अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

सब रास्तों के खेल हैं...

गिन रहे थे हम
लम्हे...
गिनते-गिनते
कितने ही क्षण छिटक गए...


राह
बहुत लम्बी थी...
भावों का जंगल घना था, उलझा-उलझा सा
जाने कब हम उन राहों में भटक गए...


खो गए तब जाना
कि क्या होता है पाना...


जीवन की क्लिष्ट अवधारणाओं से
कैसे होता है, सुलझे हुए निकल आना...


उलझन-सुलझन
सब रास्तों के खेल हैं...
कितने जाने-अनजाने उद्देश्य, कितने ही सपने ढ़ोते
हम पटरियों पर सरपट दौड़ती रेल हैं... !!

1 टिप्पणियाँ:

राजेंद्र कुमार 31 दिसंबर 2015 को 7:19 am  

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (01.01.2016) को " मंगलमय नववर्ष" (चर्चा -2208) पर लिंक की गयी है कृपया पधारे। वहाँ आपका स्वागत है, नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें, धन्यबाद।

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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