अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कविता के आँगन में... !!

कविता के आँगन में...
बिखरी थीं कितनी ही पंक्तियाँ...
कितने ही उद्गार...


सब अपने आँचल में समेट लिया...
ज़िन्दगी! तुमने हमें क्या क्या नहीं दिया...


भाव भाषा का वरदान
युगों युगों के दिव्य संधान 


तुम हमारे प्रति,
उदार ही रही सदा...


हम शिकायतों से
जड़ते रहे परिदृश्य,
खोते रहे हर सम्पदा... 


ईर्ष्या द्वेष का संसार है 


जाने कब जानेंगे हम
हमारा रचा हुआ सब मिथ्या है निराधार है


शाश्वत अंश की
पहचान जिसे हो...


वो जीवन जीवन है
सहजता का संज्ञान जिसे हो...


ये नहीं तो सब व्यर्थ है...


मन ठान ले तो क्या नहीं संभव
वो सर्वसमर्थ है...


शुभ संकल्पों का आह्वान
ज़िन्दगी! तुम कविता, तुम ईश्वर, तुम मीत, तुम प्राण !!


1 टिप्पणियाँ:

Manoj Kumar 26 दिसंबर 2015 को 8:52 am  

डायनामिक
सुन्दर रचना

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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