अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

अभी सदियों और चलना है... !!

शब्द कई बार बहुत कठोर होते हैं
और उनकी कठोरता तब और असह्य होती है
जब वो शब्द किसी अपने ने कहा हो


जो खूब प्रिय रहा हो... !


कितना रोये
कितने आंसू खोये


तब जाना--


वो इतना कठोर हो पाया
जो भी कहा, वह ऐसी निर्ममता से कह पाया


तो, बस इसलिए
कि हम सचमुच उसके अपने हैं...


साम्य हो मनःस्थितियों में
इसके लिए कितने मनके और जपने हैं...

सदियों से चल रहे हैं...
अभी सदियों और चलना है...


तब जाकर कहीं

अपने होंगे...


अभी कितने युग और
संस्कार तपने होंगे... !!

2 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा... 9 दिसंबर 2015 को 9:47 am  

शब्द तब भी दुखदाई होते हैं
जब वे आंतरिक क्षुब्द्धता के बाद भी
कठोर नहीं हो पाते
संस्कारों की कशमकश में रात भर छत निहारते हैं !!!

Anita 9 दिसंबर 2015 को 10:49 am  

संस्कार तपने होंगे और निखर कर कुंदन बनने होंगे..

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आज कैसे
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