अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

ज़िन्दगी पहेली ही होगी...


एक ज़रा सी बूँद थी...
पर अथाह थी...


वो स्वयं सागर ही थी...
कि वो हर लहर के हृदय में उठती बेचैनियों की गवाह थी...


समय का सहज प्रवाह थी...
नन्ही सी बूँद अपने आप में अथाह थी... !!


अथाह थी...
अथाह है...


ज़िन्दगी पहेली ही होगी...
हल हो न हो इस बात की उसे कब परवाह है...


वो रुदन से शुरू होती है...
अंत भी एक कराह है... !!

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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