अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

जीवन आलोकित रहेगा स्वमेव... !

कविते !


तुम्हारा आँगन वो अनूठा संसार है
जहाँ जितना भी हताश पहुँचें
कोई न कोई सिरा अपना सा मिल जाता है
शब्दों के झिलमिल प्रकाश में मन का उपवन खिल जाता है


तुम नहीं जानती कि आँखों की चमक हो तुम

जिए कितने ही पल हमने अक्षर अक्षर बुन 


यहाँ ईर्ष्या द्वेष का कारोबार है
चलते चलते हमने जाना यही संसार है 


तुम्हारे सान्निध्य में छाँव हो लिए

तुम थी आसपास तो हमने गीली मिटटी में कुछ ख़्वाब बो लिए 


कविते !
ऐसे ही रहना सदैव...

जीवन आलोकित रहेगा स्वमेव... !!




1 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 12 दिसंबर 2015 को 11:17 am  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (13-12-2015) को "कितना तपाया है जिन्दगी ने" (चर्चा अंक-2189) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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