छूट जाना है ये जग...


रूठते हुए लम्हों की तरह...
एक दिन रूठ जाना है खुद से ही...


छूटते हुए दृश्यों की तरह...
एक दिन छूट जाना है खुद से ही... !!!




2 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 5 दिसंबर 2015 को 12:11 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (06-12-2015) को "रही अधूरी कविता मेरी" (चर्चा अंक-2182) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Anita 6 दिसंबर 2015 को 6:20 am  

एक दिन कहीं और नहीं है..इसी घड़ी में छिपा है..उसे पहचान लें तो बस...

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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