अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

जटिलताओं के बीच...

जटिल है मन की दुनिया...
जीवन भी जटिल है...


इन तमाम जटिलताओं के बीच
एक ज़रा सी धूप है...
उपस्थिति ये स्नेहिल है...


पास ही छाँव उदास पड़ी है...
शायद मन उसका चोटिल है...


इसी धूप छाँव में
हम भी कहीं है...
कि ये दुनिया कभी उदास सूनी है
तो कभी खुशियों की महफ़िल है...


आंसू में हंसी है
हंसी में भी नमी समायी हो सकती है
विभाजन ये जटिल है...


बस इतनी ही आश्वस्ति है
बवंडरों के बीच यह विश्वास जिलाए रखता है-
जीवन के आँचल में टाँकती सितारे, कहीं न कहीं, एक किरण स्नेहिल है... !!



1 टिप्पणियाँ:

Anita 29 दिसंबर 2015 को 10:00 am  

वाह ! आस की यह किरण सदा साथ है..सुंदर भाव!

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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