अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

लहरें... !!


नम आँखों में
सम्पूर्ण हृदय की पीड़ा है...


आंसुओं में समाया हुआ
एक अथाह समंदर है...


न थाह है...
न राह ही...


लहरें सदा से रही हैं बेपरवाह ही...


उनका दर्द
उठते-गिरते
समंदर में गुम हो जाता है...


एक लय में
पीड़ा रागिनी बुनती है
'शोर' शोर नहीं रहता फिर धुन हो जाता है... !!






1 टिप्पणियाँ:

अजय कुमार झा 28 दिसंबर 2015 को 3:59 pm  

शोर धुन हो जाता है ..बहुत सुन्दर गही हुई चित्रावली सरीखी | अच्छी लगी

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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