अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कोई झरोखा नहीं खुलता... !

बीतती विकटताओं के बीच
सहेज रहे हैं हम खुद को...


सहेजना ही होगा टूटती बिखरती साँसों को...
कि ये हैं तो हम हैं...


हम होंगे
तब तो संभावनाएं तलाशेंगे...


उजाले की खोज़
हमारे होने से ही तो गंतव्य पायेगी...


सहेजना है खुद को
कि हम सहेज सकें उजाले...


चाभियाँ सब हमारे पास ही हैं...
विडंबना ही है कि फिर भी उदास लटक रहे हैं ताले...


कोई झरोखा नहीं खुलता...


अंधेरों का दूर तक वर्चस्व है
या हमारी दृष्टि का ही दोष है प्रकाश नहीं खिलता... ?!!

2 टिप्पणियाँ:

Onkar 27 दिसंबर 2015 को 1:09 pm  

बहुत सुन्दर

Anita 28 दिसंबर 2015 को 4:44 am  

प्रकाश तो सदा था, सदा है और सदा रहेगा..हमारी ही नजर पर पर्दा पड़ा है

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ