अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

... फिर, खो जाना... !!


जब टूटने लगें
सहज से सिलसिले... 


जब जुटने लगें गम... 


बिखरने लगें
एक के बाद एक टुकड़ों में हम... 


तब थमना
थामना... 


रे मन !
ख़ुशी ख़ुशी करना
कटु यथार्थों का सामना...


तट पर
रेत से लिखना मिटाना...
जीवन कुछ नहीं बस क्षण भर का टिमटिमाना
फिर, खो जाना... !!

2 टिप्पणियाँ:

Rahul... 9 दिसंबर 2015 को 5:16 am  

बेहद-बेहद जीवंत रचना। कम शब्दों में जिंदगी का सार.

Anita 9 दिसंबर 2015 को 5:24 am  

जब कटु कह दिया तब मन कैसे करेगा सामना..यथार्थ तो यथार्थ है न कटु न मीठा..जैसे सूरज तो सूरज है..

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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