अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

एक दिन सब दुःख मिट जाते हैं...

वो छत थी...


चारदिवारी थी उसका आधार
मगर वो हर संकुचन से विरत थी...


हम उसे एकटक देखते रहे...
वो देखती रही आकाश...


सीमित रहा
हमारी दृष्टि का फ़लक...
वो देखती रही निर्निमेष
सृष्टि का विस्तार दूर तलक...


देखते देखते
खो गयी...
मन की चारदिवारी पर टिकी ज़रा सी छत
जाने कब आसमान हो गयी...

मिट कर शायद
सब दुःख भी मिट जाते हैं...

आज वो आसमान हो कर नत थी...
कल तक जो केवल एक छत थी... !!

2 टिप्पणियाँ:

Anita 18 दिसंबर 2015 को 9:08 am  

वाह ! वास्तव में वह आसमान ही थी..भूल से छत मान रही थी खुद को..

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 18 दिसंबर 2015 को 11:01 am  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (19-12-2015) को "सुबह का इंतज़ार" (चर्चा अंक-2195) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
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कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
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अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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