अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

प्रतीक्षा... !!


देहरी पर
एक दीप जलाया...
मन के कोने में
लौ जगमगाई...


ऐसा भी होता है
हो भी
और न भी हो
तन्हाई... !


सूरज नहीं गगन में...
चाँद तारे भी नहीं...


सबको कर विदा खाली तो है आसमान...
सूरज को तरसती धरती होगी न कहीं... !


हर आँगन को
निर्द्वंद है धूप छाँव से सरोकार...


कितने लम्हों में
बंटा होगा इंतज़ार... !


कभी कभी
धीर धरे प्रतीक्षा करना ही
समुचित कर्म है...


आश्वस्ति रहे
कि वो एक जैसा नहीं रहेगा,
बदल जाना समय का धर्म है... !!


2 टिप्पणियाँ:

Manoj Kumar 4 दिसंबर 2015 को 9:08 am  

डायनामिक सुन्दर रचना

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 4 दिसंबर 2015 को 11:24 am  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (05-12-2015) को "आईने बुरे लगते हैं" (चर्चा अंक- 2181) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ